Friday, September 28, 2012

बारीश की बूंदें


मुझे आज भी याद है
शिमला के
सिसिल होटल के
सामने का गज़ीबो
जिसमें
स्कूल से आते वक्त
बारीश में भीगते हुए
हम घुसे थे दोनों

तुम्हारी मांग में 
कुछ बूंदें
अटक गई थी

मैंने चाहा था छूना
लेकिन उन्हें छुआ नहीं था

मुझे आज भी याद है
उन बूंदों की चमक
उस मांग की महक
उन बालों का तनाव
ठंड का बढ़ना
सांसों का चलना
और
मेरा-तुम्हारा कुछ न कहना

हम चुप थे
लेकिन 
अनभिज्ञ नहीं थे

या यूँ कह लो
कि अनभिज्ञ नहीं थे
इसीलिये चुप रहें थे

उस दिन तो
हम छतरी ले जाना भूल गए थे
लेकिन उस दिन के बाद से
हमने भूल के भी कभी
छतरी नहीं ली

बारीश की बूंदों का
तन से मिलन का
मज़ा ही कुछ और है

मुझे आज भी याद है ...

28 सितम्बर 2012
सिएटल । 513-341-6798

Thursday, September 27, 2012

तुम बिन जाऊँ कहाँ

तुम बिन जाऊँ कहाँ
कि दुनिया में आके
गया नहीं
कभी कहीं
तुमको त्याग के ...


बढ़े जब दाम पेट्रोल के
लुट गई दुनिया
खाए जब धक्के बसों के
मिट गई खुशियाँ
तुम क्या जानो
कि भटकता फिरा
मैं किस-किस गली
तुमको त्याग के ...


देखो मुझे सर से कदम तक
थुलथुल माँस हूँ मैं
जाना हो दो कदम भी तो
जाता हांफ़ हूँ मैं
तुम क्या जानो
कि सिसकता रहा
मैं किस-किस घड़ी
तुमको त्याग के ...


रह भी सकूँगा मैं कैसे
हो के तुमसे जुदा
धूप, बरसात और 'स्नो' से
कैसे लड़ूँगा भला
आना होगा मुझे तेरी शरण
साथी मेरी
सूनी राह के


(मजरूह सुल्तानपुरी से क्षमायाचना सहित - वीडियो)
27 सितम्बर 2012
सिएटल ।
513-341-6798
=====
स्नो = snow

Tuesday, September 25, 2012

जीत हुई सीहॉक्स की?

जीत हुई सीहॉक्स की?
सब के सब थे अवाक
बार-बार थे कह रहें
रेफ़री करो बर्खास्त

रेफ़री करो बर्खास्त
एन-एफ़-एल का कर रहें सत्यानाश
तीन हफ़्ते में दे दिये
कई निर्णय गलत निर्विवाद

निर्णय गलत निर्विवाद?
उन लोगों का कोई नहीं उपचार
जिन्हें हर मुकाबले का नतीजा
चाहिये पहले से तैयार

पहले से तैयार
ओबामा भी नहीं इसके हैं अपवाद
लाख कोशिश कर के देख लीजिये
केलिफ़ोर्निया से हारेंगे नहीं जनाब

हारेंगे नहीं जनाब
उड़ रहा गुप्त मतदान का उपहास
कहने को है डेमोक्रेसी मगर
पनप रहा फ़ंडरैसिंग का बाज़ार

25 सितम्बर 2012
सिएटल । 513-341-6798
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सीहॉक्स = seahawks
एन-एफ़-एल = NFL
डेमोक्रेसी = democracy
फ़ंडरैसिंग = fundraising

Monday, September 24, 2012

ढलान ढलने की

(1)
जो ढलता है
वो बनता नहीं
मिटता है
अपना अस्तित्व खोकर
एक साँचे में जा सिमटता है

वो देखो
सूरज को देखो
ढलता है
तो डूबता है
शर्म से लाल होकर
पहाड़ के पीछे जा छुपता है

(2)
जो ढलता है
वो ही बनता है
बाकी सब तो
बिखरा-बिखरा सा रहता है

ढलो
किसी साँचे में
सजो
किसी के माथे पे

जो ढलता है
वो ही सजता है
बाकी सब तो
खदान में बिखरा पड़ा रहता है

(3)
जो ढला नहीं
वो बना नहीं

जो बना नहीं
वो मिटा नहीं

जो मिटा नहीं
वो जिया नहीं

24 सितम्बर 2012
सिएटल । 513-341-6798

Saturday, September 22, 2012

परसेंट के चक्कर


ये 14 परसेंट टैक्स देते हैं
बाकी देते हैं अधिक
कह-कह के परेशान हैं
रेडियों-टीवी के पंडित

परसेंट के चक्कर में मार खा रहें हैं रामनी
रिपब्लिकन परेशान हैं, क्यूँ चुना इन्हें नॉमनी?
एक परसेंट के पास है, बाकी के पास है नो-मनी
47 परसेंट निर्भर हैं, बाकी के हैं बस रामजी

भला हो उन मतदाताओं का
जो आँकड़ों में करते हैं यकीन
जब जनता के पास धन नहीं
तो कहाँ से आए इतने रईस?

वेकेशन पे लोग जाते हैं
कांसर्ट्स में कूल्हें मटकाते हैं
होटलों में खाना खाते हैं
वाईन के पेग चड़ाते हैं
आई-फोन की मांग बढ़ाते हैं
आई-पेड खरीदते जाते हैं
पानी की जगह कोक पीते हैं
स्टारबक्स सुड़कते जाते हैं

और कहने को
अर्थव्यवस्थ खराब है
जनता दुखी और लाचार है

22 सितम्बर 2012
सिएटल । 513-341-6798
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नॉमनी = nominee
वेकेशन = vacation
कांसर्ट्स = concerts
वाईन = wine
आई-फोन = iPhone
आई-पेड = iPad
स्टारबक्स = Starbucks

Monday, September 17, 2012

आए दिन इतने बर्थडे आने लगे हैं


आए दिन इतने बर्थडे आने लगे हैं
कि हैप्पी बर्थडे तक बोलने में कोफ़्त होने लगी है
दुनिया तो दुनिया,
ख़ुद की ही ज़िंदगी बेमतलब होने लगी है
 
जिसे देखो दुनिया खोजने में लगा है
कभी पेरिस तो कभी लंदन से
चमकती बत्तीसी
हर वॉल पे सुशोभित होने लगी है
 
अच्छा ही होता
जो न जुड़ता मैं उनसे
उनकी हर अपडेट से
दिल में खलल होने लगी है
 
उनकी उंगलियों पे
आज भी मैं नाचता हूँ यारो
जागते-सोते
अंगूठे में हरकत होने लगी है
 
वफ़ाएं-जफ़ाएं
थीं किताबों तक ही सीमित
अब एक-एक करके
वो सच होने लगी है
 
17 सितम्बर 2012
सिएटल । 513-341-6798
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हैप्पी बर्थडे = Happy Birthday
वॉल = wall (wall on facebook)
अपडेट = update (status update on facebook)

Sunday, September 16, 2012

एक पहेली

बिन आँखों के दास ने
देखें पके-पकाए फल
न लिए फल
न छोड़े फल
अब आप ही बताओ
कैसे वो हुआ सफल?


Thursday, September 13, 2012

क़हर

पहले भी बरसा था क़हर
अस्त-व्यस्त था सारा शहर
आज फ़िर बरसा है क़हर
अस्त-व्यस्त है सारा शहर

बदला किसी से लेने से
सज़ा किसी को देने से
मतलब नहीं निकलेगा
पत्थर नहीं पिघलेगा
जब तक है इधर और उधर
मेरा ज़हर तेरा ज़हर

बुरा है कौन, भला है कौन
सच की राह पर चला है कौन
मुक़म्मल नहीं है कोई भी
महफ़ूज़ नहीं है कोई भी
चाहे लगा हो नगर नगर
पहरा कड़ा आठों पहर

न कोई समझा है न समझेगा
व्यर्थ तर्क वितर्क में उलझेगा
झगड़ा नहीं एक दल का है
मसला नहीं आजकल का है
सदियां गई हैं गुज़र
हुई नहीं अभी तक सहर

नज़र जाती है जिधर
आँख जाती है सिहर
जो जितना ज्यादा शूर है
वो उतना ज्यादा क्रूर है
ताज है जिनके सर पर
ढाते हैं वो भी क़हर

आशा की किरण तब फूटेंगी
सदियों की नींद तब टूटेंगी
ताज़ा हवा फिर आएगी
दीवारे जब गिर जाएंगी
होगा जब घर एक घर
न तेरा घर न मेरा घर

Sunday, September 9, 2012

बकने दो जिनको है बकना

चीख-चीख के कर रहें प्रतिद्वंदी वार पे वार
काम-धाम करते नहीं, कर रहें प्रचार
कर रहें प्रचार, कर के डॉलर की बौछार
जनता दर-दर ठोकर खाए, पाए न रोज़गार
और इनको बस लफ़्फ़ाजी सूझे, डायलॉग मारे हज़ार
डायलॉग मारे हज़ार, कहें कूल-कूल है बाहर से, अंदर से अंगार
ओबामा ही इकलौता आदमी, जो करेगा बेड़ा पार

2008 में जब थे पिछले चुनाव
2006 से ही लगे थे कैम्पैनिंग में बराक
सिनेटर थे बस नाम के, सिनेट से न था सरोकार
किताबें लिखना-भाषण देना, यही था इनका कारोबार

जिस महिला से इनकी हुई थी तू-तू मैं-मैं अनेक
जिस महिला से कह दिया की नीति तेरी अ-नेक
उसी महिला को आपने फिर बना दिया सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट
और आज उनके ही पति कर रहें इन्हें डिफ़ेंड

बुश हो, ओबामा हो, चाहे फिर वो हो क्लिँटन
बनना-बिगड़ना तो अपने ही हाथों में सज्जन
सब हैं एक ही थैली के चट्टे-बट्टे, सब का एक ही रंग
कोई नहीं इनमे से ला पाएगा हमारे जीवन में परिवर्तन

अपने ही हाथों में यारो, अपने जीवन की है डोर
बकने दो जिनको है बकना, होने दो जो होता है शोर
हम क्यूँ इनमें वक़्त गवाँए, हम क्यूँ इन्हें दे दें वोट
बकने दो जिनको है बकना, हम तो करते रहेंगे इग्नोर

सिएटल । 513-341-6798
9 सितम्बर 2012

Tuesday, September 4, 2012

अलसाते गीत

उम्र ढल चुकी है
श्वास शिथिल है
बालों पर भी रंग चढ़ चुके हैं
लेकिन निगाहें वहीं रूकी है
जिस डगर पर तुम मिली थी
कोमल भावनाएँ जब जगी थीं
आलिंगन आतुर तुम खड़ी थी
और घटाएँ छा रही थीं
उमंगें मंडरा रही थीं


न दिन का समय था
न रात हुई थी
बस जज़बातों की
बरसात हुई थी


बड़ी देर तक हम चुप रहें थे
कहने को कुछ ढूँढ रहें थे


और मुझे कुछ सूझा नहीं
तो मैंने बस ये कह दिया था
"अच्छा बताओ तुम क्या सुनोगी
रेडियो सिलोन या विविध भारती?
ऑल इंडिया रेडियो की उर्दू सर्विस
या रेडियो नेपाल के अलसाते गीत?"


दिल ढूँढता है फिर वही फ़ुर्सत के रात-दिन ...

सिएटल । 513-341-6798
4 सितम्बर 2012

 

Saturday, September 1, 2012

कर्ता और कारक

मैं हूँ एक भँवरा
और वो भी तो एक कली थी
हम दोनों की बातों में
कितनी रातें ढली थीं



आज भी वो मुझसे
पूछती है खोद-खोद के
किस कली को छेड़ा?
किस कली से बात की?
किस कली के ख़्बाब में
नींद उड़ी मेरे दिन-रात की?



क्या कहूँ मैं उसको?
और क्या छुपाऊँ उससे?
वो जो कभी मेरे
हर राज़ की हमराज़ थी



हम दोनों हैं ऐसे
जैसे एक जान दो तन हैं
किसी भी बात पे हममें
हुई नहीं अनबन है



बस एक बात है जिसपे
रहते हम असहमत हैं
कि
वो कली थी इसलिए
मुझमें भँवराहट हुई
या
मैं भँवरा था इसलिए
वो कली साकार हुई



सिएटल । 513-341-6798
1 सितम्बर 2012