Monday, January 21, 2008

अमर प्रेम


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

जब जब तुम से मिलने आता हूं
तो सोचता हूं
तुम न मिलो तो ही अच्छा है
जब जब तुम से मिलता हूं
तो सोचता हूं
तुम जुदा न हो तो ही अच्छा है

मैं इतने दिनों तक
हैरान था
परेशान था
कि तुम ने मुझे स्वीकारा नहीं
तो क्यूं ठुकराया भी नहीं?

अब समझ में आया कि
असली प्यार तो वही है
जिसमें चाहत अभी बाकी है

तुम मुझसे मिलती रहना
मगर मेरी हरगिज़ न बनना

अब समझ में आया कि
असली प्यार तो वही है
जो वर्जित है

तुम मुझसे मिलती रहना
मगर वैध रिश्ता हरगिज़ न बनाना

सच तो यहीं है कि
प्रेमी-प्रेमिका के मिलाप के साथ ही
अक्सर प्रेम कहानी खत्म हो जाती है

तुम स्वीकारती
तो चाहत खत्म हो जाती
तुम ठुकराती
तो नफ़रत हो जाती
ये आग जो लगी हुई है
इसे बनाए रखना
शांत कर के
इसे राख हरगिज़ न होने देना

मैं चोरी-छुपे
सब के सामने
तुम से मिलता रहूंगा
तुम्हे निहारता रहूंगा
तुम्हे चाहता रहूंगा

पर कभी नहीं कहूंगा
कि तुम बहुत सुंदर हो
कि तुम मेरे दिल में बसी हो
कि मुझे तुम से प्यार है

क्यूंकि जो बात हम कह नहीं पाते
वो दिल, दिमाग और ज़ुबान पर
हमेशा रहती है

अगर कह दिया तो
भूल जाउंगा कि कभी
मैंने तुम से ये कहा था

न कहू तो
हमेशा याद रहेगा कि कभी
मैंने तुम से ये कहा नहीं

दिल्ली
15 जनवरी 2008

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3 comments:

SHER SINGH AGRAWAL said...

Bahut sundar kavita hai rahulji.

sher agrawal

Anonymous said...

This is pretty deep and touchy.....keep it up.

Anonymous said...

Bahut tenderness hai is kavita mein, Rahul...