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Monday, April 16, 2018

रात भर न बारिश हुई

रात भर बारिश हुई
पूरी कभी ख़्वाहिश हुई

बरसों बरसी बारिश मगर
पूरी कभी ख़्वाहिश हुई
रात भर बारिश हुई

ख़्वाहिशें कुछ ऐसी
कि रत्ती भर भी इधर-उधर हो
जैसे कि
घड़ी हो तो ऐसी
जो सोलर पॉवर्ड हो
जिसके काँटे अंधेरे में चमके
हल्की हो
सुन्दर हो
जिसका पट्टा चमड़े का हो
नहीं तो फिर 
वो घड़ी ही क्या है

घर हो
तो चार बेडरूम का हो
वरना वो घर ही क्या है

नौकरी हो
तो मैनेजर की
वरना वो नौकरी ही क्या है

रात भर बारिश हुई
पूरी कभी ख़्वाहिश हुई

बरसों बरसी बारिश मगर
पूरी कभी ख़्वाहिश हुई
रात भर बारिश हुई

16 अप्रैल 2018
सिएटल 

Sunday, October 16, 2016

चुनाव हमारे हाथ में है



किसी के लिए

यह इमर्जेंसी हो सकती है

कि

पत्ते झड़ रहे हैं

टूट रहे हैं

बिखर रहे हैं


और किसी के लिए

यह भी कि

जो होना था

वही हो रहा है

विधि का विधान है

जो आया है, वो जाएगा

जो खिला है, वो झड़ेगा


और फिर मौसम भी है

कोई बेवक़्त तो नहीं गिर रहा


जब पत्तों का जीवन

इतना सुनियोजित है

पूर्वनिर्धारित है

फिर मेरा क्यूँ नहीं?

हमारा क्यूँ नहीं?


क्यूँ कोई

वक़्त से पहले 

चला जाता है

टूट जाता है

बिखर जाता है


क्या इसलिए कि

पत्ते 

निष्क्रिय रहे?

एक से चिपके रहे?

स्कूल गए,

नौकरी की,

घर बनाया,

कविता लिखी?


नहीं,

बल्कि इसलिए कि

पत्ते निष्काम हैं

हम कर्मलिप्त हैं


कर्म से सुख है

कर्म से दु: है


कर्म से प्रगति है

कर्म से दुर्गति है


चुनाव हमारे हाथ में है


16 अक्टूबर 2016

सिएटल | 425-445-0827



Saturday, September 3, 2016

घोषणापत्र एक weed का



(अगर आपके पास घर है, और घर के आजू-बाज़ू ज़मीन है, जहाँ आप अपना मनचाहा बाग़ लगाना चाहते हैं, तो weeds बिन बुलाए मेहमान की तरह चली आतीं हैं और आपके लिए एक चुनौती बन जाती है। weeds के लिए उपयुक्त हिंदी शब्द नहीं मिला, जिसमें वो भाव हो जो मैं यहाँ लाना चाहता हूँ।)

कहते हो जंगली मुझको 
मैं भी एक फूल हूँ
चुभता हूँ क्यूँ आँखों में?
उड़ती न धूल हूँ

तिरस्कृत कितना भी कर लो
चाहे न दो दाना-पानी
खिलना मेरी फ़ितरत है
खिलने की मैंने ठानी

जल चुकी घास सारी
झड़ चुके फल-फूल सारे
मैं ही हूँ एक हठधर्मी
जिसने की रंग की बौछारें 

तुम चाहे काट डालो
या फिर जड़ से उखाड़ो
खिलना मेरी फ़ितरत है
खिलने की मैंने ठानी

चढ़ता न पूजा की वेदी
गूँथता न कोई माला
सजता न गुलदस्ते में मैं
पहनती न बालों में बाला

कितना भी ठुकराया जाऊँ 
फिर भी मैं खिलता जाऊँ 
खिलना मेरी फ़ितरत है
खिलने की मैंने ठानी

बू आती बग़ावत की है
लगती हिमाक़त भी है
पर तुम ध्यान से सोचो 
तो ये तर्कसंगत भी है

करता न गिला-शिकवा
करता मैं कर्म अपना
खिलना मेरी फ़ितरत है
खिलने की मैंने ठानी

तुम क्यों हो लाल-पीले
क़ुदरत की लीला सारी
न होता डी-एन-ए ऐसा
न लेता ज़िम्मेदारी 

हो धरती का कोई कोना
मुझको हर जगह है होना
खिलना मेरी फ़ितरत है
खिलने की मैंने ठानी

3 सितम्बर 2016
सिएटल | 425-445-0827

Thursday, September 1, 2016

सुनसान राहों में


सुनसान राहों में 
विकसित सभ्यता बोलती है
पदचिह्न तो हैं नहीं
मार्गचिह्न बोलते हैं

इधर मुड़ो
उधर चलो
यहाँ रूको 
वहाँ देखो

सभ्यता के मायने
दायरे समझा रहे हैं
Invisible fence से हम
सहर्ष घिरे जा रहे हैं
समाजशास्त्र के पाठ
अब याद आ रहे हैं

सुनसान राहों में ...

1 सितम्बर 2016
सिएटल | 425-445-0827


Friday, July 29, 2016

अब भी हैं कुछ निष्पाप चराचर



मेघों के कंधों पर रख के 
सबने बंदूक़ चलाई है 
कभी प्रियतम को बाँह में बाँधा 
कभी स्कूल की छुट्टी कराई है

कोई पर्यावरण पर भाषण देता
कोई देता किसानों की दुहाई है
हर कोई अपना उल्लू सीधा करता
पल-पल करता चतुराई है

खेत-खलिहान, पर्वत-सरिता
सब पुलकित हो जाते हैं
काले ऊटपटाँग बादलों से
उनके सपने पूरे हो जाते हैं

और उधर श्वेत रूई के फोहों से जो
एक क़तार में सुव्यवस्थित हो जाते हैं
उनसे भी अटकलें लगा-लगाकर 
बाल-वृंद रोमांचित हो जाते हैं

किसी को घोड़े, किसी को हाथी
किसी को बकरी-मेमने दिखने लग जाते हैं
बादलों की बनती-बिगड़ती आकृतियों में 
सबको अपने-अपने मनवांछित रूप मिल जाते हैं

मेघों के कंधों पर रख के 
सबने बंदूक़ चलाई है 
पर अब भी हैं कुछ निष्पाप चराचर
जो सहज आह्लादित हो जाते हैं

29 जुलाई 2016
सिएटल | 425-445-0827
=======
निष्पाप = sinless
चराचर = movable and immovable






Saturday, July 23, 2016

जवानी में प्रियतम


जवानी में प्रियतम
बचपन में मामा
बहुरूपिया नहीं
कोई तुमसा प्यारा

घटते हो, बढ़ते हो
दिखते हो, छुपते हो
बहुरूपिया नहीं 
कोई तुमसे ज़्यादा 

सागर भी उछले
बादल भी चूमे
रक़ीबों ने भी चाहा
तो मिल के तुम्हें चाहा

होली हो, दीवाली हो
या हो राखी-भैया-दूज
हर तीज-त्योहार
हमने तुमसे बाँधा 

सुहागिन भी पूजे
लड़कपन भी ताके
कशिश तुममें कैसी
समझ मैं न पाया

दाग भी हैं
और बेनूर भी हो
फिर भी ख़ूबसूरती का
मापदण्ड तुम्हें माना

भूखा भी रखते हो
मिटाते भी भूख हो
हर मज़हब ने तुमको
हबीब अपना जाना

नाम भी तुम्हारे
अनगिनत कई हैं
मैं लिखूँ, न लिखूँ
समझ गया ज़माना

23 जुलाई 2016
सिएटल | 425-445-0827
Http://tinyurl.com/rahulpoems
=======
रक़ीब = rivals in love
ताके = to gaze
हबीब = friend




Tuesday, April 26, 2016

हम हैं तो ख़ुशियाँ हैं


घड़े भरकर
जब कोई जल लाता है
तो वो जल 
किसी नदी, बावड़ी, या कुएँ का ही होता है
सागर का नहीं 

सागर
अथाह है
वृहद है
विशाल है
लुभाता है
आकर्षित करता है 
हाथ में हाथ लेकर
किनारे-किनारे चलने को
बाध्य करता है

लेकिन
प्यास
नहीं बुझा पाता है

उसके लिए
वाष्पीकरण आवश्यक है
मेघ बनते हैं
बरसते हैं
पर्वतों की श्रंखलाओं पर
खेत-खलिहानों पर
नदी, बावड़ी, कुओं पर

फूल खिलते हैं
रंग चटखते हैं
पक्षी चहकते हैं

सारी घाटी ख़ुशियों से सराबोर हो जाती है

यही जल-चक्र जीवन का स्रोत है
इसी जल-चक्र में जन्म-मरण है
यही आत्मा-परमात्मा का दर्पण है

और हम हैं कि 
जन्म-मरण के चक्र से भयभीत हैं
जबकि इसके बिना प्रकृति रंगहीन है

हम अभिशप्त नहीं 
सहायक हैं

हम
जब भी आए
क्यूँ न 
कोई पुष्प खिलाए, बाग़ महकाए
किसी सूखे दरख़्त की प्यास बुझाए

मेघ हैं
तो बगिया है
हम हैं
तो ख़ुशियाँ हैं

26 अप्रैल 2016


Saturday, March 5, 2016

सुराही




सुराही सुरा ही पिलाती 
तो राही सु-राही नहीं होता
डगमगाता, बहक जाता
पाँव तो क्या, सर भी
मंज़िल की ओर अग्रसर नहीं होता

धरती तो धारती है
कब किसको तारती है?
ग्रेविटी की ग्रेव में
हम सबको पालती है

समंदर के अंदर क्या है
यह समंदर ही जानता है
लहरें तो सतही हैं
सत ही कहाँ जानती हैं

आसमान तो आसमान है
सदा एक समान है
वह तो बदली ही है
जो रंग-रूप बदलती है
आसमान में रहती है
और रहती असमान है

सुरा = शराब
धारना = to hold जैसे कि रूपया या मुरली
ग्रेविटी = Gravity
ग्रेव = Grave

5 मार्च 2016
सिएटल | 425-445-0827

Tuesday, February 23, 2016

फूल और काँटे

RTहुM presents
 




कौन कहता है कि
फूल होंगे तो काँटे भी होंगे 

फल देने वाले पेड़ों पर
फूल तो होते हैं
पर काँटे नहीं होते

सिएटल | 425-445-0827

Monday, February 22, 2016

Chicken and egg

RTहुM presents

बीज है तो फल है
फल है तो बीज है

न पूर्वार्ध है कोई 
न उत्तरार्ध है कोई
सब के सब हैं
गोलार्ध  कोई 


सिएटल । 425-445-0827

Thursday, December 4, 2014

मेरे घर के आसपास अभी भी ज़मीं बर्फ़ है

मेरे घर के आसपास अभी भी ज़मीं बर्फ़ है

तेरी चाहत, तेरी आरज़ू क्या सचमुच इतनी सर्द है?

कमरों में 
कैमरों में
अपने-अपने वाहनों में
हर कोई  क़ैद है
हाड़-माँस का पुतला ढूँढा तो मिलता होमलेस है

रोशनी है
चकाचौंध है
पेड़ हैं
पेड़ पर लगी लाईट्स हैं
देते हैं दान भी
पर क्या मन में नहीं कोई खोट है?

इधर
ठिठुरता है दिल
सिकुड़ता है दिमाग़ 
कटकटाते हैं दाँत
और उधर 
रेस्टोरेंट से आती है 
छुरी-कांटों की
फ़ाईन-चाईना से
खटर-पटर की आवाज़
और
हड्डियों को चीरता
डीन मार्टिन का गीत
"लेट ईट स्नो, लेट ईट स्नो, लेट ईट स्नो"

4 दिसम्बर 2014
सिएटल । 513-341-6798

Wednesday, December 3, 2014

पतंग सा चाँद

पतंग सा चाँद

जाड़ों की रात में 
पत्ते रहित पेढ़ की
सूखी टहनियों में 
फँसा था

फँसा क्या था
फँसाया गया था
मेरी रचनात्मक नज़रों द्वारा

करूँ भी तो क्या करूँ?
कैमरे में 
ऐसी ही तस्वीरें क़ैद की जाती हैं
कलर के ज़माने में 
श्वेत-श्याम प्रिंट की जाती हैं
बड़ी महंगी फ़्रेम में जड़ दी जाती हैं
और
किसी रईस के घर के आधे-अधूरे रोशन गलियारे की शोभा बन जाती हैं
हाथ में पेग लिए लोग उसका मूल्याँकन करने लग जाते हैं

और उधर
चाँद ढलता रहता है
टहनियाँ ठिठुरती रहती हैं
तथाकथित कला के क़द्रदानों के वाणिज्य से अपरिचित-अनभिज्ञ-अनजान

3 दिसम्बर 2014
सिएटल | 513-341-6798

Thursday, July 24, 2014

bug है cloud में

पत्ते झड़ रहे हैं
तापमान गिर रहा है
स्वेटर जो पैक थे
निकलने लगे हैं
ये बे-वक़्त की सर्दी
शायद रास्ता भूल गई है
जाना था सिडनी
सिएटल पहुँच गई है


इससे पहले कि मैं दरवाज़ा जड़ूँ
बिन बुलाए अतिथि का अपमान करूँ

कोई है कहीं तो
इसकी GPS सही कराओ
कोई App-वैप हो तो उसे
download कराओ
और 'गर bug है cloud में
तो Dev को बुलाओ
जिसने बनाया
उसी से fix कराओ

24 जुलाई 2014
सिएटल । 513-341-6798

Thursday, October 3, 2013

मैं मर रहा हूँ, झर रहा हूँ

मैं
मर रहा हूँ
झर रहा हूँ
और
तुम हो कि
मैं तुम्हें सुंदर लग रहा हूँ


ये तुम्हारे सर से
रंगों से प्रेम का भूत
'गर नहीं उतरा
तो एक न एक दिन
ये तुम्हें ज़रूर ले डूबेगा


इतने पतझड़ बीत गए
लेकिन फिर भी
इस बार फिर
तुम कैमरा लटकाए
दाँत फाड़े खड़े हो
जैसे मुझपे फूल खिले हो


अजी 'फ़ूल' तो तुम हो
जो अब तक नहीं समझ सके
कि हरे का लाल होना कभी शुभ नहीं रहा
चाहे चौराहे के ट्रैफ़िक की लाईट हो
या प्लेटफ़ार्म पे लहराती झण्डी


हरा हरा ही रहे तो बेहतर है
खाली-पीली लाल-पीला होना किसे अच्छा लगता है?


3 अक्टूबर 2013
सिएटल । 513-341-6798

Saturday, September 14, 2013

आता है तो लाल

आता है तो लाल
जाता है तो लाल
वैसे ही
जैसे
मानव
शिशु-अवस्था में
आता है तो लाल
हो के लहूलुहान
और
प्रौढ़ावस्था में
जाता है तो लाल
चिता की लौ में हो के अंतर्ध्यान


हम सब जानते हैं कि
सूरज
न उगता है
न डूबता है
सदा
प्रकाशमान रहता है


वैसे ही
शिशु भी
न जन्मता है
न मरता है
सिर्फ़
चोला बदलता रहता है


इस
मायावी मंच पे
पर्दा कभी उठता है
तो पर्दा कभी गिरता है


14 सितम्बर 2013
सिएटल ।
513-341-6798

Saturday, June 22, 2013

चाँद मिलता नहीं सबको संसार में

आज चाँद पूरा होगा
(अधुरा कब था?)
आज चाँद बड़ा होगा
(छोटा कब था?)
आज चाँद हमसे सबसे ज़्यादा करीब होगा

और मुझमें इतना ज्ञान आया कहाँ से?
विज्ञान से


 वरना
हमें क्या
चाँद निकले तो निकले
न निकले तो न निकले
दिखे तो ठीक
न दिखे तो ठीक
छोटा है या बड़ा
पास है या दूर
हमें इससे कोई सरोकार नहीं है

सागर की लहरें उछलती हो तो उछलें
हमने तो समंदर की ओर देखना तक छोड़ दिया है
जब से हवा से बातें करने लगे हैं
वायुयान में सफ़र करने लगे हैं
और वहाँ भी
ताकि कोई विघ्न न पड़े
चाँद-सूरज बाधा न बने
खिड़की पर पर्दा गिरा देते हैं
और एक छोटे से पर्दे पर
हा-हा-ही-ही
और नाच गाना देखते रहते हैं
तिलस्मी विडियो-गेम्स खेला करते हैं

चाँद का होना न होना
कोई मायने नहीं रखता है
हमारे लिये

22 जून 2013
सिएटल ।

513-341-6798