चढ़ते सूरज को सबने प्रणाम किया
चाँद उतरा आँगन तो प्यार किया
जो चढ़ गया
सर चढ़ गया
सर झुका गया
जो उतर गया
दिल में उतर गया
राहुल उपाध्याय । 26 जनवरी 2026 । दिल्ली
चढ़ते सूरज को सबने प्रणाम किया
चाँद उतरा आँगन तो प्यार किया
जो चढ़ गया
सर चढ़ गया
सर झुका गया
जो उतर गया
दिल में उतर गया
राहुल उपाध्याय । 26 जनवरी 2026 । दिल्ली
Posted by Rahul Upadhyaya at 1:03 AM
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इतवारी पहेली:
तारीख़ पड़ी बारह, ##ह# #
नाव न मिली तो आया ## #%#
(बारह को बोलते वक़्त कई बार बारा बोल देते हैं। ह छूट जाता है। इसी तरह से पहली पंक्ति का ह बोलते वक़्त ग़ायब हो जाता है। इसलिए दूसरी पंक्ति के शब्दों से ग़ायब है।
दूसरी पंक्ति का दूसरा शब्द किसी का निक नेम है। जैसे कि अक्षय का अक्की।)
इन दोनों पंक्तियों के अंतिम शब्द सुनने में एक जैसे ही लगते हैं। लेकिन जोड़-तोड़ कर लिखने में अर्थ बदल जाते हैं। हर # एक अक्षर है। हर % आधा अक्षर। हर ^ अक्षर के ऊपर वाली बिंदी है। जैसे कि मंगल —> #^##
जैसे कि:
हे हनुमान, राम, जानकी
रक्षा करो मेरी जान की
ऐसे कई और उदाहरण/पहेलियाँ हैं। जिन्हें आप यहाँ देख सकते हैं।
Https://tinyurl.com/RahulPaheliya
आज की पहेली का हल आप मुझे भेज सकते हैं। या यहाँ लिख सकते हैं।
सही उत्तर न आने पर मैं अगले रविवार - 1 फ़रवरी 2026 को - उत्तर बता दूँगा।
राहुल उपाध्याय । 25 जनवरी 2026 । दिल्ली
Posted by Rahul Upadhyaya at 5:22 PM
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इतवारी पहेली:
न जाने किसका फ़ादर या ## ## है
लेकिन उसमें तनिक भी न #^## है
(पहली पंक्ति का पहला शब्द अंग्रेज़ी का है)
इन दोनों पंक्तियों के अंतिम शब्द सुनने में एक जैसे ही लगते हैं। लेकिन जोड़-तोड़ कर लिखने में अर्थ बदल जाते हैं। हर # एक अक्षर है। हर % आधा अक्षर। हर ^ अक्षर के ऊपर वाली बिंदी है। जैसे कि मंगल —> #^##
जैसे कि:
हे हनुमान, राम, जानकी
रक्षा करो मेरी जान की
ऐसे कई और उदाहरण/पहेलियाँ हैं। जिन्हें आप यहाँ देख सकते हैं।
Https://tinyurl.com/RahulPaheliya
आज की पहेली का हल आप मुझे भेज सकते हैं। या यहाँ लिख सकते हैं।
सही उत्तर न आने पर मैं अगले रविवार - 25 जनवरी 2026 को - उत्तर बता दूँगा।
राहुल उपाध्याय । 18 जनवरी 2026 । दिल्ली
Posted by Rahul Upadhyaya at 5:22 PM
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हर तरह से ज़िंदगी है बस मेरी ज़िंदगी
इसको पाने को कभी न कोई फ़ीस भरी
न मिली कहीं से, न दी किसी ने
नैसर्गिक है जैसे बहती नदी
ये होती कहाँ है, ये उगती कहाँ है
बनाती नहीं इसे मशीन कोई
ये ख़्वाब, ये हसरतें, ये जज़्बात मेरे
इनके ही ईंधन से सदा ये फली
आती है, जाती है, स्वयं ज़िंदगी
इसके आगे कभी न मेरी चली
दे दूँ किसी को मन बहुत हुआ
पर हाथ में न आए ये उलझन बड़ी
राहुल उपाध्याय । 22 जनवरी 2026 । दिल्ली
Posted by Rahul Upadhyaya at 12:27 AM
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पता नहीं
क्या पहनती थीं
सेंडल
चप्पल
या जूतियाँ
सूट
टॉप
या साड़ियाँ
पता नहीं
कैसे बाँधती थीं बाल
लगाती थी लिपस्टिक
या पहनती थीं बालियाँ
पता नहीं
कैसी दिखती थी वो
(देखने को तो देख लूँ
हज़ारों सेल्फियां
बचा के रखी हैं
जो गूगल पे मैंने
दिखा देगा मुझको
एक-एक पिक्सल वो उसके
और उगा देगा
काँटों का बगीचा
यादों का सैलाब
कहाँ की गलती
कहाँ थे ग़लत)
याद है लेकिन
उसकी मुस्कान
रूठना उसका
और टप-टप
बहते वो आँसू
पता नहीं कैसी
होगी वो आज
क्या लड़ रही होगी
आज भी उखड़ी प्रथाओं से
क्या जूझ भी रही होगी
कुछ अपनी व्यथाओं से
क्या प्यार होगा उसे
आज भी उससे
जिसकी बाँहों में उसे
प्यार मिला था
जीवन जीने का
आधार मिला था
परित्यक्त थी
मैंने राह दिखाई
जीवन जीने की
ज्योत जगाई
आई थी मेरे जीवन में धम से
छू के मुझे
मुझको बदलने
छू के चल दी
उन्मुक्त गगन में
याद है गीत मुझे
पहले मिलन का
क्या यही प्यार है?
राहुल उपाध्याय । 20 जनवरी 2026 । दिल्ली
Posted by Rahul Upadhyaya at 4:40 PM
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बड़ी से बड़ी मूर्तियां
खड़ी हैं चारों ओर
युवकों को रोज़गार नहीं
भगदड़ का है शोर
भगदड़ का है शोर
कालिख में नहाए जनता
पर्यावरण को रख ताक पर
बन रहा है पईसा
बन रहा है पईसा
मिलावट जोरदार
खा-खा के आदमी को
हो गए रोग चार
हो गए रोग चार
जिनका नहीं उपचार
अस्पताल के नाम पर
बस मंदिर हैं तैयार
राहुल उपाध्याय । 19 जनवरी 2026 । सिएटल
Posted by Rahul Upadhyaya at 9:57 PM
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अब हम बिना निमंत्रण
किसी के यहाँ नहीं जाते हैं
और वे भी
एक व्हाट्सएप ग्रुप बनाने से
बाज नहीं आते हैं
अब उनमें फ़ोटो और वीडियो
जो शेयर किए जाते हैं
उन्हें लाइक करना
लाज़मी हो जाता है
बाद में
लिखित में
मेजबान को
थैंक्यू बोलना
अनिवार्य हो जाता है
क्योंकि मुँह पर बोलने में
वो मज़ा नहीं
जो बाद में सार्वजनिक
रूप से दिया जाता है
थोड़ा-बहुत
चैटजीपीटी का भी
इस्तेमाल हो जाए
तो चार चाँद लग जाते हैं
हम
औपचारिक बनकर
कितने गर्व से भर जाते हैं
राहुल उपाध्याय । 18 जनवरी 2026 । दिल्ली
Posted by Rahul Upadhyaya at 6:18 AM
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