Saturday, July 16, 2016

मेरे गीतों में अब भी सावन है


मेरे गीतों में अब भी सावन है
पर सावन नहीं मनभावन है

यह छत से चूता पानी है
यह सड़क पे घुटनों तक गंदला पानी है

भीग जाओ तो बीमारी हो जाती है
कपड़ों में मोल्ड हो जाती है

मेरे गीतों में अब भी सावन है
पर सावन नहीं मनभावन है

कभी हँसता था, अब रोता हूँ
तकिये का लिहाफ़ भिगोता हूँ

मेरे गीतों में अब भी सावन है
पर सावन नहीं मनभावन है

कब क्या हुआ और क्यूँ हुआ
इसका तो कोई जवाब नहीं
लिखने को लिख दूँ बात अनेक 
पर रिश्तों का होता हिसाब नहीं 

सब बदलता है, सब बदलेगा
वक़्त भी एक न एक दिन बदलेगा

फिर एक दिन ठहाके गूँजेंगे
दीवाली के पटाखे फूटेंगे

गोया आज मेरे कोई पास नहीं
करता मुझे कोई याद नहीं

मेरे गीतों में अब भी सावन है
पर सावन नहीं मनभावन है

16 जुलाई 2016
सिएटल | 425-445-0827

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