Wednesday, April 18, 2018

न जाने कौन सी चीज़ तुम्हें पसन्द है

जाने कौन सी चीज़ तुम्हें पसन्द है
इसलिए हनुमान जी की तरह सारी चीज़ उठा लाया
  • मोज़्ज़रैला से लेकर चेडार तक
  • अमेरिकन से लेकर स्विस तक
  • ब्री से लेकर गौडा तक
  • प्रोवोलोन से लेकर पेप्परजैक तक
  • पार्मीज़ैन से लेकर फ़ेटा तक
  • मॉन्ट्री जैक से लेकर हावरार्टी तक
  • ब्लू से लेकर मन्स्टर तक
  • रिकौटा से लेकर कोल्बी तक
  • कॉटेज से लेकर क्रीम तक

नतीजा?
  • पेट बढ़ गया
  • बाल झड़ गए 
  • स्वास्थ्य बिगड़ गया
  • बाग़ उजड़ गया

लेकिन तुम जो चाहती थी
वो चीज़ नहीं मिली
  • कास्टको में, विन्को में 
  • सेफवे में, टारगेट में
  • फ्रेड मायर में, क्यू-एफ-सी में 
  • पी-सी-सी में, होल फ़ूड्स में
  • क्रोगर में, लकी में
  • अल्बरटसन्स में, कारफोर में
  • एक्मे में, आई-जी- में 
  • ट्रैडर जोस में, वॉल-मार्ट में 

क्यूँकि जो हमें चाहिए
उसे 
  • परिभाषित करना कठिन
  • समझाना नामुमकिन 
  • और समझना दुश्वार है

चाहत
एक अहसास है
जिसका होना ही पाना है
जिसकी खोज
एक निरर्थक प्रयास है
जिसका रंग है, रूप है
जिसमें दर्द है, सुकून है
जिसके बग़ैर 
हम एक ज़िंदा लाश है

18 अप्रैल 2018
सिएटल

Tuesday, April 17, 2018

चुपके-चुपके रात दिन फेसबुक पे जाना याद है

चुपके-चुपके रात दिन फेसबुक पे जाना याद है
हमको अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है

दोपहर की पोस्ट हो या हो आधी रात की
वो तेरा हर पोस्ट को लाईक करना याद है

दोस्तों की पोस्ट में था तेरा चेहरा ढूँढता
वो हर किसी ऐरे-गैरे को दोस्त बनाना याद है

हो बुरा, हो घोर बुरा, केम्ब्रिज एनालिटिका के स्टॉफ का
जिसने किया तहस-नहस, किया सब बर्बाद है

आओ चलो फेसबुक छोड़े, पकड़े व्हाट्सैप का हाथ हम
कब, कहाँ, कोई, किसीका देता आजन्म साथ है

(हसरत मोहानी से क्षमायाचना सहित)
17 अप्रैल 2018
सिएटल 

Monday, April 16, 2018

रात भर न बारिश हुई

रात भर बारिश हुई
पूरी कभी ख़्वाहिश हुई

बरसों बरसी बारिश मगर
पूरी कभी ख़्वाहिश हुई
रात भर बारिश हुई

ख़्वाहिशें कुछ ऐसी
कि रत्ती भर भी इधर-उधर हो
जैसे कि
घड़ी हो तो ऐसी
जो सोलर पॉवर्ड हो
जिसके काँटे अंधेरे में चमके
हल्की हो
सुन्दर हो
जिसका पट्टा चमड़े का हो
नहीं तो फिर 
वो घड़ी ही क्या है

घर हो
तो चार बेडरूम का हो
वरना वो घर ही क्या है

नौकरी हो
तो मैनेजर की
वरना वो नौकरी ही क्या है

रात भर बारिश हुई
पूरी कभी ख़्वाहिश हुई

बरसों बरसी बारिश मगर
पूरी कभी ख़्वाहिश हुई
रात भर बारिश हुई

16 अप्रैल 2018
सिएटल 

Sunday, April 15, 2018

जान जाने के बाद जान लेते हैं

जान जाने के बाद
जान लेते हैं
मृतक को किस मर्ज़ ने मारा
पहचान लेते हैं

हम शिखर पर हैं
और शिखर पर अकेले हैं
इसीलिए इन्सान 
इन्सान की जान लेते हैं

इन्सान इन्सान को जान ले
तो बेड़ा पार हो जाए
यही बात कहने को लोग
गंगातट पे तम्बू तान लेते हैं

जवान मरते हैं
अधेड़ ऑफ़िसर बनते हैं
लेकिन वेतन कहाँ सब
समान लेते हैं

यह घर होगा
या होगी यहाँ महाभारत
यह कोई नहीं बता सकता
जब मकान लेते हैं

15 अप्रैल 2018
सिएटल

Saturday, April 14, 2018

जिसका कोई ध्येय नहीं है

पहले मैं जन्मदिन याद रखता था
अब निधन की तारीख़ याद रखता हूँ

पहले रिटायर होने के ख़्वाब देखता था
अब रिटायर होने से डरता हूँ

तेरह में पिता
चौदह में ससुर
पन्द्रह में दोस्त 

फिर तो जैसे ताँता ही लग गया
जीजा, बुआ, मौसा, सास

धीरे-धीरे सारे 
सम्बन्ध छूटते जा रहे हैं
बंधन टूटते जा रहे हैं 

वह नाव
जिसका कोई ध्येय नहीं है
पतवार डाले
पड़ी है सुस्त 

14 अप्रैल 2018
सिएटल