Friday, June 23, 2017

फ़ेसबुक की तरह हँसता ही रहा हूँ मैं

फ़ेसबुक की तरह

हँसता ही रहा हूँ मैं 

कभी इस 'पोज़' में 

कभी उस 'पोज़' में 

हँसता ही रहा हूँ मैं 


मैं देता रहा

ख़ुशख़बरियाँ कई

मेरी बात मेरे

मन ही में रही

यूँही घुट-घुट के

यूँही झूठमूठ में 

हँसता ही रहा हूँ मैं 


कैसे जुड़ गया

कैसे जोड़ा गया

किस-किससे मुझे

फिर जोड़ा गया

कभी इस गुट में 

कभी उस गुट में 

हँसता ही रहा हूँ मैं 


अपनों की सुनूँ 

या कि ग़ैरों की

हर तरफ़ है फ़ौज 

बे-सर-पैरों की

कभी इस तर्क पे

कभी उस तर्क पे

हँसता ही रहा हूँ मैं 


(रवीन्द्र जैन से क्षमायाचना सहित)

23 जून 2017

सिएटल | 425-445-0827

http://tinyurl.com/rahulpoems


Friday, June 2, 2017

सपाट ही बहता 'गर टकराया न होता

सपाट ही बहता

'गर टकराया होता

लहरें उठतीं

उफान ही आता

'गर किनारा होता


कोई सहारा कहे

और सराहा करे

और कोई कि काश!

माथे पे सेहरा

बाँधा होता


है पत्थर एक नींव 

कि बाधा है कोई

कोई बताता भी भेद

तो माना होता


घड़ी के काँटों सा है

सबका सफ़र 

बारह पर पहुँच कर भी

पूरा होता


हमें होता पता

कि मंज़िल नहीं है

तो एक भी क़दम 

उठाया होता


2 जून 2017

सिएटल | 425-445-0827

tinyurl.com/rahulpoems


Friday, May 26, 2017

मेरी कविता में कईयों की छाप है

मेरी कविता में 

कईयों की छाप है


किसी रेवड़ी वाले की पुकार है

किसी खोमचे वाले की आवाज़ है

किसी शिक्षक की सीख है

किसी अल्हड़ का सुराग़ है

किसी अंचल का शब्द है

किसी आँचल का लाड़ है

किसी बेटे का दर्द है

किसी प्रेमी का प्यार है

किसी जवाँ का जोश है

किसी अधेड़ की भड़ास है


नहीं है तो बस वह

जिसे कहते प्रबुद्धजन

छन्द, बिम्ब या अलंकार हैं


26 मई 2017

सिएटल | 425-445-0827

tinyurl.com/rahulpoems


Wednesday, May 10, 2017

न दिल देखा, न जां देखी

आदमी सेवा से बड़ा 

और मेवा से मोटा बनता है

घर चाहे कितना ही बड़ा हो

ग़ैरों के लिए छोटा पड़ता है


ये नदी, ये नाले

ये पर्वत श्रंखलाएँ 

इनका भी हिसाब

इंसान अब जोड़ा करता है


तुम कितने अच्छे हो

तुम्हें कैसे बताऊँ 

जितना भी कहूँ 

थोड़ा लगता है


दिल देखा

जां देखी

आँखों में ही तो

इन्सान सोता-जगता है


मोहब्बत की राहें 

इतनी मुश्किल भी नहीं 'राहुल'

क्यूँ बात-बात पे यूँ

रोता रहता है


10 मई 2017

सिएटल | 425-445-0827

tinyurl.com/rahulpoems






Friday, April 28, 2017

बीज बो लो

"कुछ पाना है

तो ख़ुद को खो दो

सब पा लोगे"

👆

कब तक ऐसे 

भ्रम पालोगे?


मेरी मानो

तो ख़ुद को खोदो

जो भी है

  • मल-मवाद
  • कूड़ा-करकट

सब हट जाएगा

गड़ा ख़ज़ाना मिल जाएगा


पाना 🔧लेकर

नट-बोल्ट खोलो

हर कसावट को

ढीला छोड़ो

उन्मुक्त हो कर

जग में डोलो

प्रेम-प्यार के

बोल बोलो

सत्कर्म के

बीज बो लो


28 अप्रैल 2017

सिएटल | 425-445-0827


Friday, April 7, 2017

तीन प्रश्न

पानी देते वक़्त सोचता हूँ

माँ ने इतने पौधे क्यूँ लगाए?


फूल निहारते वक़्त सोचता हूँ

माँ ने इतने ही पौधे क्यूँ लगाए?


रोटी, कपड़ा और मकान

तीन का ही तो हुआ था फ़रमान 

फिर पौधों ने कहाँ से पा लिया स्थान?


8 अप्रैल 2017

दिल्ली 

Thursday, April 6, 2017

जब तक हूँ तब तक हूँ

जब तक हूँ

तब तक हूँ

इसके बाद

नभ तक हूँ


सम्बन्धों की सीमाएँ हैं

अनुबंधों की रेखाएँ हैं

इसके बाद

सब तक हूँ


टुकड़ों-टुकड़ों बँटता हूँ

कभी यहाँ, कभी वहाँ रहता हूँ

इसके बाद

पग-पग हूँ


नहीं हूँ तो सचमुच हूँ

हूँ तो झूठमुठ हूँ

समय से परे

पल-पल हूँ


फ़रीदाबाद और दिल्ली के बीच

7 अप्रैल 2017


Friday, March 24, 2017

ट्रम्प भी कैसी है पहेली

ट्रम्प भी
कैसी है पहेली, हाए
कभी तो हँसाए
कभी ये रुलाए


कभी देखो ट्रम्प नहीं माने
पीछे पीछे सपनों के भागे

एक के बाद एक एक्ज़ीक्यूटिव अॉर्डर 

साईन करता चला जाए यहाँ 


जिन्होंने उगाए यहाँ संतरे

उनसे कहे जाओ अपने घर रे
वही चुनकर ख़ामोशी
यूँ चले जाए अकेले कहाँ


(योगेश से क्षमायाचना सहित)

24 मार्च 2017

सिएटल | 425-445-0827

tinyurl.com/rahulpoems


Thursday, March 23, 2017

पटरियाँ

पटरियाँ अगर मिल जाएँ तो दुर्घटना तय है

रंग भी अगर मिल जाएँ तो बेरंग हो जाते हैं

सुर भी अगर अपनी पहचान खो दें 

तो कोलाहल मच जाता है


पृथक-पृथक ही सृष्टि पनपे

पृथक-पृथक इसका रूप मनोहर 

कोई फूल बने, कोई पत्ती बने

कोई गुलमोहर, कोई अमलतास बने


पृथकता ही से पीरियाडिक टेबल

पृथक-पृथक खिले फल-फूल यहाँ 

घुल-मिल के ही रह जाते तो

ख़ाक को तकती ख़ाक यहाँ 


यूँ मिल जाने की, मिट जाने की

चाह है उलटी धार सखा

अब निकल पड़े हो, तो निकल पड़ो

मुड़-मुड़ के देखो कि वो तार कहाँ


https://youtu.be/Md0L3q4wdq4