Monday, April 16, 2018
रात भर न बारिश हुई
Sunday, October 16, 2016
चुनाव हमारे हाथ में है
किसी के लिए
यह इमर्जेंसी हो सकती है
कि
पत्ते झड़ रहे हैं
टूट रहे हैं
बिखर रहे हैं
और किसी के लिए
यह भी कि
जो होना था
वही हो रहा है
विधि का विधान है
जो आया है, वो जाएगा
जो खिला है, वो झड़ेगा
और फिर मौसम भी है
कोई बेवक़्त तो नहीं गिर रहा
जब पत्तों का जीवन
इतना सुनियोजित है
पूर्वनिर्धारित है
फिर मेरा क्यूँ नहीं?
हमारा क्यूँ नहीं?
क्यूँ कोई
वक़्त से पहले
चला जाता है
टूट जाता है
बिखर जाता है
क्या इसलिए कि
पत्ते
निष्क्रिय रहे?
एक से चिपके रहे?
न स्कूल गए,
न नौकरी की,
न घर बनाया,
न कविता लिखी?
नहीं,
बल्कि इसलिए कि
पत्ते निष्काम हैं
हम कर्मलिप्त हैं
कर्म से सुख है
कर्म से दु:ख है
कर्म से प्रगति है
कर्म से दुर्गति है
चुनाव हमारे हाथ में है
16 अक्टूबर 2016
सिएटल | 425-445-0827
Saturday, September 3, 2016
घोषणापत्र एक weed का
Thursday, September 1, 2016
सुनसान राहों में
Friday, July 29, 2016
अब भी हैं कुछ निष्पाप चराचर
Saturday, July 23, 2016
जवानी में प्रियतम
Posted by Rahul Upadhyaya at 9:33 AM
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Labels: nature, relationship
Tuesday, April 26, 2016
हम हैं तो ख़ुशियाँ हैं
Posted by Rahul Upadhyaya at 7:25 AM
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Saturday, March 5, 2016
सुराही
Posted by Rahul Upadhyaya at 3:59 PM
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Tuesday, February 23, 2016
फूल और काँटे
Posted by Rahul Upadhyaya at 8:47 PM
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Monday, February 22, 2016
Chicken and egg
Posted by Rahul Upadhyaya at 6:53 PM
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Labels: nature
Thursday, December 4, 2014
मेरे घर के आसपास अभी भी ज़मीं बर्फ़ है
मेरे घर के आसपास अभी भी ज़मीं बर्फ़ है
Posted by Rahul Upadhyaya at 10:32 PM
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Labels: nature
Wednesday, December 3, 2014
पतंग सा चाँद
पतंग सा चाँद
Posted by Rahul Upadhyaya at 8:01 PM
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Thursday, July 24, 2014
bug है cloud में
तापमान गिर रहा है
स्वेटर जो पैक थे
निकलने लगे हैं
ये बे-वक़्त की सर्दी
शायद रास्ता भूल गई है
जाना था सिडनी
सिएटल पहुँच गई है
इससे पहले कि मैं दरवाज़ा जड़ूँ
बिन बुलाए अतिथि का अपमान करूँ
कोई है कहीं तो
इसकी GPS सही कराओ
कोई App-वैप हो तो उसे
download कराओ
और 'गर bug है cloud में
तो Dev को बुलाओ
जिसने बनाया
उसी से fix कराओ
24 जुलाई 2014
सिएटल । 513-341-6798
Posted by Rahul Upadhyaya at 8:27 AM
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Thursday, October 3, 2013
मैं मर रहा हूँ, झर रहा हूँ
मर रहा हूँ
झर रहा हूँ
और
तुम हो कि
मैं तुम्हें सुंदर लग रहा हूँ
ये तुम्हारे सर से
रंगों से प्रेम का भूत
'गर नहीं उतरा
तो एक न एक दिन
ये तुम्हें ज़रूर ले डूबेगा
इतने पतझड़ बीत गए
लेकिन फिर भी
इस बार फिर
तुम कैमरा लटकाए
दाँत फाड़े खड़े हो
जैसे मुझपे फूल खिले हो
अजी 'फ़ूल' तो तुम हो
जो अब तक नहीं समझ सके
कि हरे का लाल होना कभी शुभ नहीं रहा
चाहे चौराहे के ट्रैफ़िक की लाईट हो
या प्लेटफ़ार्म पे लहराती झण्डी
हरा हरा ही रहे तो बेहतर है
खाली-पीली लाल-पीला होना किसे अच्छा लगता है?
3 अक्टूबर 2013
सिएटल । 513-341-6798
Posted by Rahul Upadhyaya at 11:44 PM
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Labels: nature
Saturday, September 14, 2013
आता है तो लाल
जाता है तो लाल
वैसे ही
जैसे
मानव
शिशु-अवस्था में
आता है तो लाल
हो के लहूलुहान
और
प्रौढ़ावस्था में
जाता है तो लाल
चिता की लौ में हो के अंतर्ध्यान
हम सब जानते हैं कि
सूरज
न उगता है
न डूबता है
सदा
प्रकाशमान रहता है
वैसे ही
शिशु भी
न जन्मता है
न मरता है
सिर्फ़
चोला बदलता रहता है
इस
मायावी मंच पे
पर्दा कभी उठता है
तो पर्दा कभी गिरता है
14 सितम्बर 2013
सिएटल । 513-341-6798
Posted by Rahul Upadhyaya at 5:26 PM
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Labels: nature
Saturday, June 22, 2013
चाँद मिलता नहीं सबको संसार में
(अधुरा कब था?)
आज चाँद बड़ा होगा
(छोटा कब था?)
आज चाँद हमसे सबसे ज़्यादा करीब होगा
और मुझमें इतना ज्ञान आया कहाँ से?
विज्ञान से
वरना
हमें क्या
चाँद निकले तो निकले
न निकले तो न निकले
दिखे तो ठीक
न दिखे तो ठीक
छोटा है या बड़ा
पास है या दूर
हमें इससे कोई सरोकार नहीं है
सागर की लहरें उछलती हो तो उछलें
हमने तो समंदर की ओर देखना तक छोड़ दिया है
जब से हवा से बातें करने लगे हैं
वायुयान में सफ़र करने लगे हैं
और वहाँ भी
ताकि कोई विघ्न न पड़े
चाँद-सूरज बाधा न बने
खिड़की पर पर्दा गिरा देते हैं
और एक छोटे से पर्दे पर
हा-हा-ही-ही
और नाच गाना देखते रहते हैं
तिलस्मी विडियो-गेम्स खेला करते हैं
चाँद का होना न होना
कोई मायने नहीं रखता है
हमारे लिये
22 जून 2013
सिएटल ।
513-341-6798
Posted by Rahul Upadhyaya at 3:41 PM
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