Tuesday, September 23, 2008

कभी तो लिखो ख़त मुझे

कभी तो लिखो ख़त मुझे
कि मैं अभी मरा नहीं

अभी तो हुई लड़ाई है
बात कहाँ हो पाई है
दो चार लाईन लिख तो दो
बुरा भला कह तो दो
भड़ास दिल की निकाल लो
जी भर के मुझको कोस लो
नहीं तो कहोगी तुम सदा
कि मैंने कुछ कहा नहीं
नहीं नहीं नहीं नहीं
कभी तो लिखो ख़त मुझे
कि मैं अभी मरा नहीं

आँखें डबडबा रही
चाल डगमगा रही
ये दिल तुम्हें है सोचता
हर जगह है खोजता
जो तुम न मिल सकी अगर
तो कैसे कटेगी उमर
लाख मनाऊँ दिल को मैं
मगर दिल सम्हलता नहीं
नहीं नहीं नहीं नहीं
कभी तो लिखो ख़त मुझे
कि मैं अभी मरा नहीं

अधूरी बात छोड़ कर
मुझसे मुख मोड़ कर
जब से तुम रूठ गए
ख़्वाब सारे टूट गए
न जाने कैसे दिन ढले
कब और कैसे सांस चले
मैं सुध-बुध खो चुका
मुझे तो कुछ पता नहीं
नहीं नहीं नहीं नहीं
कभी तो लिखो ख़त मुझे
कि मैं अभी मरा नहीं

सिएटल,
23 सितम्बर 2008
(साहिर से क्षमायाचना सहित)

Monday, September 22, 2008

हज़ार खंजर

मेरा महबूब भी
कितनी बड़ी तोप है
आँखें चार किए हुए
हुए नहीं चार दिन
और हज़ारों खंजर का
थोप देता आरोप है

काश
ये मैं पहले जान लेता
कि जो दे देता है दिल
वही फिर ले लेता है जान
जब बरसता
उसका प्रकोप है

पहले
वो जब खुश था
तो रेन-फ़ारेस्ट की तरह सब्ज़ था
आजकल
गुस्सा है
तो ठंडा-ठंडा युरोप हैं

जल्लाद से भी बढ़कर
अगर कोई है
तो वो मेरा माशूक़ है
बिना अंतिम इच्छा पूछे ही
खींच लेता वो रोप है

सिएटल,
22 सितम्बर 2008
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रेन-फ़ारेस्ट = rain forest
सब्ज़ = हरा-भरा
युरोप = Europe
रोप = rope, रस्सी

Sunday, September 21, 2008

मेरा ब्लाग ही पहचान है

फोन नम्बर खो जाएगा
ई-मेल आई-डी बदल जाएगा
मेरा ब्लाग ही पहचान है
'गर याद रहे

वक़्त के सितम
कम हसीं नहीं
आज है याहू
कल कहीं नहीं
गूगल पे चलो
सर्च करो मुझे

हम लिखे यहाँ
दिल की बात को
दिन में कभी
कभी रात को
हो सके अगर
देना टिप्पणी मुझे

कल को अगर
दिल उदास हो
चाहने लगो
कोई पास हो
ब्लाग खोल कर
पढ़ लेना मुझे

सिएटल,
21 सितम्बर 2008
(गुलज़ार से क्षमायाचना सहित)

Friday, September 19, 2008

आज के बाद

तेरे नम्बर को ना रिंग करेंगे सनम, आज के बाद
तुझे ई-मेल भी ना लिखेंगे सनम, आज के बाद

तू मेरा मिलना समझ लेना एक सपना था
तुझको बहाना मिल ही गया जो तुझको ढूंढना था
सच कोई तुमसे कहेगा ना सनम, आज के बाद

बजती जाएगी घंटियां रोज किसी सेल फोन की
फ़िर भी ना सुनूंगा धुन तेरे रिंग-टोन की
कान में रूई हम लगाएंगे सनम, आज के बाद

हमको तुमको साथ अभी तो सदियों चलना था
बीच सफ़र में हाथ यूँ नहीं तुमको छोड़ना था
हम हाथ किसी का ना पकड़ेंगे सनम, आज के बाद

सिएटल,
19 सितम्बर 2008
(सावन कुमार से क्षमायाचना सहित)

Wednesday, September 17, 2008

राष्ट्रीय ज्ञान आयोग

गौड़सन्स टाईम्स के एक लेख में, केंद्रीय हिंदी समिति के सदस्य, राहुल देव लिखते हैं:
"राष्ट्रीय ज्ञान आयोग की सिफ़ारिश है कि अंग्रेज़ी को पहली कक्षा से पढ़ाया जाए और तीसरी से दूसरे विषयों की पढ़ाई का माध्यम बनाया जाए। वह यह भी कहता है कि कक्षा और विद्यालय के बाहर भी अंग्रेज़ी सीखने के लिए प्रेरक, उपयुक्त माहौल बनाया जाए। हर कक्षा में इसके लिए पुस्तकें, मल्टीमीडिया उपकरण रखे जाएं, अंग्रेज़ी क्लब बनाए जाएं। देश के 40 लाख शिक्षकों को अंग्रेज़ी दक्ष बनाने के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए जाएं। छ: लाख नए अंग्रेज़ी शिक्षक तैयार किए जाएं। "

राहुल देव पूछते हैं कि जब "ज्ञान आयोग स्वयं मानता है कि अंग्रेज़ी जो प्रथम भाषा के रुप में प्रयोग करने वाले एक प्रतिशत हैं। बाकी 99 प्रतिशत को अंग्रेज़ी दक्ष बनाने में कितना धन लगेगा? क्या यह संभव है जबकि एक प्रतिशत की भाषा बनने में अंग्रेज़ी को 175 साल लग गए?"

लेकिन साथ ही यह शिकायत भी करते हैं कि -
"सारे समाज में अंग्रेज़ी और भारतीय भाषाओं के बीच शक्ति और प्रतिष्ठा का जो संतुलन है उसे देखते हुए अगर पहली कक्षा से छात्रों को अंग्रेज़ी माध्यम में पढ़ाया गया तो क्या वे अपनी भाषाओं को वैसी ही इज़्ज़त दे पाएंगे? आज ही से शुरु से अंग्रेज़ी माध्यम में पढ़ने जीने वाले बच्चे भारतीय भाषाओं का कैसा प्रयोग करते हैं, कितना महत्व देते हैं, अपनी परंपराओं, विरासत, सांस्कृति जड़ों से कितना जुड़े हैं, यह सबके सामने हैं।"

यह तो ऐसे हुआ कि जैसे चित भी मेरी पट भी मेरी! अगर अंग्रेज़ी 175 साल बाद सिर्फ़ एक प्रतिशत लोगो की प्रथम भाषा बन पाई हो तो फिर अंग्रेज़ी के खिलाफ़ इतना शोर शराबा क्यों?


मैं केंद्रीय विद्यालय का विद्यार्थी रहा हूँ, जहाँ आमतौर पर सारे विषय अंग्रेज़ी में ही पढ़ाए जाते हैं। जो छात्र सामाजिक अध्ययन हिंदी में पढ़ना चाहते हैं, वे हिंदी में पढ़ सकते हैं। लेकिन गणित और विज्ञान अंग्रेज़ी में ही पढ़ाए जाते हैं। इसे आप गरीब सरकारी कर्मचारियों का कान्वेंट स्कूल कह सकते हैं। प्राय: सारे छात्र अंग्रेज़ी में ही सारे विषय पढ़ते थे। साथ में हिंदी भी और संस्कृत भी। एक मैं ही अकेला था जिसने सामाजिक अध्ययन हिंदी में लेना तय किया। क्यों? क्योंकि मैं केंद्रीय विद्यालय में कक्षा आठ में दाखिल हुआ था। मेरी प्राथमिक शिक्षा मध्य प्रदेश के रतलाम जिले में हुई थी। वहाँ, कक्षा छ: तक अंग्रेज़ी का एक अक्षर नहीं पढ़ाया जाता था। इस वजह से मेरी अंग्रेज़ी काफ़ी कमज़ोर थी।

सच तो यह है कि अंग्रेज़ी की बदौलत ही अच्छी नौकरी मिलती है, अच्छा वेतन मिलता है, उपर उठने के अवसर मिलते हैं। आज कम्प्यूटर पर, इंटरनेट पर यूनिकोड के सहारे हिंदी लिखना और पढ़ना आसान है, लेकिन फिर भी बिना अंग्रेज़ी के आप लंगड़ा कर ही चल सकते हैं। प्रोद्योगिकी, चिकित्सा, अभियांत्रिकी, विज्ञान, विधि के क्षेत्र में अंग्रेज़ी का ही बोलबाला है।

आज हर परिवार जो इस काबिल है कि वो अपने बच्चों को अंग्रेज़ी में शिक्षा दिला सके, दिला रहा है। इसका मतलब साफ़ है कि जो गरीब है, जिनके पास साधन नहीं है, उनके बच्चे अंग्रेज़ी शिक्षा के अभाव में और गरीब होते जा रहे हैं; और ये क्रम तब तक चलता रहेगा जब तक कि सरकार हस्तक्षेप न करे और हर जनसाधारण को शिक्षा का समान अवसर न दे। ज्ञान आयोग की सिफ़ारिश के मुताबिक अब हर सरकारी स्कूल केंद्रीय विद्यालय की पद्धति पर चलेगा। ये एक हर्ष का विषय है। केंद्रीय विद्यालय के कई विद्यार्थियों से मेरी मुलाकात होती रहती है और वे सब अपनी संस्कृति से उतने ही जुड़े हैं जितने कि अन्य भारतीय।

राहुल देव का एक सुझाव यह भी है कि
"सारा देश अगर अपनी भाषाओं को छोड़ कर वैश्वीकृत होने, महाशक्ति बनने, आर्थिक प्रगति के एकमात्र माध्यम के रुप में अंग्रेज़ी को अपनाने के लिए तैयार है तो एक जनमत संग्रह करा लिया जाए और अगर बहुमत अंग्रेज़ी के पक्ष में हो तो उसे ही राष्ट्रभाषा, राजभाषा, शिक्षा का प्रथम माध्यम बना दिया जाए।"

अच्छा सुझाव है। एक जनमत कश्मीर में भी हुआ था। आज तक उसको भुगत रहे हैं।

जनमत के बजाय आप स्वयं जाकर देख ले कि अंग्रेज़ी माध्यम वाले स्कूलों के आगे दाखिले के लिए कितनी लम्बी कतार है। सब समझ में आ जाएगा। ये तब जबकि इन स्कूलों की बहुत महंगी फ़ीस होती है।

इससे पहले कि आप ज्ञान आयोग की सिफ़ारिशो का विरोध करें, अंग्रेज़ी हटाओ के नारे लगाए, मेरा एक निवेदन है। पहले आप अंग्रेज़ी भूल कर दिखाए। कोशिश कर के देखें कि आप कितने दिन बिना अंग्रेज़ी के रह सकते हैं। सिर्फ़ बिना बोले ही नहीं - बिना समझे, बिना लिखें, बिना पढ़े, बिना सुने।

सिएटल,
17 सितम्बर 2008

Tuesday, September 16, 2008

आपने कभी एन-आर-आई देखा है?

देखा है एन-आर-आई को कुछ इतना समीप से
धन-सम्पदा है लाख मगर लगते गरीब से

धन से है कितना मोह ज़रा देख लीजिए
तेल बेचने लगे हैं अपने घर के प्रदीप से

सोचा था लौट आएंगे वापस वो एक दिन
अभी तक भटक रहे हैं किसी बदनसीब से

मणि मिले तो चाट ले चमड़ी गोरों की
चाहे पड़े रहे परिजन लाचार निर्जीव से

स्वार्थ और लोभ की ये ज़िन्दा मिसाल हैं
समाज से कटे-कटे रहते हैं द्वीप से

इनकी वफ़ा की लाश को आओ विदा करें
दे कर के पासपोर्ट जो मिला है रकीब से

होता न राहुल एन-आर-आई तो होता क्या भला
एन-आर-आई न टंगे दिखते यूँ इक सलीब से

सिएटल,
16 सितम्बर 2008
(साहिर से क्षमायाचना सहित)
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मिसाल = उदाहरण
रकीब = दुश्मन
सलीब = सूली

Sunday, September 14, 2008

हिंदी दिवस -- 3 पहेलियाँ

हिंदी ही है दुनिया की एकमात्र भाषा
जिसे करोड़ों कहते हैं अपनी मातृभाषा

हिंदी दिवस के उपलक्ष्य पर प्रस्तुत हैं 3 पहेलियाँ। तीनों पहेलियों के उत्तर से 'शुद्ध हिंदी' वालो को आपत्ति हो सकती है। क्योंकि वे शब्द या तो उर्दू के हैं या अंग्रेज़ी के या भोजपुरी के - शुद्ध हिंदी के नहीं। या ये कहूँ कि उनकी जड़ संस्कृत में नहीं है। मैं ये समझता हूँ कि ऐसे शब्दों से हिंदी समृद्ध होती है, नष्ट नहीं। चाहे कितनी ही नदियाँ सागर में मिल जाए, सागर नष्ट नहीं होता, भ्रष्ट नहीं होता, प्रदूषित नहीं होता।

1 -
झूम-झूम के नाचे आज ??? ?? (3, 2)
पढ़े यूनिकोड, नहीं पढ़े ?? ??? (2, 3)

2 -
जब भी कोर्ट में मुझसे ?? ?? करें (2, 2)
कहे कि आप ज़ब्त अपने ???? करें (4, 4)

3 -
और हाँ, ये रही वो ??? (3)
जिन पे खेलता था ?? ?? (2, 2)

उदाहरण:
क -
जब तक देखा नहीं ??? (3)
अपनी खामियाँ नज़र ?? ?(2, 1)

उत्तर:
जब तक देखा नहीं आईना
अपनी खामियाँ नज़र आई ना

ख -
मफ़लर और टोपी में छुपा ?? ?? (2, 2)
जैसे ही गिरी बर्फ़ और आई ??? (3)

उत्तर:
मफ़लर और टोपी में छुपा सर दिया
जैसे ही गिरी बर्फ़ और आई सर्दियाँ

अधिक मदद के लिए अन्य पहेलियाँ यहाँ देखें:
http://mere--words.blogspot.com/search/label/riddles_solved

शुद्ध हिंदी के विषय पर आप मेरा एक लेख और एक कविता यहाँ देख सकते हैं:

शुद्ध हिंदी - एक आईने में - http://mere--words.blogspot.com/2007/12/blog-post_03.html
बदलते ज़माने के बदलते ढंग हैं मेरे - http://mere--words.blogspot.com/2008/06/blog-post_18.html

Saturday, September 13, 2008

क़हर

पहले भी बरसा था क़हर
अस्त-व्यस्त था सारा शहर
आज फ़िर बरसा है क़हर
अस्त-व्यस्त है सारा शहर

बदला किसी से लेने से
सज़ा किसी को देने से
मतलब नहीं निकलेगा
पत्थर नहीं पिघलेगा
जब तक है इधर और उधर
मेरा ज़हर तेरा ज़हर

बुरा है कौन, भला है कौन
सच की राह पर चला है कौन
मुक़म्मल नहीं है कोई भी
महफ़ूज़ नहीं है कोई भी
चाहे लगा हो नगर नगर
पहरा कड़ा आठों पहर

न कोई समझा है न समझेगा
व्यर्थ तर्क वितर्क में उलझेगा
झगड़ा नहीं एक दल का है
मसला नहीं आजकल का है
सदियां गई हैं गुज़र
हुई नहीं अभी तक सहर

नज़र जाती है जिधर
आँख जाती है सिहर
जो जितना ज्यादा शूर है
वो उतना ज्यादा क्रूर है
ताज है जिनके सर पर
ढाते हैं वो भी क़हर

आशा की किरण तब फूटेंगी
सदियों की नींद तब टूटेंगी
ताज़ा हवा फिर आएगी
दीवारे जब गिर जाएंगी
होगा जब घर एक घर
न तेरा घर न मेरा घर

सेन फ़्रांसिस्को
24 सितम्बर 2002
(अक्षरधाम पर हमले के बाद)

Thursday, September 11, 2008

शक़

बातों में बात है
बात एक लाख की
जो करते हैं शक़
नहीं कर सकते हैं आशक़ी

क्या करेंगे वो इश्क़
जिन्हें खाता हो शक़
जिनके मन में हो खोट
कैसे पहुँचेगे वो दिल तक
दिल तो समझे बस बातें जज़बात की

दायें भी देखें
बाएँ भी देखें
हर तरफ़ देख कर
पाँसा जो फ़ेंके
वो जीत भी जाए तो ऐसी जीत किस काम की

शक़ ने इस कदर
जकड़ा उन्हें
कि मैं था प्रेम
लगा प्रेम चोपड़ा उन्हें
ऐसी भी क्या दोस्ती जो दोस्ती हो बस नाम की

न आप हैं शक़्क़ी
न आप हैं शक़्क़ी
हम सब हैं भरोसेमंद
ये बात है पक्की
मैं तो बात कर रहा हूँ इस दुनिया जहान की

सिएटल,
11 सितम्बर 2008
==============
आशक़ी = आशिक़ी, प्रेम

Tuesday, September 9, 2008

जीते जी मरने की सज़ा

जाते जाते यार मुझे क्या दे गया
जीते जी मरने की सज़ा दे गया

रहता था खुश, स्वच्छंद था मैं
कली कली महके, ऐसी सुगंध था मैं
जागूँ सारी-सारी रात ऐसी दवा दे गया

न उससे बात करूँ, न मुलाकात करूँ
ज़र्द और ज़ब्त सब्ज़ जज़बात करूँ
ऐसी-वैसी कसम कई दफ़ा दे गया

कर के गया कुछ ऐसा बर्बाद मुझे
कि सांस भी लूँ तो आए याद मुझे
दिल ले कर बेरहम दमा दे गया

बचने की अब कोई उम्मीद नहीं
रोज़ ही रोज़े होगे, होगी ईद नहीं
प्यास न बुझे ऐसी यातना दे गया

मुक्ति की मेरी कोई तरकीब तो हो
चाहे मार ही डाले, कोई रक़ीब तो हो
यार मेरा जीने की बददुआ दे गया

सिएटल,
9 सितम्बर 2008

Friday, September 5, 2008

जुदाई

यार मेरा मुझसे आज जुदा हो गया
जो भी था पल भर में हवा हो गया

हँसता था वो
हँसाता था वो
बात बात पर गीत
गाता था वो
आज मुझे रोता छोड़ वो दफ़ा हो गया

न मेरी सुनता है वो
न मेरी मानता है वो
कर के ही रहता है
जो भी ठानता है वो
सोचा था क्या और ये क्या हो गया

मुझ पे मरना भी था
दुनिया से डरना भी था
हर कदम उसे
फ़ूंक-फ़ूंक के रखना भी था
कर्तव्य में जल प्यार फ़ना हो गया

सिएटल,
5 सितम्बर 2008
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फ़ना = विनाश

Tuesday, September 2, 2008

तुम मुझे यूँ भुला ना पाओगे

तुम मुझे यूँ भुला ना पाओगे
हाँ तुम मुझे यूँ भुला ना पाओगे
जब कभी भी पढ़ोगे कविता मेरी
सच देख कर तुम बिलबिलाओगे
हाँ तुम मुझे यूँ भुला ना पाओगे
हो तुम मुझे यूँ ...

वो एन-आर-आई वो ईश्वर की बातें
जिनमें कोसे थे रिसते रिश्ते नाते
उन कविताओं की याद आएगी
जब खयालों में मुझको लाओगे
हाँ तुम मुझे यूँ भुला ना पाओगे
हो तुम मुझे यूँ ...

मैं कविता में तुमको लिखता था
जब भी तुमको मनाना होता था
और सहारा लिया था पैरोडी का
वो नगमें किस तरह भुलाओगे
हाँ तुम मुझे यूँ भुला ना पाओगे
हो तुम मुझे यूँ ...

मुझको पढ़े बिना क़रार न था
एक ऐसा भी दौर गुज़रा है
झूठ मानो तो देख लो स्टाटिस्टिक्स
मैं कहूंगा तो रूठ जाओगे
हाँ तुम मुझे यूँ भुला ना पाओगे
हो तुम मुझे यूँ ...

सिएटल,
2 सितम्बर 2008
(हसरत जयपुरी से क्षमायाचना सहित)
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स्टाटिस्टिक्स = statistics