Monday, September 24, 2018

ज़िक्र होता है जब क़यामत का

ज़िक्र होता है जब क़यामत का तेरे जलवों की बात होती है
तू जो चाहे तो नोट बदलता है तू जो जागे तो रात होती है

तेरे छप्पन इँची सीने के धोखे में 
देखे थे हमने ख़्वाब कैसे कैसे
'गर करेगा कोई हमला तो
देंगे हम जवाब कैसे-कैसे
अब तो सिर्फ क्रिकेट-विकेट चलता है
और सीमाओं पे वारदात होती है

तेरे कुर्ते-पजामे में हमने
बापू-टेरेसा की सादगी देखी
तेरे भाषण, तेरे तेवर में 
नए ज़माने की ताज़गी देखी
अब जो जाना तो पाया कि दो करोड़ की सम्पत्ति है
और तेरे ही तेरे मन की बात होती है

फिर से आए हैं चुनावों के मौसम
विपक्ष को जिताने के नहीं पक्ष में हैं हम
यह जनतंत्र कैसा षड़यंत्र है
तुझे वोट देने को मजबूर हैं हम
पर कुछ तो कर अच्छे दिनों के लिए
यहाँ तो दिन-दहाड़े ही रात होती है

(आनन्द बक्षी से क्षमायाचना सहित)
24 सितम्बर 2018
सिएटल


Sunday, September 23, 2018

फल की अभिलाषा

चाह नहीं, मैं ट्रक में भर के
गोदामों में पक जाऊँ 
या किसी मेज़ की शोभा बनूँ
और फ़्रीज़ में उम्र बढ़ाऊँ 

चाह नहीं मैं पीस-पिसा के
'जाम' में बदला जाऊँ 
और पाँच सितारा होटल में 
ऊँगलियों पे चाटा जाऊँ 

मुझे छोड़ देना उस पेड़ पर
जिस पर बच्चे पत्थर मारे फेंक
कोई रोके, कोई टोके
कोई मासूमों में भरे विवेक

(माखनलाल चतुर्वेदी से क्षमायाचना सहित)
23 सितम्बर 2018
सिएटल

Wednesday, September 19, 2018

न नक़ली है, न असली है


नक़ली है, असली है
जिसे समझा कली, कली है
मेरे ही अहसासों की मूरत
कभी लगी बुरी, कभी भली है

चलो बनाए सम्बन्ध ऐसे
बंद हों, बन्धन हों
रजनीश की बातें आज भी अमर हैं
भले ही स्वीकारने में थोड़ी कमी है

गंगा-जमना-सरस्वती तलक तो सही था
ब्रह्मपुत्र कहाँ से यहाँ फँस गया ये
समन्दर से मिलने की
इसको क्या पड़ी है?

इशारों-इशारों में कहते हैं जो
इशारों-इशारों में कब समझते हैं वो
अपने ही वादों से मुकरना है जीवन
जो तिल-तिल कटे वही ज़िन्दगी है

19 सितम्बर 2018
सिएटल







Monday, September 17, 2018

न फेसबुक से हूँ, न व्हाट्सैप से

फ़ेसबुक से हूँ, व्हाट्सैप से
जैसा भी हूँ, अपने आप हूँ
जिनसे मिला इनसे पहले मैं
मैं उन सबकी धुँधली याद हूँ

सुविधाएँ आएँगी-जाएँगी
सुविधाएँ आईं-गईं कई
सुविधाएँ जिन्हें मिल सकी
मैं उन सबके साथ-साथ हूँ

बदल गया कहीं कोई
सम्हल गया कहीं कोई
जो बदल सका, सम्हल सका
मैं उस शख़्स की मिसाल हूँ

जो बच गया है यहीं कहीं
जो लूट गया है यहीं कहीं
सीमाएँ तोड़ दीं तबसे मैं
आज़ाद-आज़ाद-आज़ाद हूँ

17 सितम्बर 2018
सिएटल

Saturday, September 15, 2018

मैं आया तबसे गया नहीं

मैं आया तबसे गया नहीं 
जैसा था वैसा रहा नहीं 
गया पचीसों बार मगर
उस राहुल में वो राहुल था नहीं 

मूँछ हटी, बाल झड़े
दाँत भी अब वो कहाँ रहे
इस नित बदलती काया में 
मूल कण कोई बचा नहीं 

रंग बदल गए, ढंग बदल गए 
शहर बदले, संग बदल गए
अपने-पराए का भेद मिटा
अपना-पराया कोई लगा नहीं 

समय भागता है घड़ी की सुइयों सा
मौसम बदलता है कैलेण्डर के पन्नों सा
इस आपाधापी के माहौल में 
ख़ुद ने ही ख़ुद से कुछ कहा नहीं 

15 सितम्बर 2018
(अमरीका में पदार्पण की 32 वीं वर्षगाँठ)
सिएटल