Thursday, December 27, 2007

मरे मिले करोड़


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

जितनी लम्बी चादर हो
उतने ही पांव पसार
यहीं पाठ पढ़ाया गया
जीवन में हर एक बार
पाई पाई गिन के
जब जब पाई पगार

दुनिया के हैं ढंग निराले
रीत इसकी बेजोड़
जब तक आदमी ज़िंदा रहे
रहे पांव सिकोड़
एक दिन जब जाने लगे
नाते सारे तोड़
बाजे-गाजे से विदा होए
लम्बी चादर ओड़

आत्मा जब तक साथ थी
लेते थे मुख मोड़
पार्थिव शरीर के सामने
खड़े हैं हाथ जोड़
यहीं दुनिया का दस्तूर है
यहीं इसका निचोड़
जीवन का कुछ मोल नहीं
मरे मिले करोड़

सिएटल
26 दिसम्बर 2007
Listen to it straight from the horse's mouth.
Glossary:
पाई = 1. penny 2. received
पगार = salary
पार्थिव शरीर = dead body
दस्तूर = custom
निचोड़ = summary
मिले = 1. found 2. received
करोड़ = 1. million (people) 2. million (rupees)

इससे जुड़ीं अन्य प्रविष्ठियां भी पढ़ें


3 comments:

परमजीत बाली said...

बहुत बढिया व खरी रचना है।बधाई।

आत्मा जब तक साथ थी
लेते थे मुख मोड़
पार्थिव शरीर के सामने
खड़े हैं हाथ जोड़
यहीं दुनिया का दस्तूर है
यहीं इसका निचोड़
जीवन का कुछ मोल नहीं
मरे मिले करोड़

राकेश खंडेलवाल said...

सुन्दर रचना

Reetesh Gupta said...

अच्छा लगा पढ़कर ...बधाई