Friday, August 29, 2008

टिप्पणी लिखोगी तो बात समझ में आ जाएगी

टिप्पणी लिखोगी तो बात समझ में आ जाएगी
लोग अनायास तारीफ़ का सबब पूछेंगे
ये भी पूछेंगे कि तुम इतनी मेहरबाँ क्यूँ हो
उंगलियाँ उठेंगी भीगे हुए लफ़्ज़ो की तरफ़
शक की निगाह से देखेंगे एक एक हिज्जो की तरफ़
एक एक शब्द के कई अर्थ निकाले जायेंगे
न जाने किस किस तरह के गुमाँ पाले जाएंगे
लोग ज़ालिम हैं हर इक बात का ताना देंगे
बातों बातों में हमारा रिश्ता भी जोड़ जाएंगे
हो सके तो एनानिमस टिप्पणी भी मत लिखना
वरना आई-पी एड्रेस से समझ जाएंगे
चाहे कुछ भी हो बस ई-मेल ही लिखना मुझको
मेरे बारे में कोई बात न करना उनसे
टिप्पणी लिखोगी तो बात समझ में आ जाएगी

सिएटल,
29 अगस्त 2008
(कफ़ील आज़ेर से क्षमायाचना सहित)
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अनायास = all of a sudden
सबब = cause
हिज्जा = spelling of a word
गुमाँ = imagination, fancy, doubt
एनानिमस = anonymous
आई-पी एड्रेस = IP address
ई-मेल = e-mail

Thursday, August 28, 2008

प्रियतम

कहते कहते प्रियतम
तुम्हें लगने लगा है प्रिय तम
अब अंधेरा ही तुम्हे रास आता है
और वहीं रहती हो तुम हरदम

गाते गाते सरगम
चढ़ने लगा है तुम्हारे सर ग़म
अब उदास और निराश ही
रहती हो तुम हरदम

अरे, ऐसी भी क्या है बेबसी?
तुम तो सुंदर थी एक बेब सी
इस प्यार-वफ़ा के चक्कर में
क्यूँ सिकुड़ गई सड़े सेब सी?

इस से तो अच्छे हैं वो मंकी
जो कर लेते हैं अपने मन की
न करते हैं कोई गिला-शिकवा
न रखते हैं शर्त किसी बंधन की

सिएटल,
28 अगस्त 2008
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तम = अंधेरा
बेब = babe
सेब = सेव
मंकी = monkey

Wednesday, August 27, 2008

अपने एच-वन की उलझन को

अपने एच-वन की उलझन को कैसे मैं सुलझाऊँ
औरों को जो ग्रीनकार्ड मिले हैं कैसे मैं पा जाऊँ

बॉस के वादे हो गए झूठे
सारे सपनें टूटे
घिसघिस के वो काम कराए
चैन मेरा वो लूटे
ऐसे लीचड़-पाजी से मैं कैसे साथ निभाऊँ

मेरा पासपोर्ट वो छुपाए
बाँड मुझसे वो भरवाए
कोई ना जाने इस विलैन को
ये किस तरह सताए
कर ना पाऊँ वकील कोई पल-पल मैं घबराऊँ

आया जब से ऐसा फ़ंसा हूँ
मुझसे सहा ना जाए
लिखना चाहूँ ब्लाग पे अपने
फिर भी लिखा ना जाए
जौंक की तरह मुझसे चिपका कैसे पीछा छुड़ाऊँ

सिएटल,
27 अगस्त 2008
(एम-जी हशमत से क्षमायाचना सहित)
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एच-वन = H1
बॉस = Boss
बाँड = bond
ब्लाग = blog

Monday, August 25, 2008

बहुत घटिया, बड़ी अधपकी सी

बहुत घटिया, बड़ी अधपकी सी
लिखी कविता आपने जो मन को उबाएँ
सब करे वाह वाह, मैं रहूँ चुप-चुप
करूँ क्या ये मेरी समझ में न आए

कहूँ अति सुंदर या कहूँ अच्छी
या कह डालूँ बात सारी सच्ची
ख़ुदा करे कुछ ऐसा
कि आगे आप और कुछ लिख ही न पाए

लिखी तो बहुत है, नहीं एक में भी दम है
कि एकाध तो ऐसी कि जैसे बलगम है
मगर ये पाठक दुआ माँगता है
कि आपकी कलम और दवात छूट जाए

मुझे डर है आपमें ग़ुरूर आ न जाए
लगे झूमने और सुरूर आ न जाए
कहीं आप झूठी तारीफ़ सुनकर
लिखने के साथ साथ गाने न लग जाए

सिएटल,
25 अगस्त 2008
(एस-एच बिहारी से क्षमायाचना सहित)
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बलगम = phlegm

Saturday, August 23, 2008

तेरी खुशबू में बसी ई-मेल्स

तेरी खुशबू में बसी ई-मेल्स मैं डिलिट करता कैसे?
तेरी स्माईली से भरे आय-एम्स मैं डिलिट करता कैसे?

कभी रोमन तो कभी यूनिकोड में जो ख़त तूने लिखें
तूने दुनिया की निगाहों से जो बचाकर लिखे,
कभी घर तो कभी दफ़्तर से जो आय-एम तूने भेजें
कभी दिन में तो कभी रात में उठकर लिखे

जिनका हर लफ़्ज़, हर फ़ाँट मुझे याद था पानी की तरह,
प्यारे थे मुझको एक एक कॉमा, एक एक डॉट,
एक एक एक्रोनिम किसी अनमोल निशानी की तरह

तेरी खुशबू में बसी ई-मेल्स मैं डिलिट करता कैसे?
प्यार मे डूबे हुए आय-एम्स मैं डिलिट करता कैसे?
तेरे हाथों से लिखा 'आप भी ना' मैं डिलिट करता कैसे?

मैं उस कम्प्यूटर पर आज एक वाईरस छोड़ आया हूँ
मैं जो मरता हूँ तो क्या रोग उसे भी लगा आया हूँ

आज के बाद मेरे ब्लाग पर तुम मेरी कविताएँ पढ़ना
मेरी कविताएँ पढ़ कर मेरे हाल का अंदाज़ा करना
और हो सके तो मेरे वास्ते एक टिप्पणी लिखना

सिएटल,
23 अगस्त 2008
(राजेन्द्रनाथ रहबर से क्षमायाचना सहित)
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ई-मेल्स = emails
डिलिट = delete
स्माईली = smiley
आय-एम्स = IM, Instant Messenger
फ़ाँट = font
कॉमा = comma
डॉट = dot (.)
एक्रोनिम = acronym, जैसे कि ए-मि, शे-फि, OMG
कम्प्यूटर = computer
वाईरस = virus
ब्लाग = blog

Friday, August 22, 2008

बच्चे हमारे आज हो गए बड़े

बच्चे हमारे आज हो गए बड़े
पाँव पर अपने देखो ये हैं खड़े

नन्हें-मुन्नों को ले आगे बढ़े
हँसें तो लगे जैसे मोती जड़े

आओ चलो मिलकर दुआ करें
सफ़लता की सीढ़ी ये हरदम चढ़ें
आए मुसीबत, डट कर लड़ें
दिन दूनी रात चौगुनी ख्याति बढ़े
मिले पुरुस्कार, खिताब बड़े
इनके ही चर्चे, इनके ही किस्से
सदा सुनें और सदा पढ़ें

फ़ोर्ट वॉर्डेन

17 अगस्त 2008


[अनूप जी के कहने पर इस कविता और ट्रिप के बारे में थोड़ा खुलासा।

13 अगस्त से 17 अगस्त तक सिएटल की एक संस्था - आई-ए-डबल्यू-डबल्यू - (पश्चिमी वाशिंगटन भारतीय संघ) ने "कैम्प भारत 2008" का आयोजन किया था। स्थान था सिएटल से कुछ दूर, पोर्ट टाउनसेंड स्थित "फ़ोर्ट वार्डेन।" ये कोई किला नहीं है, बल्कि एक परिसर है जहाँ से तोप आदि शस्त्र के साथ सैनिक एक खास मुकाम की किसी आक्रमण से रक्षा करते है। यहाँ सैनिक रहते तो थे, तोपें भी थी, लेकिन यहाँ कभी भी कोई लड़ाई नहीं हुई, क्योंकि कोई आक्रमण भी नहीं हुआ।

अब इस फ़ोर्ट को एक रिज़ोर्ट का रुप दे दिया गया है - जहाँ सैनिको के केबिन को होटल के कमरों में बदल दिया गया है। कई तरह की आधुनिक सुविधाए मौजूद है। एक शानदार भोजनालय है - जहाँ अत्यंत स्वादिष्ट भोजन बनाया जाता है और अति सुरुचिपूर्ण तरीके से परोसा जाता है।

"कैम्प भारत 2008" में 9 वर्ष से 17 वर्ष की आयु तक के कुल 160 बच्चे थे। उनमें से 15-17 वर्षीय बच्चों को वाय-बी और वाय-सी नियुक्त किया गया और इन्होंने ज़िम्मेदारी ली इस कैम्प की रूपरेखा तैयार करने की और उसे चलाने की। कब क्या होगा, कहाँ होगा, कैसे होगा। सब इनके सर पर। मुझ जैसे 16 वयस्क स्वयंसेवक नियुक्त किए गए जो कि ज़रुरत पड़ने पर इन वाय-बी/वाय-सी की मदद कर सके। जैसे कि खेल कूद के दौरान रेफ़्री बन जाए, तम्बू गाड़ दे, कुर्सीयाँ आदि यहाँ से वहाँ रख दे। मुझे काम सौपा गया था - अधिकृत फ़ोटोग्राफ़र का और कबड्डी के रेफ़्री का।

उन पाँच दिनों में मैंने इन वाय-बी/वाय-सी को अपनी ज़िम्मेदारी बखूबी हँसते-हँसाते हुए निभाते देखा। ये पाँच दिन इतने सुखमय बीते कि इसकी तुलना नहीं की जा सकती। बस समझ लीजिए कि जैसे मैं किसी राजकुमार की बरात में गया था।

आते वक्त मेरे मन में एक विचार आया कि 'बच्चे हमारे आज हो गए बड़े।' और जैसा कि आमतौर पर होता है, पहली पंक्ति बनते ही पूरी कविता तैयार हो गई। ]

मेरा दिल अब भी धड़कता है

दिल दिल है कोई शीशा तो नहीं कि चोट लगी और टूट गया
प्यार प्यार है कोई दाग नहीं कि हाथ मला और छूट गया

सपनें सपनें हैं कोई फूल नहीं कि वक़्त ढला और बिखर गए
दोस्त दोस्त हैं कोई स्टेशन तो नहीं कि ट्रेन चली और बिछड़ गए

हम हम हैं कोई किरदार नहीं कि पन्नों में ही दब के रह गए
हम प्रेमी हैं कोई गुनहगार नहीं कि कारावास में ही मर गए

हमें प्यार हुआ और हमने प्यार किया
सिर्फ़ प्यार, प्यार और प्यार किया

माना कि हम शीरीं-फ़रहाद नहीं
पर किया किसी का घर बर्बाद नहीं
सब कुछ किया लेकिन विवाह नहीं
ताकि रिश्ता हो कोई तबाह नहीं

वो पावन ज्योत अब भी जलती है
जिसे मन-मंदिर में तुम जला गए
ये हवाएँ अब भी वो गीत गाती हैं
जिसे जाते वक़्त तुम गुनगुना गए

वो निर्मल नदी अभी भी बहती है
जिसमें प्रेम रस तुम बरसा गए
वो वादी अभी भी महकती है
जहाँ तुम प्रेम की बेल लगा गए

मेरा दिल अब भी धड़कता है
तुम रीत ही कुछ ऐसी चला गए

सिएटल,
22 अगस्त 2008

Tuesday, August 19, 2008

छप्पन छुरी

छल-छल के छलनी किया मछली ने मुझे
उड़-उड़ के लूटा तितली ने मुझे

दिल्ली वाली बिल्ली दिल ले गई
चेन्नई वाली चिड़िया चैन ले गई
कहीं का न छोड़ा किसी गली ने मुझे

पागल दीवाना जब दिल हो गया
उनका इरादा तबदील हो गया
प्यासा लौटाया बदली ने मुझे

चंचल छबीली मुझे टीज़ कर गई
छप्पन छुरी ऐसी टीस भर गई
जैसे धर दिया हो ब्रूस-ली ने मुझे

सिएटल,
19 अगस्त 2008
=============================
छल =to deceive
छलनी = to be full of small holes
तबदील = change
टीज़ = tease
छप्पन छुरी = अपने रुप से पुरुषों पर गहरा वार करने वाली रमणी
टीस =throbbing pain
ब्रूस-ली = Bruce Lee

Monday, August 18, 2008

कुछ तो राब्ता है उनका मुझसे

सूरज निकला
पंछी चहचहाएँ
लेकिन सुबह न हुई
अलार्म बजा
नींद टूटी
लेकिन सुबह न हुई

जो रोज़ सुबह सुबह मुझे जबरन उठाती थी
गा गा के अ-लोरी मेरी नींद भगाती थी
आज
न जाने किस गलतफ़हमी की हैं शिकार
कि बदला बदला सा है उनका व्यवहार

ये जानकर कि
वे पढ़ती हैं अब भी कविताएँ मेरी
मेरे दिल को मिला है चैन-ओ-क़रार
कि चलो कुछ तो राब्ता है उनका मुझसे
मुझसे ना सही
मेरी कविताओं से तो है उनको प्यार

सिएटल,
18 अगस्त 2008
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राब्ता = सम्पर्क, सम्बंध, लगाव, नाता, connection
जबरन = ज़बरदस्ती, against your will
अ-लोरी = लोरी का विपरित

चैन-ओ-क़रार = शांति, comfort

Saturday, August 16, 2008

हुस्न और इश्क़ का असर हो गया

हुस्न और इश्क़ का असर हो गया
आदमी था काम का सिफ़र हो गया

हँस-हँस के लूटा हर बेब ने मुझे
आप को गिला कि मैं बेबहर हो गया

लिखता हूँ लिखता ही रहूँगा सदा
सुन-सुन के गालियाँ निडर हो गया

ख़ुद की कहता हूँ ख़ुदा की नहीं
जो मार के इन्सां अमर हो गया

नन्हा सलोना सा जीवन था मेरा
बढ़ते बढ़ते दीगर हो गया

फ़ोर्ट वॉर्डेन,
16 अगस्त २००८
============
सिफ़र = zero, शून्य
गिला = शिकायत
बेब = babe
बेबहर = बिना बहर का, without meter
दीगर = अन्य, another, दूसरा

Friday, August 15, 2008

कातरता

कल रात
समंदर का कतरा कतरा
कतरा कतरा चाँद
कतरता रहा

मैं
जीवन की आपाधापी का
बहाना कर के
कतरा कर निकल गया
खूंटे से बंधे
मवेशियों की कतार में
शामिल हो गया

फ़ोर्ट वॉर्डेन
15 अगस्त 2008

Tuesday, August 12, 2008

खुशहाली की नई मिसाल देखिए

खुशहाली की नई मिसाल देखिए
एन-आर-आई एक जनाब देखिए

जी-हज़ूरी करते हैं औरों की लेकिन
माँ-बाप से करवाते काम देखिए

जिस फ़ौज ने मार डाले पूर्वज इनके
उसी फ़ौज में भरती संतान देखिए

बहुत घमंड है इन्हें दान पे अपने
ख़ुद खोजते सस्ती दुकान देखिए

आत्मा बेच कर धन हैं कमाते
फलता-फूलता ये व्यवसाय देखिए

बैंक बैलेंस देख के इतराते हैं लेकिन
अपना एक भी नहीं पास देखिए

नेताजी माताजी तक तो सही है
ख़ुद पर सहते नहीं कटाक्ष देखिए

जब भी पढ़ते हैं राहुल की रचना
तमतमाता हुआ रुख़सार देखिए

सिएटल,
12 अगस्त 2008

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भरती = enlisted
रुख़सार = गाल

भारत छोड़ो आंदोलन

वतनफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे मन में है
विदेशी नागरिकता का ख़्वाब आज हमारे जन-जन में हैं

डॉक्टर नहीं, इंजीनियर नहीं
वकील नहीं, कलाकार नहीं
ऐसा कोई व्यवसायी नहीं
जो बिकने को तैयार नहीं
बिक गया अमरीका में कोई तो कोई बिक गया लंदन में है

सुबह नहीं, शाम नहीं
दिन नहीं, रात नहीं
ऐसा कोई वक़्त नहीं
जब न होती बात यही
कि सबसे सुखी संतान वही जो पलती विदेशी आंगन में है

हाय करे, हैलो करे
झुक झुक के नमस्कार करे
गौरी चमड़ी, काली कार
देख देख के जयजयकार करे
मृत होते आत्मसम्मान को हम ढक रहे सिक्कों के कफ़न में है

मैं नहीं, आप नहीं
भाई नहीं, बाप नहीं
ऐसा कोई व्यक्ति नहीं
जो करता धन का जाप नहीं
एक एक करके सब के सब खप गए इस ईधन में हैं

पूजा नहीं, पाठ नहीं
किसी का सत्कार नहीं
उंगलियों पे गिन सको
इतने भी संस्कार नहीं
न खुद्दारी है किसी भाई में न मान-मर्यादा किसी बहन में है

गाँव नहीं, शहर नहीं
गली नहीं, बस्ती नहीं
एक भी मुझे मिली नहीं
ऐसी कोई हस्ती कहीं
जो तल्लीन देश के, समाज के, विकास के चिंतन में है

पूरब नहीं, पश्चिम नहीं
उत्तर नहीं, दक्षिण नहीं
ऐसी कोई दिशा नहीं
जहाँ न हो लक्षण यही
कि हर एक शाख पे उल्लू बैठा आज इस उपवन में है

सिएटल,
12 अगस्त 2008

Monday, August 11, 2008

हमारी थोड़ी सी बेवफ़ाई

हज़ार आय-एम हमने भेजे
कहीं से कोई पिंग ना आई
बड़ी वफ़ा से, निभाई तुमने
हमारी थोड़ी सी बेवफ़ाई

जहाँ से तुम बाय कर गये थे
वो विंडो अब भी खुली पड़ी है
हम अपने कम्प्यूटर में जाने कितने
और विंडो खोले हुए हैं
बड़ी वफ़ा से, निभाई तुमने
हमारी थोड़ी सी बेवफ़ाई ...

कहीं किसी रोज़ यूं भी होता
हमारी ई-मेल तुम भी पढ़ती
जो बातें हमने कही न तुमसे
वो बातें तुमने भी सोची होती
बड़ी वफ़ा से, निभाई तुमने
हमारी थोड़ी सी बेवफ़ाई...

तुम्हें है दु:ख कि हम क्यों आए
हमें है फ़ख़्र कि तुम हमारे
है फोन हाथों में अब भी लेकिन
रिंग रिंग बस वो पुकारे
बड़ी वफ़ा से, निभाई तुमने
हमारी थोड़ी सी बेवफ़ाई...

सिएटल,
11 अगस्त 2008
(गुलज़ार से क्षमायाचना सहित)
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आय-एम = IM, instant messenger
पिंग = ping
बाय = bye
विंडो = window
कम्प्यूटर = computer
ई-मेल = email
फ़ख़्र = pride
रिंग = ring

Saturday, August 9, 2008

कभी जलती थी शमा रोशनी के लिए

कभी जलती थी शमा रोशनी के लिए
आज जलती है फ़क़त ख़ुशबू के लिए
कभी मिलते थे दोस्त दोस्ती के लिए
आज मिलते हैं फ़क़त गुफ़्तगू के लिए

डिग्री हो
सुशील हो
और धन भी कमाए
वही बस आज एक आदर्श पत्नी कहलाए
चाहे रात भर छटपटाती रहे एक मजनू के लिए

किस्से कहानी कुछ
यूँ शुरू होते हैं
कि हर सिक्के के दो
पहलू होते हैं
जीते हैं हम जो मिल न सके उस पहलू के लिए

ये तेरा
ये मेरा
यही रोना है
टुकड़ों में
बंट गया
घर का कोना कोना है
कोई एक जगह न बची सुकूँ से रू-ब-रु के लिए

न शादी है पक्की
न देश से है भक्ति
दे देते हैं तलाक़
चाहे देश हो या व्यक्ति
नहीं खपता है कोई आज इज़्ज़त आबरू के लिए

सिएटल,
9 अगस्त 2008
================
शमा = मोमबत्ती
फ़क़त = सिर्फ़
गुफ़्तगू = बातचीत
सिक्के के दो पहलू = two sides of a coin
रू-ब-रू = आमने-सामने बैठ कर बात करना

दोहरी ज़िंदगी

इस कड़वे संसार में
हम पवित्र प्रेम रस पी रहे हैं
तिस पर इलज़ाम ये कि
हम दोहरी ज़िंदगी जी रहे हैं

कहाँ तो लोग
ठीक से एक ज़िंदगी
नहीं जी पाते हैं
एक दूसरे के साथ
शांति से चाय तक
नहीं पी पाते हैं

क्या हर्ज़ है
जो हम
एक नहीं
दो दो ज़िंदगी
बखूबी जी रहे हैं

हम घंटो-घंटो
एक दूसरे की
बातें सुनते हैं
एक दूसरे का
दु:ख-दर्द समझते हैं
हँसते हैं
हँसाते हैं
एक दूसरे का
मान रखते हैं
एक दूसरे का
मन रखते हैं

फिर भी दुनिया वाले
इसे गलत कहते हैं
आखिर ऐसा भी क्या
गुनाह करते हैं?

बस ईश्वर की भेंट को
सहर्ष स्वीकार करते हैं
एक दूसरे से
बहुत बहुत प्यार करते हैं

कहने वाले
कहते रहे हैं
करने वाले
करते रहे हैं

एक लाल
एक पीली
या
दोहरी
जैसी भी है ये ज़िंदगी
इसे जीने का हक़
सिर्फ़
हमें हैं
हमें हैं

सिर्फ़ हमें!

सिएटल,
9 अगस्त 2008

Friday, August 8, 2008

आठ-आठ-आठ

यहाँ-वहाँ और देश-विदेश
आज का दिन है बड़ा विशेष

ख़ास दिन पर होती है ख़ास चाह
हज़ारों ने किए आज शुभ विवाह

न जाने इस में कौन सी है ऐसी ख़ास बात
क्या आज दिन न ढलेगा, न होगी रात?
क्या आज लोग न लड़ेंगे, न होगा प्यार?
क्या आज कोई न जन्मेगा, न होगा पार?

वही बाग़ हैं, वही बगीचे
वही घर हैं, वही दरीचे
कल, आज और कल में कोई फ़र्क नहीं है
जो अलग साबित कर दे ऐसा तर्क नहीं है

हर कैलेंडर की अपनी तिथि है
दिन गिनने की अलग विधि है
इस कैलेंडर में निकला कुछ आज ख़ास
तो उस कैलेंडर में निकलेगा कुछ कल ख़ास

कोई हिंदू कैलेंडर है
कोई मुस्लिम कैलेंडर है
तरह तरह के
यहाँ कैलेंडर हैं

दिन अलग हैं
साल अलग हैं
हर महीने के
नाम अलग है

हज़ार झगड़े होते हैं
जात-पात के
हज़ार लफ़ड़े होते हैं
बोल-चाल के
हज़ार पचड़े होते हैं
धर्म-समाज के
हज़ार रगड़े होते हैं
देश-प्रांत के

लेकिन ये देख कर
होता विस्मय है
कि मानता हर कोई
एक समय है

हिंदू, मुस्लिम या
कोई धर्म हो
हिंदी, अंग्रेज़ी या
कोई ज़ुबाँ हो
पूरब, पश्चिम या
कोई दिशा हो
छोटा, बड़ा या
कोई यहाँ हो

हर घड़ी में
एक समय है

सिएटल,
8 अगस्त 2008
===============
दरीचे = खिड़कियाँ
ज़ुबाँ = भाषा

Thursday, August 7, 2008

जितने भी सगे थे सब के सब सगाँ निकले

जितने भी सगे थे सब के सब सगाँ निकले
परायों के आगोश में दिल के अरमाँ निकले

अंधे थे हम और अंधी थी चाहत हमारी
तिस पर तुर्रा ये कि हम बेज़ुबाँ निकले

दूर से देते रहे उम्र भर का वादा मुझे
पास आए तो दो दिन के मेहमाँ निकले

कुछ यूँ खेली आँख-मिचौली ज़िंदगी ने मुझसे
कि जिनके पीछे मैं आया यहाँ वो वहाँ निकले

काटने को तो काट सकता है 'राहुल' अकेला इसे
बशर्ते सफ़र के अंत में चार शख़्स मेहरबाँ निकले

सिएटल,
7 अगस्त 2008
=============
सगे = blood relatives
सगाँ = कुत्तें, dogs
तिस पर तुर्रा = and on top of that

और यहीं कहीं रब देखा

पंडित को करता जप देखा
साधु को करता तप देखा
गिरजा दरगाह सब देखा
हर तरह का मजहब देखा
पर कभी नहीं रब देखा

आग उगलता पर्वत देखा
सागर पलटता करवट देखा
ज़मीं पे झुकता नभ देखा
कुदरत का हर करतब देखा
पर कभी नहीं रब देखा

उमड़ता घुमड़ता सावन देखा
हरा भरा सा वन देखा
इधर-उधर जब देखा
सौन्दर्य लबालब देखा
पर कभी नहीं रब देखा

किसी को मन-मरजी करते देखा
किसी को जीते जी मरते देखा
सुख और दु:ख सब देखा
हर तरह का मतलब देखा
पर कभी नहीं रब देखा

तुम्हें अपना बनते देखा
सांसों में तुम्हें घुलते देखा
तुम्हें प्रफ़ुल्लित जब देखा
जीवन होता सुलभ देखा
और यहीं कहीं रब देखा

सिएटल,
7 अगस्त 2008

Wednesday, August 6, 2008

मिलन

मैं छुपता रहा
तुम खिलती रही
ये कैसा खेल?

हाथों में मेरे
तुम समाती रही
ये कैसा जादू?

हुआ कि नहीं?
सच था कि सपना?
ये कैसे प्रश्न?

एक नज़र
वो आईना तो देखो
ये कैसा चिन्ह?

सिएटल,
6 अगस्त 2008

Tuesday, August 5, 2008

आ चल के तुझे, मैं ले के चलूँ

आ चल के तुझे,
मैं ले के चलूँ
इक ऐसे गगन के तले
जहाँ वेब भी न हो
मैसेंजर भी न हो
बस प्यार ही प्यार पले
इक ऐसे गगन के तले

सूरज की पहली किरण से
इंटरनेट दिमाग न खाए
चंदा की किरण से धुल कर
टेक्स्ट मैसेज न आते जाए
कोई पास बैठे
कोई घर आ के मिले
स्क्रीन पे न कट-पेस्ट चले
जहाँ वेब भी न हो …

जहाँ दूर नज़र दौड़ आए
कम्प्यूटर नज़र न आए
जहाँ रंग बिरंगे पोस्टकार्ड
आशा का संदेसा लाएं
हाथों से लिखें
होंठों से चूमें
ख़त आते हो ऐसे भले
जहाँ वेब भी न हो ...

सिएटल,
5 अगस्त 2008
(किशोर कुमार से क्षमायाचना सहित)
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वेब = web
मैसेंजर
= instant messenger
इंटरनेट= internet
टेक्स्ट मैसेज = text message
स्क्रीन = screen
कट-पेस्ट = cut-paste
कम्प्यूटर = computer

कुछ ना पके क्या खाऊँ मैं

कुछ ना पके क्या खाऊँ मैं
तुम्हरे बिना, किचन सूना

जलते गया बैंगन भर्ता
इस दाल का न लगा तड़का
कुछ ना पके ...

दोनों बर्नर, मुझसे बुझे
तेरे बिना कुछ भी न सुझे
कुछ ना पके ...

कब तक रहूँ धनिया खाके
गई तुम कहाँ मुझको भुलाके
कुछ ना पके ..

पनीर मन को पंख लगाए
ज़ुबां पे रिमझिम रस बरसाए
बूंदी का रायता
रोटी पे घी
कुछ ना पके ..

सिएटल,
5 अगस्त 2008
(शैलेंद्र से क्षमायाचना सहित)

आज उसे मैंने अपना जाना

ज़िंदगी
इतनी हसीन
इतनी खूबसूरत
इतनी दिलकश
भी हो सकती है
ये मैंने तब माना
जब
आज उसे मैंने अपना जाना

वो खोई-खोई आँखें
वो होंठों पे पहरा
वो दहकते गाल
वो प्यारा सा चेहरा

उफ़ ये सादगी
और ये भोलापन
कि मैं भी गया
और गया मेरा मन

न है हूर जैसी
न कोई अप्सरा है वो
न है जूही की कली
न शबनम का कतरा है वो

और न उसका चेहरा है चाँद जैसा
न उसके होंठ है गुलाब की पंखुड़ियाँ

अच्छा ही है क्योंकि
न तो चाँद को मैंने
कभी चूमना चाहा
न गुलाब की पंखुड़ियों को मैंने
कभी पर्त-दर-पर्त खोलना चाहा

जैसी भी है
बहुत अच्छी है वो
बहुत प्यारी
बहुत भली है वो
बस गई मेरे
दिल की गली है वो

ज़िंदगी
इतनी हसीन
इतनी खूबसूरत
इतनी दिलकश
भी हो सकती है
ये मैंने तब माना
जब
आज उसे मैंने अपना जाना

सिएटल,
5 अगस्त 2008

केसानोवा (Casanova)

करता हूँ प्यार तो क्यों कहते हो बेवफ़ा मुझको
क्या हुआ जो हो गया प्यार कई मर्तबा मुझको

अगर मानते हो
इसे मेरी ख़ता
अपनी दुनिया से
मुझे कर दो दफ़ा
लेकिन याद तो करोगे गुले-गुलज़ार कई दफ़ा मुझको

आज नहीं
तो हम कल मिलेंगे
अकेले न सही
किसी महफ़िल में मिलेंगे
हँसता ही मिलूंगा न पाओगे तुम कभी ख़फ़ा मुझको

सब है मिथ्या
सब है नश्वर
एक प्यार ही है
जो है अमर
समझ आया यही एक ज़िंदगी का फ़लसफ़ा मुझको

न छुड़ाता दामन
न तजता मैं साहिल
पहले पड़ाव को ही
मान लेता मंज़िल
'गर मंज़ूर न होता लहरों से यूँ लिपटना मुझको

कहता हूँ सच
कहता हूँ खरी
न तुम हो पहली
और न आखरी
कभी रास आया नहीं बांधना या बंधना मुझको

लुटाता हूँ प्यार
लुटाता रहूँगा
बनाता हूँ यार
बनाता रहूँगा
'गर समझ सको तो फ़क़त दोस्त समझना मुझको

विश्व मित्र हूँ
कोई विश्वामित्र नहीं
जीता जागता इंसान हूँ
कोई मृत चित्र नहीं
लुभाना चाहे तो बेशक़ लुभा ले कोई अप्सरा मुझको

न दो कड़वी
न दो रसीली
ना ही दो
किसी बाबा की गोली
प्रेम कोई रोग नही है जो दे रहे हो दवा मुझको

सिएटल,
5 अगस्त 2008
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केसानोवा = Casanova
मर्तबा =(number of) times
ख़ता = mistake
दफ़ा = 1. remove 2. times
ख़फ़ा = angry, displeased
फ़लसफ़ा =philosophy
मिथ्या =illusion
नश्वर = destructible, transient
तजता = leave
साहिल = shore
पड़ाव =halting place
मंज़िल = destination
'गर = अगर, if
खरी = truth
रास = like
फ़क़त = only
विश्वामित्र = an ancient sage who was seduced by Menaka
मृत =dead

Monday, August 4, 2008

प्यार कुछ कुछ ऐसा ही होता है

जिसने मिलियन डॉलर न देखा हो
और उसे मिलियन डॉलर का चेक मिल जाए
तो वो खुश तो बहुत होगा
लेकिन साथ में
डरेगा भी बहुत
कि कहीं खो न जाए

प्यार भी कुछ कुछ ऐसा ही होता है

चेक को तो
सिर्फ़
बैंक में जमा करने तक ही
सम्हालना पड़ता है

प्यार?

बंधन में बांध लो
तो
सड़ जाए
मर जाए

खुला छोड़ दो
तो
न जाने किस के
हाथ पड़ जाए?

सिएटल,
4 अगस्त 2008