Friday, November 30, 2007

क्या हुआ तेरा वादा, वो क़सम वो इरादा


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

क्या हुआ तेरा वादा, वो क़सम वो इरादा
मिलेगी डिग्री, जिस दिन तुम्हें
वो दिन 'यू-एस' में आखिरी दिन होगा
क्या हुआ तेरा वादा, वो क़सम वो इरादा

याद है मुझको तूने कहा था
तुमसे नहीं रुठेंगे कभी
फिर जिस तरह से हम पले हैं
कैसे भला जीएंगे कहीं
तेरी 'कोचिंग' में बीती हर शाम
के तुझे कुछ भी याद नहीं
क्या हुआ ...

ओ कहने वाले मुझको गरीब
कौन गरीब है ये बता
वो जिसने घर लिया उधार के पैसो से
या जिसने 'कैश' में तुझे भेज दिया
नशा दौलत का ऐसा भी क्या
बेवफ़ा ये तुझे याद नहीं
क्या हुआ ...

भूलेगा दिल जिस दिन तुम्हें
वो दिन जिन्दगी का आखिरी दिन होगा
क्या हुआ तेरा वादा, वो कसम वो इरादा


(मजरूह सुल्तानपुरी से क्षमायाचना सहित)

अगर एन-आर-आई, तुमको पहचान जाते


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

अगर एन-आर-आई, तुमको पहचान जाते
ख़ुदा की क़सम तुम्हे ग्रेजुएट न करते
जो मालूम होता, ये इलज़ाम-ए-तालीम
तो तुम को पढ़ाने की ज़ुर्रत न करते

जिन्हें तुमने समझा मेरी बेवकूफ़ी
मेरी ज़िन्दगी की वो मजबूरियाँ थीं
हाँ, पढ़ाई तुम्हारी इंग्लिश में की थी
क्यूंकि सरकार ने तो पहनी चूड़ियाँ थीं
अगर सच्ची होती शिक्षा तुम्हारी
तो घबरा के तुम यूँ शिकायत न करते

जो हम पर है गुज़री हमीं जानते हैं
सितम कौन सा है नहीं जो उठाया
निगाहों में फिर भी रही तेरी सूरत
हर एक सांस में तेरा पैगाम आया
अगर जानते तुम ही इलज़ाम दोगे
तो भूले से भी हम तुम्हे शिक्षित न करते

(प्रेम धवन से क्षमायाचना सहित)

ऐ दौलत तेरे बंदे हम


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

ऐ दौलत तेरे बंदे हम
ऐसे है हमारे करम
अपनो से जुदा
चाटे बाँस का जूता
ताकि 'मिलियन' तो हो कम से कम

जब 'ले-आँफ़' का हो सामना
तब तू ही हमें थामना
कोई बुराई करें
हम बड़ाई करें
तूझको ही ईश्वर जानना
बढ़ चले 'केसिनो' को कदम
हर तरह के करें खोटे करम
अपनो से जुदा ...

ये डाँलर गिरा जा रहा
और एन-आर-आई घबरा रहा
हो रहा बेखबर
कुछ न आता नज़र
सुख का सूरज छिपा जा रहा
है किस 'करेंसी' में वो दम
जो अमावस को कर दे पूनम
अपनो से जुदा ...

बड़ा गरीब है एन-आर-आई
चाहे लाखों में कर ले कमाई
सर झुकाए खड़ा
हाथ फ़ैलाए खड़ा
पेट काट काट के जोड़े पाई-पाई
दिया तूने जो 'मिलियन' सनम
नहीं होगी भूख इसकी खतम
अपनो से जुदा ...

(भरत व्यास से क्षमायाचना सहित)

Thursday, November 29, 2007

NRI का सफ़र


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

NRI का सफ़र, है ये कैसा सफ़र
कोई समझा नहीं, कोई जाना नहीं
है ये कैसी डगर, चलते हैं सब मगर
कोई समझा नहीं कोई जाना नहीं

Dollar को बहुत प्यार हमने किया
रुपयों से भी मुहब्बत निभाएंगे हम
H1 का विसा ले के आये मगर
Citizenship ले के जाएंगे हम
जाएँगे पर किधर, दिल्ली या बैंगलोर
कोई समझा नहीं कोई जाना नहीं

ऐसे NRI भी हैं जो टिके ही नहीं
जिनको greencard से पहले ही pink slip आ गयी
फूल ऐसे भी हैं जो खिले ही नहीं
जिनको खिलने से पहले फ़िज़ा खा गई
है परेशां नज़र, थक गये चारागर
कोई समझा नहीं कोई जाना नहीं

है ये कैसी डगर चलते हैं सब मगर
कोई समझा नहीं कोई जाना नहीं
NRI का सफ़र है ये कैसा सफ़र
कोई समझा नहीं कोई जाना नहीं

(इंदीवर से क्षमायाचना सहित)

Tuesday, November 27, 2007

क्रिसमस


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

छुट्टीयों का मौसम है
त्योहार की तैयारी है
रोशन हैं इमारतें
जैसे जन्नत पधारी है

कड़ाके की ठंड है
और बादल भी भारी है
बावजूद इसके लोगो में जोश है
और बच्चे मार रहे किलकारी हैं
यहाँ तक कि पतझड़ की पत्तियां भी
लग रही सबको प्यारी हैं
दे रहे हैं वो भी दान
जो धन के पुजारी हैं

खुश हैं खरीदार
और व्यस्त व्यापारी हैं
खुशहाल हैं दोनों
जबकि दोनों ही उधारी हैं

भूल गई यीशु का जन्म
ये दुनिया संसारी है
भाग रही उसके पीछे
जिसे हो हो हो की बीमारी है

लाल सूट और सफ़ेद दाढ़ी
क्या शान से संवारी है
मिलता है वो माँल में
पक्का बाज़ारी है

बच्चे हैं उसके दीवाने
जैसे जादू की पिटारी है
झूम रहे हैं जम्हूरें वैसे
जैसे झूमता मदारी है

Monday, November 26, 2007

जन्म


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

जन्म के पीछे कामुक कृत्य है
यह एक सर्वविदित सत्य है

कभी झुठलाया गया
तो कभी नकारा गया
हज़ार बार हमसे ये सच छुपाया गया

कभी शिष्टता के नाते
तो कभी उम्र के लिहाज से
'अभी तो खेलने खाने की उम्र है
क्या करेंगे इसे जान के?'

सोच के मंद मुस्करा देते थे वो
रंगीन गुब्बारे से बहला देते थे वो

बड़े हुए तो सत्य से पर्दे उठ गए
और बच्चों की तरह हम रुठ गए
जैसे एक सुहाना सपना टूट गया
और दुनिया से विश्वास उठ गया

ये मिट्टी है, मेरा घर नहीं
ये पत्थर है, कोई ईश्वर नहीं
ये देश है, मातृ-भूमि नहीं
ये ब्रह्मांड है, ब्रह्मा कहीं पर नहीं

एक बात समझ में आ गई
तो समझ बैठे खुद को ख़ुदा
घुस गए 'लैब' में
शांत करने अपनी क्षुदा

हर वस्तु की नाप तौल करे
न कर सके तो मखौल करे

वेदों को झुठलाते है हम
ईश्वर को नकारते है हम
तर्क से हर आस्था को मारते हैं हम

ईश्वर सामने आता नहीं
हमें कुछ समझाता नहीं

कभी शिष्टता के नाते
तो कभी उम्र के लिहाज से
'अभी तो खेलने खाने की उम्र है
क्या करेंगे इसे जान के?'

बादल गरज-बरस के छट जाते हैं
इंद्रधनुष के रंग बिखर जाते है

सिएटल,
26 नवम्बर 2007
(मेरा जन्म दिन)

Friday, November 23, 2007

mail और email


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

mail थी सुस्त
email है चुस्त
mail थी महंगी
email है मुफ़्त

email का सिलसिला हुआ शुरु
डाकिये का आना जाना हो गया बंद
पड़ोसी भी भेजने लगे email
और मेल-मिलाप का हो गया अंत

mail में कई बाधाएं थी
नाप तौल की सीमाएं थी
फिर भी साथ ले आते थे
छोटे लिफ़ाफ़ो में बहनों का गर्व
हर भैया दूज और राखी के पर्व

mail में कई बाधाएं थी
नाप तौल की सीमाएं थी
फिर भी साथ ले आते थे
होठों की लाली हल्दी के निशां
जो जता देते थे प्रेम कुछ लिखे बिना

mail में कई बाधाएं थी
नाप तौल की सीमाएं थी
फिर भी साथ ले आते थे
माँ के आंसूओं से मिटते अक्षर
जो अभी तक अंकित हैं दिल के अंदर

mail में कई बाधाएं थी
नाप तौल की सीमाएं थी
email में नहीं कोई रोक-टोक
बकबक करे या भेजे joke
पूरे करे आप अपने शौक

किस काम का ये बेलगाम विस्तार?
समाता नहीं जिसमें अपनों का प्यार
gigabyte का folder गया है भर
एक भी खत नहीं उसमें मगर
जो मुझको आश्वासित करे
न cc हो न bcc हो
मुझको बस सम्बोधित करे

आदमी या तो है आरामपरस्त
या फिर है कुछ इस कदर व्यस्त
कि थोक में बनाता पैगाम है
auto signature से करता प्रणाम हैं

सब है सुविधा के नशे में धुत्त
धीरे धीरे सब हो रहा है लुप्त

mail थी सुस्त
email है चुस्त
mail थी महंगी
email है मुफ़्त

सिएटल
23 नवम्बर 2007

Tuesday, November 20, 2007

Thanksgiving की पार्टी


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

एक नहीं, दो नहीं
कहानी हैं हर घर की
पकेगी और सजेगी
आज शानदार टर्की

राष्ट्रपति ने प्रतीक के रुप में
छोड़ दी सुंदर सी एक टर्की
अलबत्ता सैंडवीच के बीच
फिर भी खाएंगे वो टर्की

दयालु समाज की
कहानी है ये murky

सिएटल

20 नवम्बर 2007

Thanksgiving की छुट्टी


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

ले दे के छुट्टी में मिले हैं चार दिन
दो शाँपिंग में गुज़रेंगे और दो कार में

आलिशान रिसोर्ट हमसे महंगी फ़ीस लेंगे
बर्फ़ीली पहाड़ियों पर बच्चे फ़िसलेंगे

लुभावने इश्तहारों पर हम फ़िसलेंगे

तड़के उठ कर बारगैन प्राईस' पर
माँल आदि जा कर नया माल खरीदेंगे

देर रात तक दोस्तों के घर
माल आदि खा कर नसीहत खरी देंगे

चार दिन की छुट्टी है
पर हम अत्यंत व्यस्त होंगे
देर तक सोने के
सपने सारे ध्वस्त होंगे
कुछ कर गुज़रने के
इरादे सारे पस्त होंगे
वक़्त बर्बाद करने में
भागीदार हमारे हस्त होंगे

सिएटल
20 नवम्बर 2007

Monday, November 19, 2007

किनारे-किनारे


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

हम दोनो
के बीच
प्यार था
प्यार
बेशुमार था
बेशुमार इतना
जितना
दो 'बीच' के बीच
लहलहाता समंदर

मैं था उस किनारे
तुम थी इस किनारे
प्यार ने खींचा हमें
एक दूसरे की ओर

तुम थोड़ी बदली
मैं थोड़ा बदला
मैं चला तुम्हारी तरफ़
और तुम मेरी ओर

मंज़ूर नहीं था हमें
मझधार में मिलना
मैं चलता रहा
तुम चलती रहीं
अब मैं हूं इस किनारे
और तुम उस किनारे
हम दोनों के बीच
अब भी
प्यार बहुत हैं

सिएटल
19 नवम्बर 2007

Friday, November 16, 2007

blog को blog ही रहने दो


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

हमने देखी हैं
इन blogs की टपकती लारें
भूल से भी इन्हें
comments का इनाम न दो
सिर्फ़ बकवास हैं ये
दूर से ignore करो
blog को blog ही रहने दो
कोई नाम न दो
हमने देखी हैं …

blog कोई wiki नहीं
blog website नहीं
एक email है
आए दिन post हुआ करती है
न कोई लिखता है
न कोई पढ़ता है
न पढ़ी जाती है
एक chain mail है
जो forward हुआ करती है
सिर्फ़ बकवास हैं ये
दूर से ignore करो
blog को blog ही रहने दो
कोई नाम न दो
हमने देखी हैं …

sinister से remarks
छुपे रहते हैं
smileys में कहीं
spelling mistakes से
भरे रहते हैं
sentences कई
बात कुछ कहते नहीं
काम की या कमाल की मगर
journalism की डींग भरा करते हैं
सिर्फ़ बकवास हैं ये
दूर से ignore करो
blog को blog ही रहने दो
कोई नाम न दो
हमने देखी हैं …

(गुलज़ार से क्षमायाचना सहित। फ़िल्म 'खामोशी' के लिए लिखे इस गीत को >यहाँ देखे)
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इतना सब कहने के बाद आप मेरे blog पर comments जरूर लिखे :)

दान


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

कभी विधान सभा
तो कभी लोक सभा
चुनाव का माहौल
रहता है सदा
मतदान करें
मतदान करें
देस में ये
नारे कान भरें

हम कहते हैं
आप दान करें
जितना हो सके
उतना दान करें
कुछ अभागों का
कल्याण करें
जीवन ज्योति का
सम्मान करें
गिरे हुओं का
उत्थान करें

कुछ दान करें
कुछ दान करें
आओ चलो
आह्वान करें
हम सब
कुछ दान करें
काम एक
महान करें
भारत पर सब
अभिमान करें
इस आशा को
बलवान करें

सिएटल,
16 नवम्बर 2007

Wednesday, November 14, 2007

प्रेम कहानी


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

एक था हीरो
एक थी हिरोईन
हीरो को था
हिरोईन से प्यार
हिरोईन को था
हीरों से प्यार

हीरो था गबरु जवान
बजाते ही उसके सीटी बस
रुक जाती थी चलती 'सिटी बस'

हिरोईन थी गज़ब की सुन्दर
निकलती थी जब घर से बाहर
होश खो देती थी सारी 'सिटी' बस

एक था हीरो
एक थी हिरोईन
हीरो को था
हिरोईन से प्यार
हिरोईन को था
हीरों से प्यार

प्यार का मारा होता है 'फ़ूल'
रोज देता था उसे दर्जनो फूल
पढ़ना लिखना छोड़
'क्लाँस' करता था गुल
काँलेज में इस तरह
खिलाता था गुल

एक था हीरो
एक थी हिरोईन
हीरो को था
हिरोईन से प्यार
हिरोईन को था
सिर्फ़ हीरों से प्यार

उसे मंजूर नहीं था
हीरो की चार पाई की
कमाई से खरीदी
चारपाई पर चैन से सोना
उसे चाहिए थी चैन
जिस में हो दस तोला सोना

दे न सका
हीरों का हार
इस तरह हुई
इस हीरो की हार

एक था हीरो
एक थी हिरोईन
हीरो को था
हिरोईन से प्यार
हिरोईन को था
सिर्फ़ हीरों से प्यार

हीरो हुआ बड़ा निराश
और बन गया देवदास
एक दिन जो गया एक 'बार'
जाने लगा बार बार

प्रेम प्यार के किस्से
कहता भी तो किससे?
उसके मन की वेदना
समझ सका कोई वेद ना

नैन से आंसू बरस गए
और गुज़र दो बरस गए

बाप ने पूछा
तू इतना क्यूं पीता है?
मुझे तो बता
आखिर मैं तेरा पिता हूं

इश्क में लाचार हूं
इसलिए पीता हूं
धिक्कार है मुझे
कि मैं हार के भी जीता हूं

एक था हीरो
एक थी हिरोईन
हिरोईन को था
सिर्फ़ हीरों से प्यार
हीरो को हुआ
'हेरोईन' से प्यार

Wednesday, November 7, 2007

मूर्ति पूजा


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

if you cannot read the Hindi fonts, please click here

बिक गया है जो
लुट गया है वो
तराना पुराना
हो गया है वो

पूजा जिनकी हो रही है आज
मंडप में जो कर रहे हैं राज
लाला की दुकान पर
बिक रहे थे वो
सुनार-कुम्हार के हाथों
पिट रहे थे वो

कौड़ियों के भाव
बिक जाते हैं जो
समृद्ध हमें करेंगे वो?
बिकना जिनके
मुकद्दर में हो
मोक्ष हमें दिलाएंगे वो?
पंडित के सुलाने से
सो जाते हैं जो
किस्मत हमारी जगाएंगे वो?
पलक झपकते ही
विसर्जित हो जाते हैं जो
भव सागर पार कराएंगे वो?

लालची का लोभ है
या प्रेमी का प्यार है
दुखियारे का दर्द है
या सतसंग का संस्कार है
शिल्पी का हुनर है
या भक्ति का चमत्कार है
दुनिया जिसे कहती हैं पत्थर
करती उसी का सत्कार है

आज एक और त्यौहार है
लगा रिवाज़ों का बाज़ार है
हम भी उसमें जुट गए
जहाँ सबसे लम्बी कतार है

भरा हुआ भंडार है
सम्पदा जहाँ अपार है
गरीब से गरीब भी
वहाँ दे रहा उपहार है

बिक गया है जो
लुट गया है वो
तराना पुराना
हो गया है वो

7 नवंबर 2007

Tuesday, November 6, 2007

दीवाली की छुट्टी


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

लगता है आपको गलत है भरम
कि दीवाली मनानें में हमें हैं शरम

लक्ष्मी की पूजा
और लक्ष्मी कमाना
दोनो को हमने
एक है माना
इसीलिए छुट्टी नहीं लेते हैं हम
लगता है आपको गलत है भरम
कि दीवाली मनानें में हमें हैं शरम

मिठाई की दुकान
नहीं होती है बंद
लक्ष्मी कैसे आए
जब दुकान हो बंद
करम का ही दूसरा नाम है धरम
लगता है आपको गलत है भरम
कि दीवाली मनानें में हमें हैं शरम

आँफ़िस से छुट्टी
शायद मिल भी जाए
पर स्कूल से
कैसे 'बंक' किया जाए
इम्तहान न दिया तो 'फ़ैल' होंगे हम
लगता है आपको गलत है भरम
कि दीवाली मनानें में हमें हैं शरम

दीवाली का दिन भी
ठीक से तय नहीं
आज है या कल
कोइ सहमत नहीं
'वीकेंड' पे मिलो करो झगड़ा खतम
लगता है आपको गलत है भरम
कि दीवाली मनानें में हमें हैं शरम

जैसा है देस
वैसा है भेस
मिल-जुल के खाओ-पिओ
खूब करो ऐश
खामखां आप यूं हो नहीं गरम
लगता है आपको गलत है भरम
कि दीवाली मनानें में हमें हैं शरम

Friday, November 2, 2007

दीवाली की शुभकामनाएं


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

दीवाली की रात
हर घर आंगन
दिया जले
उसने जो
घर आंगन दिया
वो न जले

दिया जले
दिल न जले
यूंहीं ज़िन्दगानी चले

दीवाली की रात
सब से मिलो
चाहे बसे हो
दूर कई मीलों
शब्दों से उन्हे
आज सब दो
न जाने फिर
कब दो

दुआ दी
दुआ ली
यहीं है दीवाली

अक्टूबर 2000

दीवाली की यादें


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

दीवाली मनाए
हो गया एक ज़माना
जीने का मतलब
जब से हो गया कमाना

न स्कूल हैं बंद
न हैं आँफ़िस में छुट्टी
किस्मत भी देखो
किस तरह है फ़ूटी
बाँस को भी था
आज ही सताना

दीवाली मनाए
हो गया एक ज़माना
जीने का मतलब
जब से हो गया कमाना

न वो पूजा का मंडप
न वो फूलों की खुशबू
न वो बड़ों का आशीष
न वो अपनो की गुफ़्तगू
समां फिर ऐसा
मिले तो बताना

दीवाली मनाए
हो गया एक ज़माना
जीने का मतलब
जब से हो गया कमाना

वो मिठाई के डब्बे
वो दस तरह के व्यंजन
न था डाँयबिटिज़ का डर
न थे डाँयटिंग के बंधन
वो खूब खिला के
अपनापन जताना

दीवाली मनाए
हो गया एक ज़माना
जीने का मतलब
जब से हो गया कमाना

वो गलियों में रंगत
वो दहलीज़ पे रंगोली
वो रंगीं पोषाकों में
बच्चों की टोली
सपना सा लगता है
अब वो ज़माना

दीवाली मनाए
हो गया एक ज़माना
जीने का मतलब
जब से हो गया कमाना

याद आता है
वो पटाखों का शोर
बारूद में महकी
वो जाड़ों की भोर
वो रात-रात भर
दीपक जलाना

दीवाली मनाए
हो गया एक ज़माना
जीने का मतलब
जब से हो गया कमाना

सिएटल
24 अक्टूबर 2005

Thursday, November 1, 2007

एक और दीवाली


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

अब कहाँ की दीवाली
और कैसी दीवाली
आएगी और जाएगी
एक और दीवाली

होली का माहौल हो
या दीवाली का त्यौहार
मनाया जाता है
सिर्फ़ शनिवार रविवार

अब कहाँ की दीवाली
और कैसी दीवाली
आएगी और जाएगी
एक और दीवाली

एक ही तरह की
महफ़िल है सजती
निमंत्रण देने पर
घंटी है बजती
कर के वही
बे-सर-पैर की बातें
गुज़ारी जाती हैं
वो दो-चार रातें

अब कहाँ की दीवाली
और कैसी दीवाली
आएगी और जाएगी
एक और दीवाली

त्यौहार-दर-त्यौहार
वहीं लाल-पीले
कपड़े पहने हैं जाते
वही घिसे-पिटे जोक्स
सुनाए हैं जाते
वही छोले
वही मटर-पनीर
वहीं गुलाब जामुन
और वही खीर

अब कहाँ की दीवाली
और कैसी दीवाली
आएगी और जाएगी
एक और दीवाली

पैसे की होड़ में
आगे बढ़ने की दौड़ में
पार की थीं सरहदें
और पार कर गए कई हदें

दोस्तों से बंद हुआ
दुआ-सलाम
भूल गए करना
बड़ों को प्रणाम
धूल खा रहा है
पूजा का दीपक
रामायण के पोथे को
लग गई है दीमक

अब कहाँ की दीवाली
और कैसी दीवाली
आएगी और जाएगी
एक और दीवाली

महानगर की गोद में
इमारतों की चकाचौंध में
हैं अपनों से दूर
हम सपनों के दास
न पूनम से मतलब
न अमावस का अहसास

अब कहाँ की दीवाली
और कैसी दीवाली
आएगी और जाएगी
एक और दीवाली

21 अक्टूबर 2006