Friday, January 30, 2015

गंदी और गंदी


गंदी और गंदी
कैसे हो गई 
प्यारी-प्यारी नदिया
जाने सारी दुनिया 
माने सारी दुनिया 

टेढ़ी और मेढ़ी 
दुनिया की बातें 
सीधे और सादे 
घी ये निकाले
जब और जैसा, दिखा इसे पैसा, इसने बटोरा

रो के मैं लिखू 
दुखड़ा ये तेरा
बढ़ता ही जाए उधर 
कचरा-ओ-कूड़ा
रोके न रूके, जग बैरी, ऐसा निगोड़ा

मोदी और जो भी 
हैं गद्दी पे
इनके सारे वादे 
पड़े रद्दी में 
कब और किसने, किसका यहाँ, चाहा भला

(आनंद बक्षी से क्षमायाचना सहित)
30 जनवरी 2015
सिएटल । 513-341-6798

मूल गीत यहाँ सुनें:

Wednesday, January 28, 2015

घर आया मेरे परदेसी


घर आया मेरे परदेसी 
मोदी ने अस्मिता बेची

उल्टे-सीधे अनुबंध लिखे
डॉलर के आगे करबद्ध दिखे
आदत है हमें झुकने की

न्यूक्लिअर प्लांट यहाँ होंगे
दूषित-कलूषित जवाँ होंगे
किसको पड़ी इनकी सेहत की

दिल्ली हवा को बुरा कह गया
झूठ कहाँ, वो सच कह गया
बदली छाई यहाँ बदले की

(हसरत जयपुरी से क्षमायाचना सहित)
27 जनवरी 2015
सिएटल | 513-341-6798

Saturday, January 24, 2015

आएगा, आएगा, आएगा, आएगा


ख़ामोश है ज़माना, चुप-चाप हैं सितारे
आराम से है मोदी, बेकल है दिल के मारे
ऐसे में कोई ओबामा, इस तरह से आ रहा है
जैसे कि पधार रहे हैं, ईश्वर कोई हमारे
टीवी चैनल वाले चीखें साँझ और सकारे
आएगा, आएगा, आएगा, आएगा आनेवाला, आएगा आनेवाला 

अमरीका का चमचा भारत कैसे फुदक रहा है
कोई नहीं बताता पर गो-माँस पक रहा है
पनपेगा कैसे भारत बे-रीढ़ सर झुका के

बरसों पहले हमने गांधी सा नेता पाया
जिसने सादा जीवन जीना हमें सीखाया
अब कहाँ हैं वो लोग जो आँख से आँख मिलाए

भटकी हुई जवानी, मँज़िल को ढूँढती है 
माझी बग़ैर नय्या, साहिल को ढूँढती है
चल देते हैं सब के सब इंग्लैंड-अमरीका के द्वारे

Thursday, January 22, 2015

घर से भागे अभागे हैं हम


मैं नर 
ये नारी
और वो एन-आर-आई
पढ़कर मेरी आँख भर आई

कहाँ से कहाँ आ पहुँचे हैं हम
घर से भागे अभागे हैं हम

न क़ानून तोड़ा
न की बदमाशी
फिर भी ख़ुशी 
करे आनाकानी

कहने को है सबकुछ 
और पूरी आज़ादी
फिर भी मन
करे कानाफूसी

अनगिनत बंधन
अनगिनत सलाखें
जो पल-पल हमें 
घर जाने से रोके

उमंगों के बादल
असमंजस के गैसू
घिरते हैं
बढ़ते हैं
न घटते हैं
न छँटते हैं

जो कहना है, करना है
न कहते हैं, न करते हैं
अपने-अपने बवंडर में घुटते हैं

22 जनवरी 2015
सिएटल | 513-341-6798

इस कविता की प्रेरणा यह समाचार है:
सोनाक्षी सिन्हा के भाई का विवाह एक एन-आर-आई की बेटी के साथ सम्पन्न हुआ

Thursday, January 15, 2015

मेरी हेयर स्टाईल



जब बाबूजी गुज़र गए
तो मैंने सोचा
कुछ ऐसा करूँ
कि उनकी याद बनी रहे

उनके जूते पहनने चाहे
और पहने भी
लेकिन
थोड़े ही दिनों में
वे फट गए

कुछ कुर्ते भी पहने
लेकिन वे भी
डील-डोल या
मौसम की नज़ाकत के कारण
उतर गए

फिर सोचा
जो थोड़े बहुत बाल बचे हैं
उन्हें ही
उनके जैसा काढ़ लूँ
बिना मांग के
सारे बाल पीछे कर लिये

इसी बहाने उन्हें
दिन में दो-चार बार
याद कर लेता हूँ
वरना
अब तो चार तारीख भी आती है
तो ऐसे जैसे कि कोई और ही तारीख हो
न कोई पूजा-पाठ
न कोई दान-पुण्य

गाहे-बगाहे
उनके साथ खींची तस्वीरे ज़रूर देख लेता हूँ
तस्वीरों को देख के लगता है
जैसे वो कहीं गए ही नहीं
क्यूँ?
क्योंकि
जब वे थे तब भी नहीं थे
मेरी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा नहीं थे

- बच्चों का स्कूल
- मेरा दफ़्तर
- नाम के तीज-त्योहार
- कुछ छोटी-मोटी गोष्ठियाँ
इन सबमें
उनकी कोई भूमिका नहीं थी

जब थे तब नहीं थे
आज न हो कर भी हैं
मेरी हेयर स्टाईल में

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भागते-दौड़ते एन-आर-आई को
देख कबीरा रोय
दो पाटन के बीच में
साबुत बचा न कोय

15 जनवरी 2015
सिएटल । 513-341-6798

Wednesday, January 7, 2015

सिर्फ़ लफ़्फ़ाज़ी पर यक़ीं न करें


मुझे इंतज़ार है उस दिन का
जब घड़ियाँ बंद हो जाए
कैलेंडर खो जाए
कम्प्यूटर ख़राब हो जाए
फिर देखूँ कि कौन, किसे, किस बात की
शुभकामनाएँ देता है?

समय बदलने से ही
समय नहीं बदल जाता
इसके लिए आवश्यक है
कर्मठता और सहभागीदारिता

सिर्फ़ फ़ेसबुक की अपडेट से
बिट्स और बाईट्स के आदान-प्रदान से
कुछ नहीं होता

आप पूछेंगे कि
ख़ुशी के दिन इतना रोष क्यूँ ?
क्योंकि ख़ुशी के दिन का आक्रोष हमेशा याद रहता है
इसलिए आप भी याद रखें
और कुछ कर्म करें
सिर्फ़ लफ़्फ़ाज़ी पर यक़ीं न करें

3 जनवरी 2015
सिएटल | 513-341-6798



Thursday, January 1, 2015

नव-वर्ष का शुभारम्भ

यह नव-वर्ष का कैसा शुभारम्भ है?

पहले उल्लुओं की तरह जागो
फिर ग़ैर-ज़िम्मेदारों की तरह उठो
और सारा दिन आलस करो

न काम न काज
सुस्त पड़ा सारा समाज

क्या हमारी यही मंशा है
कि सारा साल ऐसे ही गुज़रे?
बेवक़्त खाए
बेवक़्त पीएँ
बेवक़्त सोए
बेवक़्त उठे
सारा-सारा साल
आलस करें?
जो नहीं खाना चाहिए
उसे खाए
जो नहीं पीना चाहिए
उसे पीएँ?
देर रात तक
शोर-शराबा करें?