Thursday, May 29, 2008

एन-आर-आई

एन-आर-आई,
तुम बटोरते चलो,
डॉलर ही नहीं रुपये भी
यूरो ही नहीं, पाउंड भी

अमरीका में बंगलो ही नहीं,
इंडिया में फ़्लैट भी

तू जहाँ आया है
वो तेरा -
घर नहीं, गली नहीं,
गाँव नहीं, कूचा नहीं,
बस्ती नहीं, रस्ता नहीं,
अमरीका है,
और प्यारे,
अमरीका ये सरकस है
और सरकस में -
बड़े को भी, छोटे को भी
खरे को भी, खोटे को भी,
दुबले को भी, मोटे को भी,
नीचे से ऊपर को,
ऊपर से नीचे को
आना-जाना पड़ता है
और रिंग मास्टर के कोड़े पर -
कोड़ा जो भूख है
कोड़ा जो डॉलर है,
कोड़ा जो क़िस्मत है
तरह-तरह नाच के दिखाना यहाँ पड़ता है
बार-बार रोना और गाना यहाँ पड़ता है
इंजीनियर से वेटर बन जाना पड़ता है
एन-आर-आई …

पाई पाई गिनता है क्यूँ
घड़ी घड़ी पाँव पड़ता है क्यूँ
खुंदक तू जब तक न खाएगा,
खुद्दारी तू जब तक न दिखाएगा
ज़िंदगी है चीज़ क्या
नहीं जान पायेगा
भीख मांगता हुआ आया है
भीख मांगता चला जाएगा
एन-आर-आई …

क्या है करिश्मा,
कैसा खिलवाड़ है
एन-आर-आई जानवर में ज़्यादा फ़र्क नहीं यार है
खाता है कोड़ा भी
रहता है भूखा भी
फिर भी वो मालिक पे करता नहीं वार है
और उल्टा
जिस देश से ये आता है
डिग्री जहाँ से पाता है,
जो परवरिश इस की करता है
उस के ही सीने में भोकता कटार है
एन-आर-आई …

सरकस
हाँ बाबू,
यह सरकस है
और यह सरकस है शो तीन घंटे का
पहला घंटा एच-वन है,
दूसरा ग्रीन-कार्ड है
तीसरा सिटिज़नशिप है
और उसके बाद - माँ नहीं, बाप नहीं
भाई नहीं, बॉस नहीं,
तू नहीं, मैं नहीं,
ये नहीं, वो नहीं,
कुछ भी नहीं
कुछ भी नहीं रहता है

रहता है जो कुछ वो -
ख़ाली-ख़ाली मेंशन है
काली-पीली गाड़ी है,
अकेलेपन का टेंशन है
बिना चिड़िया का बसेरा है,
न तेरा है, न मेरा है

सिएटल,
29 मई 2008
(नीरज से क्षमायाचना सहित)
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फ़्लैट = flat
वेटर = waiter
एच-वन = H-1B
मेंशन = mansion
टेंशन = tension

Wednesday, May 28, 2008

जवानी

ये बंगला भी ले लो
ये गाड़ी भी ले लो
भले छीन लो मुझसे सारी सौगातें
मगर मुझको लौटा दो
जवानी की मस्ती
वो ढाबे की रोटी
वो होस्टल की रातें

वो मंदिर जाना और आँखें लड़ाना
आँखें लड़ा कर किसी को पटाना
पटाते पटाते सब कुछ लुटाना
वापस आ कर वो लम्बी सुनाना
भुलाए नहीं भूल सकता है कोई,
हसीं मुलाकातों की वो लम्बी सी बातें
ये बंगला भी ले लो …

होस्टल के बरामदे में कुर्सी लगाना
कुर्सी लगा कर मुर्गों को मुर्गा बनाना
वार्डन आ जाए तो उसे उल्लू बनाना
सपना सा लगता है वो बेखौफ़ ज़माना
न नौकरी का डर था न बीवी का बंधन
वो अपने थे दिन वो अपनी थी रातें
ये बंगला भी ले लो …

दो रुपये के पोस्टर से कमरा सजाना
मटकों के स्पीकर्स से बहता तराना
बिन कहानी की फ़िल्मों को फिर फिर लगाना
थोड़े से रुपयों में दुनिया का आनंद उठाना
और आज कम पड़ जाते हैं
बैंक में मिलियन्स के खातें
ये बंगला भी ले लो …

(सुदर्शन फ़ाकीर से क्षमायाचना सहित)
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सौगातें = gifts
बेखौफ़ = fearless
स्पीकर्स = speakers
मिलियन्स = millions
खातें = accounts

कविता बुरी हो गई

सच कहते कहते कविता बुरी हो गई
सच लिखते लिखते कलम छुरी हो गई

चुटकला समझ कर ठहाका लगाते थे जो
मेरी कविता से आज उनकी दूरी हो गई


हमेशा की तरह बस बेला था मैंने
तप कर आग में वो तंदूरी हो गई

आप ही खामखाह लहूलुहान हो गए
मेरे हिसाब से तो शाम सिंदूरी हो गई

फ़क़त शौक था राहुल का कविताएँ लिखना
ज़िंदा रहने के लिए आज वो जरूरी हो गई

सिएटल,
28 मई 2008

Tuesday, May 27, 2008

वो लम्हा

हमने
हज़ारों दिन
हज़ारों रातें
गुज़ारी हैं
साथ साथ
तुम्हे हो न हो
मुझे हर लम्हा
अब तक है याद

लेकिन
वो लम्हा
जिसने किया
तुम्हे आज़ाद
और मुझे बर्बाद
छोड़ गया
कुछ ऐसी छाप
कि चेहरा देखते ही
समझ जाते हैं लोग
हाल तक पूछने से
कतराते हैं लोग
के बात निकलेगी तो
दूर तलक जाएगी

कितनी सयानी है दुनिया
ख़त का मजमून समझ लेती है
लिफ़ाफ़ा देख कर
अपना रास्ता बदल लेती है
मुझे आता देख कर

मेरी ज़िंदगी है खुली किताब
जिसे पढ़ने में
किसी की दिलचस्पी नहीं है

वो लम्हा
तुम्हारे शब्दों में
तुम्हारे लिए
लास्ट स्ट्रा था

मेरी किताब में तो
तिनका
डूबते का सहारा है

यह हमारे संस्कारों का अंतर है
कि मात्र समय का फेर?

सिएटल,
27 मई 2008
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लास्ट स्ट्रा = last straw

घड़ी

सुबह आँख खुली
तो घड़ी नहीं थी
तुमने बिन पूछे
बिन बताए
उसकी जगह बदल दी थी

क्या हम अब इतने अलग हो गए हैं
कि हमारा कुछ भी साझा नहीं रहा?

दिन भर हम दोनों
अलग अलग
अपनी अपनी
घड़ी की सुईयों में
समय काटते हैं
वही तो एक थी
जो हम दोनों के
जुड़वा पलों की साक्षी थी

मैं जानता हूँ कि
कई दिनों से तुम्हें
उसकी अनवरत टिक-टिक
खल रही थी
वही तो एक धुन थी
वही तो एक लय थी
जो हम साथ सुना करते थे
वरना दिन भर कान में
दो तार लगा कर
संगीत भी तो हम
अलग अलग
ही सुनते हैं

अब हम
घड़ी की टिक-टिक में नही
सेल-फोन के सन्नाटे में
सोया करेंगें
अब हम
घड़ी में नहीं
सेल फोन में
समय देखा करेंगें
तुम्हारा अपना समय होगा
मेरा अपना

हम दोनों की दुनिया
एक हो ही नहीं सकती
तुम्हारे सेल फोन में
तुम्हारे अपने कांटेक्ट्स हैं
और मेरे सेल फोन में
मेरे अपने

हम दोनों का
एक साथ चलने का प्रश्न ही नहीं उठता है
तुम्हारी अपनी गाड़ी है
मेरी अपनी
तुम अपनी दिशा में जाती हो
मैं अपनी

कभी-कभार
जब तुम गलती से मेरी कार में
बैठ जाती हो
तो लगता है जैसे तुम किसी
अपरिचित देश में आ गई हो
कल्चर शॉक कहना
अंडरस्टेटमेंट होगा

ये क्या बेहूदा म्यूज़िक सुनते हो
बंद करो इसे
तुम्हारे कप होल्डर की साईज़ में भी गड़बड़ है
ये हीट क्यो लगा रखी है?
और तुम से कितनी बार कहा है कि
फ़्रूट्स कार में मत छोड़ा करो
आई कान्ट स्टैंड द स्मेल

हम अलग-थलग तो पहले थे ही
अब और भी अलग हो गई है दुनिया हमारी

सुबह आँख खुली
तो घड़ी नहीं थी
तुमने बिन पूछे
बिन बताए
उसकी जगह बदल दी थी

सिएटल,
27 मई 2008
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साझा = shared
साक्षी = witness
अनवरत = continuous
सेल-फोन = cell phone/mobile phone
कांटेक्ट्स = contacts
अपरिचित = unknown
कल्चर शॉक = culture shock
अंडरस्टेटमेंट = understatement
म्यूज़िक = music
कप होल्डर = cup holder
साईज़ = size
हीट = heat
फ़्रूट्स = fruits
आई कान्ट स्टैंड द स्मेल = I can't stand the smell.

Friday, May 23, 2008

मेरा 6 साल का बेटा

मेरा 6 साल का बेटा
मिहिर
अभी से जानता है कि
हमारे सोलर सिस्टम में
आठ ग्रह हैं
पहले नौ होते थे
लेकिन इन दिनों
प्लूटो क्लब से बाहर है

लेकिन उसे यह नहीं मालूम कि
दूध डब्बों से नहीं गाय से आता है

उसने फल हमेशा
सजे सजाए देखे हैं
कभी दुकान पर
तो कभी घर पर
लेकिन उसने वे फल
कभी पेड़ पर लगे नहीं देखे हैं

हमारे घर में पेड़ हैं
हमारे मोहल्ले में पेड़ हैं
पार्क में
स्कूल में
चारो तरफ़ पेड़ ही पेड़ हैं

लेकिन सारे पेड़ बांझ हैं

एक बार पूछा था
तो पता चला
कि फलदार पेड़ों की
देखरेख बहुत महंगी है
फल आते हैं
तो चिड़िया आती हैं
बहुत गंद फ़ैलाती हैं
फल आते हैं
तो बेहिसाब आते हैं
रोज सड़-सड़ कर गिरेंगे
कौन लेगा जिम्मेदारी
उनकी सफ़ाई की?

वो जानता है कि
उसके डैडी आँफ़िस जाते हैं
सुना है कि
कुछ काम भी करते हैं
लेकिन क्या?

मेरे हाथों से उसने कभी
कुछ बनते नहीं देखा हैं

मेरे काम के बदले
मुझे किसी से कुछ
मिलते हुए भी नहीं देखा है

फल रहित पेड़
फल रहित कर्म
फल रहित जीवन?

सिएटल,
23 मई 2008

Thursday, May 22, 2008

मेरे नाना

मेरे नाना
एक पेड़ के लिए
सारे मोहल्ले से लड़े थे
ये नहीं कटेगा
ये नहीं कटेगा
कहते कहते
अपनी जिद पर अड़े थे
नाना की वजह से
सड़क के विस्तार में
रोड़े आ पड़े थे

सड़क का विस्तार रुक गया था
परिवार का विस्तार हो रहा था

समय अपनी चाल चल रहा था

नाना चल बसे थे
बहूएं आ बसी थी

उनके पोते अपने पाँव पर तो खड़े थे
लेकिन जीवन के और भी तो दुखड़े थे

अपनी आज़ादी का परिचय देने के लिए
खुद को कमरों में कैद करना जरूरी है
अपना आधिपत्य स्थापित करने के लिए
नई नई दीवारें खड़ी करना जरूरी है

एक नहीं
सारे के सारे पेड़ काट दिए गए
ताकि फिर न सर उठा सके
ज़मीन खोद खोद कर
जड़ से ही मिटा दिए गए

मैं साल दो साल में
जब भी वहाँ जाता हूँ
परिवार को हरा-भरा पाता हूँ
लेकिन उस पेड़ को
याद से नहीं मिटा पाता हूँ

मेरे घर में
एक नहीं कई पेड़ हैं
बेडरुम की खिड़की से
देखता हूँ उन्हें
जैसे वो किसी पेंटिंग का हिस्सा हो
मैं उनसे कभी जुड़ नहीं पाता हूँ

सिएटल,
22 मई 2008

Wednesday, May 21, 2008

कवियों की दुनिया

कवियों की दुनिया में गोते लगा रहा हूँ मैं
दोस्त तो नहीं लेकिन दुश्मन बना रहा हूँ मैं

चुटकला नहीं है कविता कि जल्दी समझ गए
कैसे कहूं कि किसलिए ताली नहीं बजा रहा हूँ मैं

सिर्फ़ नाम पढ़ कर सर झुका लेते हैं सब
सच जानते हैं वो भी बस बता रहा हूँ मैं

यूँ तो अपने मन की रचना लिख लेता था मैं
आज का माहौल देख कर सकपका रहा हूँ मैं

मिल गया नोबेल पुरस्कार तो सब विरोधी बनेगे
यह सोच कर शुभचिंतको से कतरा रहा हूँ मैं


सिएटल,
21 मई 2008

लांग वीकेंड

तीन दिन की छुट्टियाँ आई थी
और जिसे देखो कहीं जा रहा था
सारा मोहल्ला खाली होता जा रहा था

वैसे भी यहाँ रहता कौन था
मरघट सा यहाँ रहता मौन था

लेकिन
आते-जाते
कम से कम
दिख तो जाते थे
भागते-दौड़ते ही सही
दुआ-सलाम तो कर जाते थे

अब एक अच्छा बहाना था
भई, लांग वीकेंड है
हम तो यहाँ होगे नहीं
वरना थोड़ी देर आपके साथ बैठते
इधर-उधर की थोड़ी गपशप करते

देखा-देखी हम भी चल पड़े
चलो इसी बहाने परिवार से जुड़ेगे
तीन दिन हम सब साथ रहेगे
दिल से दिल की बात कहेगे

सुबह सवेरे
जग जाते थे हम
किसी न किसी लाईन में
लग जाते थे हम
जहाँ भी गए लाईनें ही देखी
आदमी नहीं कहीं कोई देखा

भागते-दौड़ते सब कुछ देखा
बात करने का भी मिला न मौका

लौट के आए
तो कैमरे में कैद चंद तस्वीरें थी
और माथे पर खींच गई नई लकीरें थी

सिएटल,
21 मई 2008

मैं 25 साल बाद

मैं इस साल दीवाली पर अपने घर जाऊँगा
25 साल बाद
पहली बार दीवाली पर अपने घर जाऊँगा
बहुत सारी यादें संजो कर जाऊँगा
न जाने कितनी वापस ले कर आऊंगा

बचपन में कभी कोई चीज नहीं मांगी
क्या मैं अब मांग पाऊंगा?
बचपन में कभी पटाखें नहीं छोड़े
क्या मैं अब छोड़ पाऊंगा?
बचपन में कभी गले नहीं लगाया
क्या मैं अब गले लगा पाऊंगा?

बचपन में मैं पाँव तो छू पाता था
लेकिन दिल की बात छुपा जाता था
क्या मैं अब बतलाऊँगा
और
क्या मैं अब छुपाऊंगा

गुज़र गई हैं हज़ारों रातें
पुरानी हो चुकी हैं जो बातें
क्या मैं उन्हें फिर से छेड़ पाऊंगा?
अनछुए विषयों को
क्या मैं छू पाऊंगा?
ओझल होते हुए सम्बंधों को
क्या मैं सम्बोधित कर पाऊंगा?

या फिर हमेशा की तरह
जाऊँगा और बस जा कर आ जाऊँगा

मैं 25 साल बाद
अपने घर दीवाली पर जाऊँगा
बहुत सारी यादें संजो कर जाऊँगा
न जाने कितनी वापस ले कर आऊंगा

सिएटल,
21 मई 2008

Tuesday, May 20, 2008

मैं बहता दरिया

मैं बहता दरिया कभी सहरा नहीं होता
तुम्हारी बाहों मे जो मैं ठहरा नहीं होता

भरी दोपहर में झगड़ा और आधी रात को प्यार
इस तरह का रिश्ता कभी गहरा नहीं होता

मैं भी दे सकता था ईंट का जवाब पत्थर से मगर
काश तुम्हारे कंधे पर फूल सा चेहरा नहीं होता

सुनता दिमाग की तो कभी का छोड़ भी देता
काश मेरा दिल इस कदर बहरा नहीं होता

पहले सड़क पर फिर बाज़ार में आ जाते हैं वो
मंज़ूर जिन्हें अपने घर का पहरा नहीं होता

जो भी मिलता है वो बहुत अच्छा लगता है
तब तक जब तक सर पर सेहरा नहीं होता

सिएटल,
20 मई 2008

Monday, May 19, 2008

तिलमिलाना और दिल मिलाना

काश तुम्हारी वफ़ा और जफ़ा में इतना फ़ासला नहीं होता
अब तो तुमसे खुल कर बात करने का भी हौसला नहीं होता

मैं थोड़ा सा तिलमिला गया तो तुमने मुझे बदनाम कर दिया
तुम किसी और से दिल मिला बैठी तो उसका चर्चा नहीं होता

माफ़ कर देता तुझे तीर खा कर भी मैं
बशर्ते तेरी त्रिया का तीर तिरछा नहीं होता

विश्वासघाती होते नहीं हैं सिर्फ़ राजनीति तक सीमित
बस प्यार के मारों का आए दिन धरना नहीं होता


मान भी जाता कि एक दिन पत्थर बनोगी तुम
'गर कंधे पे तेरे फूल सा चेहरा नहीं होता


ईश्वर नहीं है सिलेबस में तो चलो न सही
पर प्यार का भी कोई क्यों पर्चा नहीं होता

सिएटल,
19 मई 2008
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काश = alas
वफ़ा = faithfulness
जफ़ा = antonym of वफ़ा
फ़ासला = distance
हौसला = courage
तिलमिला = writhe in agitation
चर्चा = discussions
त्रिया = devious ways of women
विश्वासघाती = betrayer
धरना = picket
सिलेबस = syllabus
पर्चा = examination paper

Sunday, May 18, 2008

मैं क्यों लिखता हूँ?

क्यों लिखता हूँ हर एक रात मैं
क्यों लिखता हूँ हर एक बात पे

क्यों लिखता हूँ इतना
क्यों भेजता हूँ इतना
क्यों नहीं थोड़ा रुक कर
दो चार बार जरा सोच कर
शिल्प इस पर मढ़ कर
रूप इसका गढ़ कर
फिर कहीं जा कर
क्यों नहीं भेजता हूँ मैं?

चार दिन की है उमर
वो दिन भी हैं उधार से
सफ़र करता हूँ प्लेन से
आँफ़िस जाता हूँ कार से

कभी भी कहीं भी कुछ भी हो सकता है
आप वंचित न रह जाए मेरे विचार से
इसीलिए
लिखता हूँ हर एक रात मैं
लिखता हूँ हर एक बात पे

मेरे अंदर का तेल जल रहा है
मेरे दीप की बाती भभक रही है
दीप जितने हो सके जला लू आज
आग जितनी हो सके लगा दू आज

कल का कोई भरोसा नहीं
न तुम रहो
न मैं रहू
लेकिन यह कतई मंजूर नहीं
कि दुनिया वैसी की वैसी रहे

दीप जितने हो सके जला लू आज
आग जितनी हो सके लगा दू आज
इसीलिए
लिखता हूँ हर एक रात मैं
लिखता हूँ हर एक बात पे

सिएटल,
18 मई 2008

Friday, May 16, 2008

लकीरें

सही-गलत जैसी भी हैं लकीरें
मिटती तो हैं मगर धीरे-धीरे

मिलती है शांति हमें अपने ही भीतर
न गंगा के तट पर न थेम्स के तीरे

पारखी को परख पर यदि होता भरोसा
शीशें में सजा कर क्यों दिखाता वो हीरें

जो देखता हूँ मैं वही देखते हो तुम
बनाते हैं कुछ हम अलग ही तस्वीरें

हमारा आगाज़ भी एक और अंजाम भी एक
कोई ज्यादा अलग नहीं हैं हमारी तक़दीरें

जब तक हूँ कैदी तब तक हूँ राहुल
हो जाऊंगा गुम जैसे ही टूटेगी जंजीरें

सिएटल,
16 मई 2008

गीता

सावन बरसता था
मैं भीगता था
अच्छा लगता था

कोई अपना बरसता था
मैं भीगी बिल्ली बन जाता था
बुरा लगता था

फिर गीता मिली
उसने कहा
अच्छा-बुरा सब भ्रम है
किसी को चाहना
किसी को भुलाना
व्यर्थ का परिश्रम है

रिश्ता निभाना ही तुम्हारा धर्म है
पीड़ा या आनंद पाना तुम्हारा कर्म है

सिएटल,
6 जनवरी 2008

काटना

यह जानते हुए भी कि न कोई है झूठा न कोई है सच्चा
फिर क्यों एक दूसरे को काटना हमें लगता है अच्छा?

कभी काला चश्मा तो कभी कोई अशोक
हर किसी को हम क्यों ठहराते है लुच्चा?

उछालते हैं कीचड़ मगर खुद रहते हैं गुप्त
समझदार हो कर क्यों खा जाते हैं गच्चा?

न कोई है किसी का बाप न किसी का बेटा
फिर क्यों किसी को हम समझते हैं बच्चा?

हर दिन कुछ न कुछ नया सीख जाते है हम
फिर क्यों किसी को हम कहते हैं कच्चा?

चाहे रावण हो पैदा या हो राम पैदा
क्यों नहीं करते कद्र उसकी जो होती है जच्चा?

आपस में ही क्यों नहीं मिटा लेते हैं झगड़ा
पब्लिक में जा कर क्यों धोते हैं कच्छा?

सिएटल,
16 मई 2008
इतना भी तू किसी को सराह ना,
कि भारी पड़ जाए एक दिन सराहना

Thursday, May 15, 2008

आजकल

आजकल सोता कम और ज्यादा जागता हूँ मैं
यह सच नहीं है कि सपनों से दूर भागता हूँ मैं

कभी इधर तो कभी उधर
कभी यहाँ तो कभी वहाँ
दिन भर तो सपनों के आगे पीछे भागता हूँ मैं
यह सच नहीं है कि सपनों से दूर भागता हूँ मैं

अपनों को अपना बनाना है मुझे
कुछ बन के उन्हें दिखाना है मुझे
उठते बैठते दिन रात यही राग अलापता हूँ मैं
यह सच नहीं है कि सपनों से दूर भागता हूँ मैं

ये धुन बसी मेरे मन में जब से
दूर हो गया मैं अपनों से तब से
बस अब अपनों को अपने पास चाहता हूँ मैं
यह सच नहीं है कि सपनों से दूर भागता हूँ मैं

वो मुझ में हैं जिसने मुझे बनाया है
पर हाथ में अब तक नहीं आया है
हज़ार बार लाश की तरह खुद को तलाशता हूँ मैं
यह सच नहीं है कि सपनों से दूर भागता हूँ मैं


सिएटल,
14 फ़रवरी 2008

रिसते रिश्ते

हम तुम जब अलग थे
एक दूसरे के प्रति सजग थे

मेरा फ़क्कड़पन
तुम्हे रास आता था
तुम्हारा अल्हड़पन
मुझे भा जाता था

हम तुम जब अलग थे
एक दूसरे से 'अलग' थे
बाहर के अंतर के बावजूद
अंदर के 'अंतर' से आकर्षित थे

हम तुम अब साथ हैं
बदले-बदले से जज़बात हैं

रिश्ते बनते ही हम बंधने लग जाते हैं
रिश्ते बनते ही हम बनने लग जाते हैं

मन में होता है कुछ
और करने कुछ लग जाते हैं
दिल में होता है कुछ
और कहने कुछ लग जाते हैं
एक दूसरे को छलने लग जाते हैं

हमेशा रही ये धारणा तुम्हारी
कि मैं ही जीता और बस तुम हारी
कटाक्ष के कड़वे तीर
मार के बारी बारी
एक दूसरे को छलने लग जाते हैं

वो मेरा फ़क्कड़पन
वो तुम्हारा अल्हड़पन
वो मेरा ठहाका मार कर हंसना
वो तुम्हारा देर रात तक जगना
एक दूसरे को खलने लग जाते हैं

हमारी पसंद-नापसंद से
हमारे दोस्तो के संग से
हमारे उठने-बैठने के ढंग से
हमारे कपड़ों के रंग से
हमारे व्यक्तित्व पर आवरण चढ़ने लग जाते हैं

उसी आवरण से एक दूसरे को पहचानने लग जाते हैं
और हमारे अंतरगत अंतर और बढ़ने लग जाते हैं

हम तुम जब अलग थे
एक दूसरे के प्रति सजग थे
अब जब हो गया है मिलाप
तो है खामियों का पश्चाताप

एक दूसरे की खामियों को गिनते गिनते
टूटे हुए सपनों के टुकड़े बिनते बिनते
रिश्तों के बंधन में घुटते जाते हैं
रिश्ते के बंधन टूटते जाते हैं
अलग होने के रास्ते खुलने लग जाते हैं

रिश्ते बनते ही हम बंधने लग जाते हैं
रिश्ते बनते ही हम बनने लग जाते हैं

सिएटल
14 दिसम्बर 2007

Glossary:
अंतर = 1. difference 2. soul
अलग = 1. different 2. separate, apart
बनना = 1. pretend 2. to form
छलने = 1. to cheat 2. to pierce and make tiny holes
और = 1. and 2. more
रिसते = 1. oozing, leaking, dripping (as in a wound)

Wednesday, May 14, 2008

दु:ख का सुख

धमाके की खबर जैसे ही दिखी थी
तुरत-फ़ुरत एक कविता लिखी थी
लेकिन फिर भी देर हो चुकी थी
मुझसे पहले कुछ कवि लिख चुके थे
वाह-वाह सबकी लूट चुके थे
बहती गंगा में हाथ धो चुके थे
दु:ख को सुख में बदल चुके थे

दुनिया सारी उम्मीद पर टिकी है
कहीं न कहीं तो फिर विपदा गिरेगी
एक न एक दिन इसे भुनवा के रहूंगा
रेडियो, टी-वी सब ऑन रखूंगा
खबर मिलते ही टूट पड़ूंगा

विस्फोट होगा, धमाका होगा
मेरे लिए एक तमाशा होगा
मेरे अमर हो जाने का
सबसे अच्छा बहाना होगा

सबसे पहले मैं ही भेजूँगा
सब की बधाई पा के रहूंगा
देखो न कितने रंग भरे हैं
खून, चीथड़े, भेड़िये जैसे शब्द रचे हैं
कुछ से दहाड़ रहा है वीर-रस
तो कुछ से टपक रही है करुणा
अपनी संवेदनशीलता का
अपने काव्य शिल्प का
सबसे लोहा मनवा के रहूंगा
दु:ख को सुख में बदल कर रहूंगा

राष्ट्र-गान लिखा जा चुका है
वीर-रस का मौसम नहीं है
कोई युद्ध भी तो होता नहीं है
यही तो मौका बस एक बचा है
जो सारे राष्ट्र को अपील करेगा
बच्चा-बच्चा इसे 'फ़ील' करेगा
लिख कर इसे मैं अमर बनूंगा
दु:ख को सुख में बदल कर रहूंगा

सिएटल,
14 मई 2008
===============================
तुरत-फ़ुरत = quickly
विपदा = calamity
भुनवा = to cash it in (as in a cheque/check)
आँन = on
अपील = appeal
फ़ील = feel

Monday, May 12, 2008

ऐ मेरे वतन के लोगो

ऐ मेरे वतन के लोगो, तुम खूब कमा लो दौलत
दिन रात करो तुम मेहनत, मिले खूब शान और शौकत
पर मत भूलो सीमा पार अपनो ने हैं दाम चुकाए
कुछ याद उन्हे भी कर लो जिन्हे साथ न तुम ला पाए

ऐ मेरे वतन के लोगों, जरा आँख मे भर लो पानी
जो करीब नहीं हैं उनकी जरा याद करो कुरबानी

कोई सिख कोई जाट मराठा, कोई गुरखा कोई मदरासी
सरहद पार करने वाला हर कोई है एक एन आर आई
जिस माँ ने तुम को पाला वो माँ है हिन्दुस्तानी
जो करीब नहीं हैं उनकी जरा याद करो कुरबानी

जब बीमार हुई थी बच्ची या खतरे में पड़ी कमाई
दर दर दुआएँ मांगी, घड़ी घड़ी की थी दुहाई
मन्दिरों में गाए भजन जो सुने थे उनकी जबानी
जो करीब नहीं हैं उनकी जरा याद करो कुरबानी

उस काली रात अमावस जब देश में थी दीवाली
वो देख रहे थे रस्ता लिए साथ दीए की थाली
बुझ गये हैं सारे सपने रह गया है खारा पानी
जो करीब नहीं हैं उनकी जरा याद करो कुरबानी

न तो मिला तुम्हे वनवास ना ही हो तुम श्री राम
मिली हैं सारी खुशीयां मिले हैं ऐश-ओ-आराम
फ़िर भला क्यूं उनको दशरथ की गति है पानी
जो करीब नहीं हैं उनकी जरा याद करो कुरबानी

सींचा हमारा जीवन सब अपना खून बहा के
मजबूत किए ये कंधे सब अपना दाँव लगा के
जब विदा समय आया तो कह गए कि सब करते हैं
खुश रहना मेरे प्यारो अब हम तो दुआ करते हैं
क्या माँ है वो दीवानी क्या बाप है वो अभिमानी
जो करीब नहीं हैं उनकी जरा याद करो कुरबानी

तुम भूल न जाओ उनको इसलिए कही ये कहानी
जो करीब नहीं हैं उनकी जरा याद करो कुरबानी

सेन फ़्रांसिस्को
15 अगस्त 2001
(प्रदीप से क्षमायाचना सहित)

जिसका डंडा उसका झंडा

जैसा देस वैसा भेस, ये सुना था
सोच समझ कर ही देश चुना था
वैसा ही पाया संसार
जैसा ख्वाबों ने बुना था
खुशियों का समंदर बढ़ा
दिन दूना और रात चौगुना था

जबसे आया मिलैनियम ये
तब से हमे मिले नियम ये
जिसका डंडा उसका झंडा
यही है इस युग का फ़ंडा

न जाने किसके गले पड़ेगा फ़ंदा
जो भी मांगे उसे दे दो चंदा
चाहे बाज़ार हो कितना भी मंदा
और न मिले कोई काम धंधा

सब हैं मस्त अपनी धुन में
नहीं कोई अपना सच्चा साथी
सब करते हैं अपना उल्लू सीधा
चाहे हो वो गधा या हाथी

क्या करेगा कोई बंदा
जब लीडर ही हो एक अंधा
नहीं पूरे होते अंधे के सपने
वो होते हैं अनदेखे सपने

बात मेरी मान लो
बस इतना जान लो
जब तक जी चाहे परदेस में रहो
पर जब तक रहो परदे में रहो

ओ परदेसी
परदे सीना ध्यान से
खतरा है स्वाभिमान से
निकले न कहीं म्यान से
झलके न कहीं ज्ञान से

परदे की आड़ में हो सकता है बच जाओ
इस मेल्टिंग पाँट में तुम भी पक जाओ

सेन फ़्रांसिस्को
20 सितम्बर 2001

ये कुलदीप ये cool dude

ये कुलदीप ये cool dude
कमाल का इनका attitude

गुलाब जामुन और चाँकलेट
आलू पराठा और ऑमलेट
ये है इनके pet food
ये कुलदीप ये cool dude ...

पढ़ते लिखते दिन और रात
अव्वल आते हर जमात
काश ये होते इतने good
ये कुलदीप ये cool dude ...

संगीत इनका धूम-धड़ाक
बात करते तू-तड़ाक
behavior इनका very crude
ये कुलदीप ये cool dude ...

सुबह से हो जाता शुरू
TV जो इनका है गुरू
मार्गदर्शक इनका hollywood
ये कुलदीप ये cool dude ...

दिल को लगे ठेस सी
देख के इनकी प्रेयसी
लोग कहते हम हैं prude
ये कुलदीप ये cool dude ...

नाम के होते हैं parents
जो pay करते हैं इनके rent
और बदले में चाहे gratitude
ये कुलदीप ये cool dude ...

कपड़े इनके कटे-फ़टे
दुनिया से रहते कटे-कटे
डाल के सर पे अपने hood
ये कुलदीप ये cool dude ...

आने-जाने पे नहीं है रोक
खाने-पीने पे नहीं है रोक
फिर भी मांगे और latitude
ये कुलदीप ये cool dude ...

सेन फ़्रांसिस्को
अक्टूबर 2002

21 वीं सदी

डूबते को तिनका नहीं 'lifeguard' चाहिए
'graduate' को नौकरी ही नहीं एक 'green card' चाहिए

खुशीयाँ मिलती थी कभी शाबाशी से
हर किसी को अब 'monetary reward' चाहिए

जो करते थे दावा हमारी हिफ़ाज़त का
उन्हे अपनी ही हिफ़ाज़त के लिये 'bodyguard' चाहिए

घर बसाना इतना आसान नहीं इन दिनों
कलेजा पत्थर का और हाथ में 'credit card' चाहिए

'blog, email' और 'newsgroup' के ज़माने में
भुला दिये गये हैं वो जिन्हे सिर्फ़ 'postcard' चाहिए

सिएटल,
24 फ़रवरी 2007

मर्ज़

बाबुल चाहे सुदामा हो
ससुराल चाहे सुहाना हो
नया रिश्ता जोड़ने पर
अपना घर छोड़ने पर
दुल्हन जो होती है
दो आँसू तो रोती है

और इधर
हर एक को खुशी होती हैं
जब मातृभूमि
संतान अपना खोती हैं

क्यूं देश छोड़ने की
इतनी सशक्त अभिलाषा है?
क्या देश में
सचमुच इतनी निराशा है?

जाने कब क्या हो गया
वजूद जो था खो गया
ज़मीर जो था सो गया
लकवा जैसे हो गया

भेड़-चाल की दुनिया में
देश अपना छोड़ दिया
धनाड्यों की सेवा में
नाम अपना जोड़ दिया

अपनी समृद्ध संस्कृति से
अपनी मधुर मातृभाषा से
मुख अपना मोड़ लिया
माँ बाप का दिया हुआ
नाम तक छोड़ दिया

घर छोड़ा
देश छोड़ा
सारे संस्कार छोड़े
स्वार्थ के पीछे-पीछे
कुछ इतना तेज दौड़े
कि न कोई संगी-साथी है
न कोई अपना है
मिलियन्स बन जाए
यहीं एक सपना है

करते-धरते अपनी मर्जी हैं
पक्के मतलबी और गर्जी हैं
उसूल तो अव्वल थे ही नहीं
और हैं अगर तो वो फ़र्जी है

पैसों के पुजारी बने
स्टाँक्स के जुआरी बने
दोनों हाथ कमाते हैं
फिर भी क्यूं उधारी बने

किसी बात की कमी नहीं
फिर क्यूं चिंताग्रस्त हैं
खाने-पीने को बहुत हैं
फिर क्यूं रहते त्रस्त हैं
इन सब को देखते हुए
उठते कुछ प्रश्न हैं

पैसा कमाना क्या कुकर्म है?
आखिर इसमें क्या जुर्म है?
जुर्म नहीं, ये रोग है
विलास भोगी जो लोग है
'पेरासाईट' की फ़ेहरिश्त में
नाम उनके दर्ज हैं
पद-पैसो के पीछे भागना
एक ला-ईलाज मर्ज़ है

सिएटल,
24 फ़रवरी 2007

क़हर

पहले भी बरसा था क़हर
अस्त-व्यस्त था सारा शहर
आज फ़िर बरसा है क़हर
अस्त-व्यस्त है सारा शहर

बदला किसी से लेने से
सज़ा किसी को देने से
मतलब नहीं निकलेगा
पत्थर नहीं पिघलेगा
जब तक है इधर और उधर
मेरा ज़हर तेरा ज़हर

बुरा है कौन, भला है कौन
सच की राह पर चला है कौन
मुक़म्मल नहीं है कोई भी
महफ़ूज़ नहीं है कोई भी
चाहे लगा हो नगर नगर
पहरा कड़ा आठों पहर

न कोई समझा है न समझेगा
व्यर्थ तर्क वितर्क में उलझेगा
झगड़ा नहीं एक दल का है
मसला नहीं आजकल का है
सदियां गई हैं गुज़र
हुई नहीं अभी तक सहर

नज़र जाती है जिधर
आँख जाती है सिहर
जो जितना ज्यादा शूर है
वो उतना ज्यादा क्रूर है
ताज है जिनके सर पर
ढाते हैं वो भी क़हर

आशा की किरण तब फूटेंगी
सदियों की नींद तब टूटेंगी
ताज़ा हवा फिर आएगी
दीवारे जब गिर जाएंगी
होगा जब घर एक घर
न तेरा घर न मेरा घर

सेन फ़्रांसिस्को
24 सितम्बर 2002
(अक्षरधाम पर हमले के बाद)

ॠषिवर

हम भी अजीब हैं
अल्ज़्हाईमर्स के मरीज हैं
वो है हम सब में
और हम ही को खबर नहीं है

ठीक उसी तरह जैसे
आँखे जो सब कुछ देखती हैं
नहीं देख पाती हैं खुद को

तलाश है एक आईने की
जो दिखा दे मुझे मेरी आत्मा
मेरा अंतर मेरा परमात्मा

आशा कम है चूंकि
आईने की नहीं
रिसिवर की है ज़रुरत
जैसे कि रेडियो वेव्स को
न तो देखा जा सकता हैं
न सुना जा सकता हैं
न सूंघा जा सकता हैं
न छुआ जा सकता हैं
न काटा जा सकता हैं
न मारा जा सकता हैं

क्या कृष्ण इसी की बात कर रहे थे?
अर्जुन को स्पंदन से ज्ञात कर रहे थे?

कैसे बनूं रिसिवर?
देखे हैं कई ॠषिवर
सिर पर है शिखा
जैसे कि एंटीना

पर वो तो बाद की बात है
बाहरी सजावट की बात है

मुझे अपनी पात्रता बढ़ानी होगी
ईर्ष्या दिल से मिटानी होगी
धूल मिट्टी कचरा हटाना होगा

कैसे बनूं रिसिवर?

सेन फ़्रांसिस्को
जुलाई 2002

कुदरत का खेल या ईश्वर का प्रकोप?

तूफ़ान आया
आ कर बरस गया
पानी में डूबा शहर
पानी को तरस गया

उफ़ान नदी का
उतर गया
आँखों में
समंदर ठहर गया

इस में भी उसका हाथ होगा
कुछ लेन-देन का हिसाब होगा
समझाते हैं अपने आप को
ढूंढते हैं अपने पाप को

तूफ़ान हो या कोई क़हर हो
खतरे का कोई पहर हो
कोंसते हैं अपने आप को
सहते हैं हर अभिशाप कि

कब मुक्ति हो इस पापी की
कब दया हो सर्वव्यापी की

सेन फ़्रान्सिस्को
सितम्बर 2005
(हरिकेन कटरिना के बाद)

Friday, May 9, 2008

मैं आरगेनिक नहीं हूँ

मैं आरगेनिक नहीं हूँ
मुझे फ़र्टिलाईज़र और पेस्टिसाईड दे कर
बड़ा किया गया है
रात रात जाग कर
फिज़िक्स की प्राँब्लम्स
और गणित के समीकरण
हल किए हैं मैंने
अंग्रेज़ी के कई कठिन शब्द
याद किए हैं मैंने

देखो तो सही
अभी 10 साल का हुआ नहीं है
और इसे 100 तक के सारे
प्राईम नम्बर्स
स्क्वेयर रूट्स
और क्यूब रूट्स
मुँह जबानी याद है
मैं इसे
बोर्नविटा पिलाती हूँ
मेधावटी खिलाती हूँ
रोज सुबह 10 बादाम का
हलवा खिलाती हूँ
देखना एक दिन जरूर आई-आई-टी जाएगा
और विदेश जा कर अपना घर बसाएगा

मैं ज़िंदगी के पहले 20-22 वर्ष
इसी तरह गुज़ार देता हूँ
फ़्लैट की चार-दीवारी में
होस्टल के गलियारों में
टेबल-लैम्प की रोशनी में
पंखों के शोर में

ज़िंदगी का मतलब हो जाता है
कोचिंग
कम्पीटिशन
और पैसा कमाना

शरीर बड़ा हो जाता है
लेकिन दिमाग में
आंकड़ें,
फ़ार्मूलें,
रेस्निक-हेलिडे के हल
घर कर जाते हैं
त्योहार, रस्में, रीत-रिवाज़
सारे के सारे
दरकिनार हो जाते हैं
होली एक हुड़दंग
दीवाली पटाखों का शोर
और पूजा-पाठ एक आडम्बर
बन कर रह जाते हैं

मैं धीरे-धीरे
अलग हो जाता हूँ
अपने परिवार से
अपने समाज से
अपनी संस्कृति से

बड़ा हो जाने पर
मुझे धो-पोछ कर
सजा-धजा कर रख दिया जाता है
वो आते हैं
और मुझे ले कर चले जाते हैं

आज पार्टी है घर में
थोड़ा सलाद के लिए
खीरे-टमाटर-मूली-गाजर भी ले चले
और हाँ उस डाट-नेट प्रोजेक्ट के लिए
ये तीन ठीक रहेंगे
ताजा भी है
दाम भी कम है

जैसे क्रेडिट कार्ड से कोई
सब्जी खरीदता है
वैसे ही ग्रीन कार्ड दे कर
मुझे साथ ले कर चले जाते हैं

और देखते ही देखते
मैं धनाड्यों की फ़्रिज़ की
शोभा बढ़ाने लग जाता हूँ
और उस नियंत्रित वातावरण में
खुद को
सुरक्षित
और भाग्यशाली
समझने लगता हूँ

न आंधी का डर
न तूफ़ां का खौफ़
न चिलचिलाती धूप
न भिनभिनाते मच्छरों का डर

मैं आरगेनिक नहीं हूँ
आरगेनिक होता
तो कब का मिट्टी में मिल गया होता
फ़र्टिलाईज़र और पेस्टिसाईड्स के कारण
फ़्रिज के नियंत्रित वातावरण के कारण
एक लम्बी दासता का बोझ है मुझ पर

यही है दास्तां मेरी
कि
मैं आरगेनिक नहीं हूँ

सिएटल,
9 मई 2008
==================================
आरगेनिक = Organic, developing in a manner analogous to the natural growth and evolution characteristic of living organisms; arising as a natural outgrowth.
फ़र्टिलाईज़र = fertilizer
पेस्टिसाईड = pesticide
फिज़िक्स = physics
प्राँब्लम्स = problems
समीकरण = equations
प्राईम नम्बर्स = prime numbers
स्क्वेयर रूट्स = square roots
क्यूब रूट्स = cube roots
बोर्नविटा = Bournvita
आंकड़ें = data
दरकिनार = sidelined
सजा-धजा = decorate
डाट-नेट = .Net
क्रेडिट कार्ड = credit card
ग्रीन कार्ड = green card
धनाड्य = wealthy
फ़्रिज = fridge, refrigerator
दासता = slavery
दास्तां = tale, story, saga

किताब छपी?

न छपी है,
न छपवाऊंगा
पैसे दे कर मैं कभी किताब नहीं छपवाऊंगा

न है शिल्प का ज्ञान
न है छंद की पहचान
फिर भी रोज नई नई रचना
पेश करता जाउंगा
पन्ना एक एक रोज भेज कर
आपको झकझोड़ता जाऊंगा
लेकिन
पैसे दे कर मैं कभी किताब नहीं छपवाऊंगा
न छपी है …

छप गई किताब जो
बिकी नहीं किताब तो
पाठकों को
प्रकाशकों को
मैं कोसता ही जाऊँगा
इसीलिए
पैसे दे कर मैं कभी किताब नहीं छपवाऊंगा
न छपी है …

अच्छी हुई समीक्षा तो
समीक्षक को पकवान मैं खिलाऊंगा
बुरी हुई समीक्षा तो
समीक्षक को मजा मैं चखलाऊंगा
और समीक्षा ही नहीं हुई तो
समीक्षकों की सारी कौम को
चुने हुए नाम देता जाऊंगा
इसीलिए
पैसे दे कर मैं कभी किताब नहीं छपवाऊंगा
न छपी है …

न तुलसी ने बेची, न कबीर ने बेची
फिर भी ज़माना आज तक पढ़ता उन्हे हैं
भूख जिनकी मिटती नहीं है
कविता बेचना सिर्फ़ पड़ता उन्हे हैं

न बेटी की शादी
न बेटे का एडमिशन
न बीमारी का कोई बहाना है
कविता बेच कर इसे
आजीविका का साधन मुझे नहीं बनाना है

कविता में खुद्दारी झाड़ता हूँ इतनी
ज़िंदगी में भी खुद्दारी दिखाऊंगा
पैसे दे कर मैं कभी किताब नहीं छपवाऊंगा
न छपी है …

बाजुओं में जब तक दम है मेरे
कविता की दुहाई दे कर
हाथ नहीं फ़ैलाऊंगा
कविता लिखी है मर्जी से मैंने
मर्जी से ही लिखता जाऊंगा
न प्रकाशक
न आयोजक
किसी के भी दबाव में न आऊंगा
पैसे दे कर मैं कभी किताब नहीं छपवाऊंगा
न छपी है …

अगर आपके पास वक़्त है
तो सारी कविताएँ मुफ़्त हैं
पढ़िए, भेजिए, जो चाहे आप कीजिए
सारे बंधनों से आप मुक्त हैं

पन्ने पलट कर
बिस्तर में लेट कर
पढ़ना यदि आप चाहते हैं
तो आदेश मुझे दीजिए
ई-मेल मुझे भेजिए
सिर्फ़ आपके और आपके ही लिए
मैं एकमात्र प्रति छापता जाऊंगा
लेकिन
पैसे दे कर मैं कभी किताब नहीं छपवाऊंगा
न छपी है …


सिएटल,
9 मई 2008

Wednesday, May 7, 2008

मैं अपनी माँ से दूर

मैं अपनी माँ से दूर अमेरिका में रहता हूँ
बहुत खुश हूँ यहाँ मैं उससे कहता हूँ

हर हफ़्ते
मैं उसका हाल पूछता हूँ
और अपना हाल सुनाता हूँ

सुनो माँ,
कुछ दिन पहले
हम ग्राँड केन्यन गए थे
कुछ दिन बाद
हम विक्टोरिया-वेन्कूवर जाएगें
दिसम्बर में हम केन्कून गए थे
और जून में माउंट रेनियर जाने का विचार है

देखो न माँ,
ये कितना बड़ा देश है
और यहाँ देखने को कितना कुछ है
चाहे दूर हो या पास
गाड़ी उठाई और पहुँच गए
फोन घुमाया
कम्प्यूटर का बटन दबाया
और प्लेन का टिकट, होटल आदि
सब मिनटों में तैयार है

तुम आओगी न माँ
तो मैं तुम्हे भी सब दिखलाऊँगा

लेकिन
यह सच नहीं बता पाता हूँ कि
20 मील की दूरी पर रहने वालो से
मैं तुम्हें नहीं मिला पाऊँगा
क्यूंकि कहने को तो हैं मेरे दोस्त
लेकिन मैं खुद उनसे कभी-कभार ही मिल पाता हूँ

माँ खुश है कि
मैं यहाँ मंदिर भी जाता हूँ
लेकिन
मैं यह सच कहने का साहस नहीं जुटा पाता हूँ
कि मैं वहाँ पूजा नहीं
सिर्फ़ पेट-पूजा ही कर पाता हूँ

बार बार उसे जताता हूँ कि
मेरे पास एक बड़ा घर है
यार्ड है
लाँन में हरी-हरी घास है
न चिंता है
न फ़िक्र है
हर चीज मेरे पास है
लेकिन
सच नहीं बता पाता हूँ कि
मुझे किसी न किसी कमी का
हर वक्त रहता अहसास है

न काम की है दिक्कत
न ट्रैफ़िक की है झिकझिक
लेकिन हर रात
एक नए कल की
आशंका से घिर जाता हूँ
आधी रात को नींद खुलने पर
घबरा के बैठ जाता हूँ

मैं लिखता हूँ कविताएँ
लोगो को सुनाता हूँ
लेकिन
मैं यह कविता
अपनी माँ को ही नहीं सुना पाता हूँ

लोग हँसते हैं
मैं रोता हूँ

मैं अपनी माँ से दूर अमेरिका में रहता हूँ
बहुत खुश हूँ यहाँ मैं उससे कहता हूँ

सिएटल,
7 मई 2008

गाईड

बनने चला था कवि
मैं 'गाईड' बन गया हूँ
बेसहारा बेबस की
मैं 'राईड' बन गया हूँ

न बुद्धिजीवों में 'हिट' हूँ
न किसी फ़्रेम में मैं 'फ़िट' हूँ
विरोध तो होता है लेकिन
मैं भी बड़ा ढीट हूँ
सास भी जिस से डरे
मैं वो 'ब्राईड' बन गया हूँ

जिस थाली में खाता हूँ
उसी में छेद कर रहा हूँ
सदियों पुरानी मान्यताओं
में हस्तक्षेप कर रहा हूँ
आरोप है कि अंधो के बीच
मैं 'वन-आईड' बन गया हूँ

शब्दों से खेलता हूँ
सब की पोल खोलता हूँ
किसी को नहीं बख्शा है
खुद को भी टटोलता हूँ
समाज की गंदगी का
मैं 'टाईड' बन गया हूँ

पढ़ते हैं वो देशवासी
जो दूर हैं अपने देश से
कभी खुश हैं तो कभी दुखी
अपने कर्म से परिवेश से
उनकी भावनाओं का
मैं 'प्राईड' बन गया हूँ

सिएटल,
7 मई 2008
=========================
गाईड = guide
राईड = ride, lift, a means of or arrangement for transportation by motor vehicle:
हिट = hit
फ़्रेम = frame
फ़िट = fit
ढीट = stubborn
ब्राईड = bride
वन-आईड = one eyed, काना,
बख्शा = spared
टाईड = Tide, a popular laundry detergent
परिवेश = environment
प्राईड = pride

Monday, May 5, 2008

कोई अपना

न होती कभी क्रांति अगर यह कर नहीं होता
शासन का अर्थ तो यह कर वह कर नहीं होता

आँखों ही आँखों में हो जाती हैं बातें
कोई पराया अपना कह कर नहीं होता


न जाने कब कैसे बदल जाते हैं लोग
कोई अपना पराया कह कर नहीं होता

इतना भी ग़म न करो बिछड़ने का यारों
प्यार का अहसास साथ रह कर नहीं होता

बूंद-बूंद बचाने से ही भरता है घड़ा
समंदर भी समंदर बह कर नहीं होता

चीखों, चिल्लाओं, थोड़ा हंगामा करो
कोई मसीहा कभी दर्द सह कर नहीं होता


सिएटल,
5 मई 2008
========================
क्रांति = American revolution of 1775-1783,
यह कर = this tax
यह कर, वह कर = do this, do that
मसीहा = a zealous leader of some cause

Friday, May 2, 2008

अनवरत चक्र

मैं हर पल चलायमान हूँ

निर्धारित गति से
निर्धारित दिशा में
हर पल
चलता ही रहता हूँ

मेरे चलने से
दुनिया के कई फ़ायदे हैं
मुझसे ही बंधे
इसके नियम कायदे हैं

मेरे चलने से
मेरा खुद का कोई फ़ायदा नहीं है
घूम-फिर कर
मैं वहीं लौट जाता हूँ
जहाँ से मैं पहले कभी चला था

घड़ी की एक सुई की तरह

फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि
सेकंड को लगता है एक मिनट
और मुझे लगता है एक जीवन

सेकंड की सुई की तरह
मेरे ईर्द-गिर्द नम्बर
घटते-बढ़ते रहते हैं
लेकिन मेरा अस्तित्व
जैसे का तैसा रहता है
उपर-नीचे इधर-उधर
घूमने का क्रम बना रहता है

कहते हैं कि
कर्म के बदलने से
क्रम बदल सकते हैं
इस अनवरत चक्र से
बच के निकल सकते हैं

देख रहा हूँ पृथ्वी को
एक अरसा हो गया है
और उसके कर्म नहीं बदले हैं
365 दिन बाद
पहुँचती है ठीक वहीं
जहाँ से वो चली थी

अगर
गति इसने बदली
कर्म इसने बदले
क्रम इसका बदला
तो
अनर्थ हो जाएगा
तहस-नहस हो जाएगा
सब कुछ नष्ट हो जाएगा

लेकिन ध्यान से सोचो तो
उसी में मेरी मुक्ति है

पृथ्वी की सुनिश्चित गति
हमारी कामनाओं का फल है
हम माया के वशीभूत
इसकी सुरक्षा की कामना करते है
जब तक घर है
हम घर से बंधे रहते हैं
घर छूटते ही
मुक्त हम हो जाएगे

सिएटल,
2 मई 2008

बंजर

बंजर है
यहाँ की भूमि
जहाँ कोई बीज
अंकुरित नहीं होता है
विश्व के कोने-कोने से
खिले-खिलाए फूल
ग्रीन कार्ड के बदले
तोड़ के लगा दिए जाते हैं
अपने बाग-बगीचों से
अलग कर दिए जाते हैं


शो-पीस है
यहाँ का किचन
जहाँ कोई पकवान नहीं पकता है
सब बनता है और कहीं
सिर्फ़ गर्म यहाँ हुआ करता है

दिग्भ्रमित है
यहाँ की जनता
जिनका अपना न कोई मत होता है
गिने-चुने टी-वी चैनल्स
की मन-मरजी से ही
सब कुछ यहाँ होता है

पीड़ित है
यहाँ की नई पीढ़ी
टी-बी से नहीं
टी-वी से
एल-एस-डी से नहीं
एल-सी-डी से
दिन-रात जिनका
स्क्रीन से रिश्ता बना रहता है

वंचित है
यहाँ के वृद्ध
स्वयं अपने ही परिवार से
मिलने चाहिए जिनसे संस्कार
मारे-मारे फिरते हैं वो बेकार से

क्लबनुमा हैं
यहाँ के धर्मस्थल
जहाँ न मिलता है ईश्वर
और न मिलता है ईश्वर का बंदा
होते हैं चंद भाषण
और एकत्रित किया जाता है चंदा

श्रमप्रधान है
यहाँ का जीवन
जहाँ हर काम की है कीमत
और हर मिनट पैसा बनता है
लेकिन कर्मचारी फिर भी
उधारी में जा कर फ़ंसता है

संदिग्ध है
यहाँ का विकास
जो एक तरफ़ तो
छूना चाहता है आकाश को
और दूसरी तरफ़
अग्रसर है पाताल को

अनिश्चित है
यहाँ का भविष्य
जहाँ तीव्र-गति से जीवन चलता है
लेकिन रेंगती है आत्मा
जहाँ नि:शब्द हर कोई रहता है
लेकिन शांति को फिर भी
तलाशता ही रहता है

सिएटल,
2 मई 2008
=================
Glossary:
टी-बी = Tuberculosis of the lungs, characterized by the coughing up of mucus and sputum, fever, weight loss, and chest pain.

एल-एस-डी = LSD, a crystalline solid, C20H25N3O, the diethyl amide of lysergic acid, a powerful psychedelic drug that produces temporary hallucinations and a schizophrenic psychotic state

एल-सी-डी = LCD, liquid-crystal display: a method of displaying readings continuously, as on digital watches, portable computers, and calculators, using a liquid-crystal film, sealed between glass plates, that changes its optical properties when a voltage is applied.

Thursday, May 1, 2008

दोस्त दोस्त ना रहा

(ओबामा अपने धर्मगुरु पर नाराज़ के संदर्भ में ओबामा को मतदाताओं का संदेश)

दोस्त दोस्त ना रहा
प्यार प्यार ना रहा
ओबामा हमें तेरा
ऐतबार ना रहा, ऐतबार ना रहा

सत्ता के लोभ में
गुरु को छोड़ के चल दिए
अपने उसूल
अपनी जड़ को तोड़ के चल दिए
मुखौटे नकली चढ़ गए
असली किरदार ना रहा
ओबामा हमें तेरा
ऐतबार ना रहा, ऐतबार ना रहा

तुमने बदलाव लाने के
सपने हमें दिखाए थे
खुद इतने बदल जाओगे
सोच नहीं हम पाए थे
तुम्हे देने लायक
अब उपहार ना रहा
ओबामा हमें तेरा
ऐतबार ना रहा, ऐतबार ना रहा

सिएटल,
1 मई 2008
(शैलेंद्र से क्षमायाचना सहित)
=================
Glossary:
ओबामा = Obama
ऐतबार = trust
सत्ता = power
लोभ = greed
उसूल = principles
जड़ = roots
मुखौटे = masks
किरदार = character
बदलाव = change
बदल = turncoat
उपहार = gift

कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे

(ओबामा अपने धर्मगुरु पर नाराज़ के संदर्भ में धर्मगुरु की ओर से ओबामा को संदेश)

कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे
तड़पता हुआ जब कोई छोड़ दे
तब तुम मेरे पास आना ओबामा
मेरा चर्च खुला है खुला ही रहेगा
तुम्हारे लिये, कोई जब ...

अभी तुमको मेरी ज़रूरत नहीं
बहुत सलाहकार मिल जाएंगे
अभी मीडिया के डार्लिंग हो तुम
आर्टिकल जितने चाहोगे लिख जाएंगे
दर्पण तुम्हें जब डराने लगे
वोटर्स भी हाथ से जाने लगे
तब तुम मेरे पास आना ओबामा
मेरा दिल बड़ा है, बड़ा ही रहेगा
तुम्हारे लिये, कोई जब ..
.
कोई तकरार होती नहीं गुरु-शिष्य में
मगर झगड़ा तुमने कर ही लिया
पोल्स में नम्बर जो गिरे ज़रा
नाता जो था तुमने तोड़ ही दिया
जब अपनी नज़र में ही गिरने लगो
अंधेरों में अपने ही घिरने लगो
तब तुम मेरे पास आना ओबामा
ये दीपक जला है जला ही रहेगा
तुम्हारे लिये, कोई जब ...

सिएटल,
1 मई 2008
(इंदीवर से क्षमायाचना सहित)
=================
Glossary:
ओबामा = Obama
मीडिया = media

डार्लिंग = darling
आर्टिकल = article
दर्पण = mirror
वोटर्स = voters
पोल्स = polls