Saturday, July 23, 2016

जवानी में प्रियतम


जवानी में प्रियतम
बचपन में मामा
बहुरूपिया नहीं
कोई तुमसा प्यारा

घटते हो, बढ़ते हो
दिखते हो, छुपते हो
बहुरूपिया नहीं 
कोई तुमसे ज़्यादा 

सागर भी उछले
बादल भी चूमे
रक़ीबों ने भी चाहा
तो मिल के तुम्हें चाहा

होली हो, दीवाली हो
या हो राखी-भैया-दूज
हर तीज-त्योहार
हमने तुमसे बाँधा 

सुहागिन भी पूजे
लड़कपन भी ताके
कशिश तुममें कैसी
समझ मैं न पाया

दाग भी हैं
और बेनूर भी हो
फिर भी ख़ूबसूरती का
मापदण्ड तुम्हें माना

भूखा भी रखते हो
मिटाते भी भूख हो
हर मज़हब ने तुमको
हबीब अपना जाना

नाम भी तुम्हारे
अनगिनत कई हैं
मैं लिखूँ, न लिखूँ
समझ गया ज़माना

23 जुलाई 2016
सिएटल | 425-445-0827
Http://tinyurl.com/rahulpoems
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रक़ीब = rivals in love
ताके = to gaze
हबीब = friend




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1 comments:

Kamal Bhannaat said...

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