Tuesday, December 30, 2008

शुभकामनाओं की मियाद

साल दर साल

मन में उठता है सवाल

शुभकामनाओं की मियाद

क्यूं होती है बस एक साल?

 

चलो इसी बहाने

पूछते तो हो

एक दूसरे का हाल

साल दर साल

जब जब आता नया साल

 

सेन फ़्रांसिस्को

30 दिसम्बर 2004

Monday, December 29, 2008

वर्ष का आरम्भ

पहले प्रतीक्षा रहती थी वर्ष के आरम्भ की

क्यूंकि तब डायरी बदली जाती थी

पहले प्रतीक्षा रहती थी वर्षा के आरम्भ की

जो सावन की बदली लाती थी

 

अब कम्प्यूटर के ज़माने में डायरी एक बोझ है

और बेमौसम बरसात होती रोज है

 

बदली नहीं बदली

ज़िंदगी है बदली

 

बारिश की बूंदे जो कभी थी घुंघरु की छनछन

दफ़्तर जाते वक्त आज कोसी जाती हैं क्षण क्षण

पानी से भरे गड्ढे थे झिलमिलाते दर्पण

आज नज़र आते है बस उछालते कीचड़

 

जिन्होने सींचा था बचपन

आज वही लगते हैं अड़चन

 

रगड़ते वाईपर और फिसलते टायर

दोनो के बीच हुआ बचपन रिटायर

 

बदली नहीं बदली

ज़िंदगी है बदली

 

कभी राम तो कभी मनोहारी श्याम

कभी पुष्प तो कभी बर्फ़ीले पहलगाम

तरह तरह के कैलेंडर्स से सजती थी दीवारें

अब तो गायब हो गए हैं ग्रीटिंग कार्ड भी सारे

या तो कुछ ज्यादा ही तेज हैं वक्त के धारें

या फिर टेक्नोलॉजी ने इमोशन्स हैं मारे

दीवारों से फ़्रीज और फ़्रीज से स्क्रीन पर

सिमट कर रह गए संदेश हमारे

 

जिनसे मिलती थी अपनों की खुशबू

आज है बस रिसाइक्लिंग की वस्तु

 

बदली नहीं बदली

ज़िंदगी है बदली

 

पहले प्रतीक्षा रहती थी वर्ष के आरम्भ की ...

 

सिएटल,

31 दिसम्बर 2007

==============

डायरी = diary

वाईपर =wiper

टायर = tire

रिटायर = retire

कैलेंडर्स = calendars

ग्रीटिंग कार्ड = greeting card

टेक्नोलॉजी = technology

इमोशन्स = emotions

फ़्रीज = fridge

स्क्रीन्स =screens

रिसाइक्लिंग = recycling

Wednesday, December 24, 2008

क्रिसमस

छुट्टीयों का मौसम है

त्योहार की तैयारी है

रोशन हैं इमारतें

जैसे जन्नत पधारी है

 

कड़ाके की ठंड है

और बादल भी भारी है

बावजूद इसके लोगो में जोश है

और बच्चे मार रहे किलकारी हैं

यहाँ तक कि पतझड़ की पत्तियां भी

लग रही सबको प्यारी हैं

दे रहे हैं वो भी दान

जो धन के पुजारी हैं

 

खुश हैं खरीदार

और व्यस्त व्यापारी हैं

खुशहाल हैं दोनों

जबकि दोनों ही उधारी हैं

 

भूल गई यीशु का जन्म

ये दुनिया संसारी है

भाग रही उसके पीछे

जिसे हो हो हो की बीमारी है

 

लाल सूट और सफ़ेद दाढ़ी

क्या शान से संवारी है

मिलता है वो माँल में

पक्का बाज़ारी है

 

बच्चे हैं उसके दीवाने

जैसे जादू की पिटारी है

झूम रहे हैं जम्हूरें वैसे

जैसे झूमता मदारी है

 

सेन फ़्रांसिस्को

दिसम्बर 2003

 

Monday, December 22, 2008

श्वेत हिम-कण

पिछले तीन दिनों से
श्वेत हिम-कण
मेरे घर पर पहरे दे रहे हैं
न किसी को आने देते हैं
न मुझे ही बाहर पाँव धरने दे रहे हैं

बड़े आए लिखने वाले
रोती-धोती अबला के मर्म पर
हम से बड़ा है मर्द कौन
देख इधर और कुछ शर्म कर
बार-बार हिम-कण
मुझे उलाहने दे रहे हैं

खिलती है धूप मगर
ये हैं कि मिटते ही नहीं
चलती है हवा मगर
ये हैं कि हटते ही नहीं
इनके आगे बड़े-बड़े
टेक घुटने दे रहे हैं

बड़ा भारी हो महल कोई
या घर हो कोई छोटा-मोटा
चमचाती हो मर्सडीज़
या धूल खाती हो टोयोटा
रुप-रंग के भेद सारे
सफ़ेद चादर में दबने दे रहे हैं

रंग रहित थे सारे पेड़
और निर्वस्त्र सी थी सारी डालियाँ
हीरे-मोती की उन पर
अब चमकती हैं झूमर-बालियाँ
फ़्री-फ़ोकट में दुनिया को ये
सुंदर-सुंदर गहने दे रहे हैं

ये आए हैं कहाँ से
और कहाँ इन्हें जाना है
भली-भाँति तरह से
भला किस ने जाना है
बन गया है कोई दार्शनिक
तो किसी को वैज्ञानिक बनने दे रहे हैं

सिएटल,
22 दिसम्बर 2008
=============
मर्म = http://mere--words.blogspot.com/2008/11/blog-post_23.html
मर्सडीज़ = Mercedes
टोयोटा = Toyota

Tuesday, December 16, 2008

जूता पड़ा रे बुश जी पे ईराक में

जूता पड़ा रे
हाँ
जूता पड़ा रे बुश जी पे ईराक में
जूता पड़ा, जूता पड़ा, जूता पड़ा
हाँ हाँ हाँ
जूता पड़ा रे ...

सदियों से ये घुसते आए
हर देस में बारी-बारी
बोले सबको ये बता के
हम है जनतंत्र के पुजारी
सब बोले जा जा जा बाबा
जा बख्श दे जान हमारी
लाख मनाया फिर भी
मुए ने कौम कई दे मारी
हाय! कौम कई दे मारी

फिर क्या हुआ?
फिर? जुता पड़ा है अभी तक तेल की फ़िराक में
जूता पड़ा रे बुश जी पे ईराक में
जूता पड़ा रे ...

खेलते-खाते जीते थे
प्रेम से अमरीकी बच्चे-बच्ची
ना चिंता थी ना फ़िकर थी
करते थे अपने मन की
इस जालिम को चैन न आया
कर लिया सेना में भरती
एक के बाद एक हज़ारों खप गए
लुट गई बस्ती बस्ती
हाय! लुट गई बस्ती बस्ती

फिर क्या हुआ?
फिर? मसीहा ढूंढा है इन लोगो ने बराक में
जूता पड़ा रे बुश जी पे ईराक में
जूता पड़ा रे ...

एक समय था जब होती थी
जग में डॉलर की पूजा
हर कोई इसका ग्राहक था
हर कोई करता था इससे सौदा
देस-विदेस से अमरीका आते थे
छात्र पाने उच्च शिक्षा
इसकी शक्ति, इसके कौशल का
मानता था हर कोई लोहा
हाँ मानता था हर कोई लोहा

फिर क्या हुआ?
फिर? मिला के रख दी है इज़्ज़त इसने खाक में
जूता पड़ा रे बुश जी पे ईराक में
जूता पड़ा रे ...

सिएटल,
16 दिसम्बर 2008
(राजा मेहदी अली खान से क्षमायाचना सहित)
============
जूता = shoe
जुता = to be yoked, to be engaged in work
ईराक = Iraq
बराक = Barack Obama
डॉलर = Dollar

Friday, December 12, 2008

बेल-आउट

सांड है छुट्टी पर
और भालू का बाज़ार है
जब चिड़िया चुग गई खेत
कर रहे बेल-आउट का इंतज़ार है

धनाड्यों की दुनिया में
छाया अंधकार है
दिन में तारें दिखते हैं
हुआ बंटाधार है

अच्छे खासे सेठों का
ठप्प हुआ व्यापार है
स्टॉक्स के जुआरी लोग
कर रहे हाहाकार है

माना कि सारे जीव-जंतुओं में
मनुष्य सबसे होशियार है
आंधी आए, तूफ़ां आए
लड़ने को रहता तैयार है

सर्दी-गर्मी से निपटने को
किए हज़ारों अविष्कार हैं
पाँव मिले थे चलने को
पंख किए इख्तियार है

छोटी-बड़ी सारी समस्याओं से
पा लेता निस्तार है
सुनामी से भी बचने का
खोज रहा उपचार है

लेकिन फ़ितरत ही कुछ ऐसी है
कुछ ऐसा इसका व्यवहार है
कि अपने ही हाथों मिटने को
हो जाता लाचार है

त्रेता युग हो या द्वापर युग हो
या कोई सरकार हो
मानव ने ही मानव का
सदा किया संहार है

राम-राज्य से डाओ-जोन्स तक
सब बातों का यही सार है
आदमी संतुष्ट रहने से
सदा करता रहा इंकार है

सिएटल,
12 दिसम्बर 2008
=============
सांड = bull
भालू = bear
बेल-आउट = bail-out
स्टॉक्स = stocks
सुनामी =tsunami
डाओ-जोन्स = Dow-Jones Index

Monday, December 8, 2008

उस रात भी अमावस थी

उस रात भी अमावस थी
जब हमने कागज़ी रावण जलाए थे
और बच्चों को बड़े गर्व से बतलाया था
कि देखो ऐसे होती है बुराई पर अच्छाई की जीत

उस रात भी अमावस थी
जब ईंट-गारे की ईमारत जली थी
और हमने कागज़ी बाण चलाए थे
सम्पादक को पत्र लिख कर
कविता लिख कर
लेख लिख कर
परिजनों के साथ फोन पर
दिल की भड़ास निकाल कर

और अब?
क्रिसमस की छुट्टियाँ है
स्कूल भी बंद है
और बच्चों ने कई दिनों से
प्लान बना रखा है
मेक्सिको जाने का
टिकट पहले ही लिए जा चुके हैं
और यहीं तो साल में एक मौका होता है
सबके साथ घूम-फिर आने का

मारीच तो आते रहेंगे
कभी स्वर्ण हिरण बन कर
तो कभी नाव में बैठ कर

अंगरक्षक
जनता को
एक काल्पनिक रेखा के भरोसे
छोड़ कर
रक्षा करते रहेंगे
कभी महाराजाधिराज राम की
तो कभी महामहिम मुख्यमंत्री की

जनता के लुट जाने पर
वे आर्तनाद करेंगे
इधर-उधर
पशु-पक्षियों से
पेड़-पौधों से
पूछ-पूछ कर
समय बर्बाद करेंगे
किसी दूसरे देश से
मदद की मांग करेंगे

मिथकीय शत्रु के
मिट जाने पर भी
वे जनता को
परेशान करेंगे
कभी अग्निपरीक्षा लेंगे
तो कभी सत्ता के लोभ में
जंगल में रोता-बिलखता छोड़ देंगे

सिएटल,
8 दिसम्बर 2008

Saturday, December 6, 2008

लगता नहीं है दिल मेरा

लगता नहीं है दिल मेरा
आज के हिन्दुस्तान में
किसमें है हौसला
जो ठहरे जंग के मैदान में

कह दो नौजवानों से
कहीं और जा बसें
बचा ही क्या है भला
इस जलते श्मशान में

बमुश्किल बचा पाए थे
हम फ़कत चार उसूल
दो बेरोज़गारी में खर्च हो गए
दो दंगा-ए-हिंदू-मुसलमान में

कहने को है लोकतंत्र मगर
लोकतंत्र का स्वाँग है
जनता और नेता दोनो ही
बोलते नहीं एक जबान है

है कितना बदनसीब
ये भारत देश 'राहुल'
कि दुश्मन भी मिले
तो मिले अपनी ही संतान में

सिएटल,
6 दिसम्बर 2008
(ज़फ़र से क्षमायाचना सहित)

हिसाब-किताब

कुछ दिन पहले मेरा जन्मदिन था
तुमने शुभकामनाएँ भेजी थी
आज लगता है
वे बेमानी थी

आज तुम्हारा जन्मदिन है
और मैं तुम्हें 'विश' नहीं कर सकता
क्यूँकि हमारी दोस्ती में विष भर गया है

मैं फिर भी तुम्हें शुभकामनाएँ भेज रहा हूँ
क्योंकि मुझे हिसाब-किताब बराबर रखने की आदत है

देखो तुम भड़कना नहीं
इस आग को सम्हाल कर रखना
शाम को केक पर मोमबत्ती जलाने में
काम आएगी

और हाँ
तुमने मुझसे
नयी सड़क से
एक कविता की किताब लाने को कहा था
वो मैं ले आया हूँ
लगता है तुम्हें उसकी कोई खास ज़रुरत नहीं है
प्यार, वफ़ा, वादे, शिकवा-शिकायत, रुसवाई, विश्वासघात
यहीं सब कुछ तो है उसमें
और उन सबसे तुम अच्छी तरह वाकिफ़ हो

तुमने उस पर हुए खर्च के भुगतान की भी बात की थी
तो सुनो
किताब के 180
मेट्रो के 11
रिक्शा के 30
कुल मिला कर 221
और झगड़ा हो जाने पर भी
उसे फ़ाड़ कर न फ़ेंक देने की फ़ीस?
उसका अब तुम ही अंदाज़ा लगाओ

अगली बार
किसी से नाता तोड़ो
तो हिसाब-किताब पूरा कर के तोड़ना

सिएटल,
6 दिसम्बर 2008

Friday, December 5, 2008

मुझे एक बटन चाहिए

माउस की कुछ क्लिक्स हुई
और उसका नाम-ओ-निशान मिट गया
कांटेक्ट्स से निकाला
तो मैसेंजर से भी हट गया
मोबाईल के भी कुछ बटन दबाए
और उसका वजूद
हमेशा-हमेशा के लिए
मिट गया

जो चिट्ठियाँ हमने
एक दूसरे को लिखी थी
पलक झपकते ही
बिट्स और बाईट्स की
दुनिया में खो गई

कितना आसान है
कितनी सुविधा है
मशीन की दुनिया में
बस थोड़ा सा परिश्रम
और
पल में सब कुछ
हवा हो जाता है

कहते हैं कि
शरीर भी
शरीर नहीं
एक मशीन है

छोटा या बड़ा
चाहे कैसा भी निवाला लो
पेट में जाते ही
हो जाता महीन है

खट्टा या मीठा
चाहे जो भी खाओ
हलक से नीचे उतरते ही
हो जाता स्वादहीन है

जो भी ये पाता है
उसे आत्मसात कर लेता है
उनसे
खून
पसीना
गीजड़
बाल
नाखून
सब बना लेता है

कहते हैं कि
शरीर शरीर नहीं
एक मशीन है
और
आउटसोर्स के ज़माने में
इसका उत्पादन भी
सबसे ज्यादा
कर रहा चीन है

काश
इसमें भी
एक बटन होता
कि
जब जिसे चाहा
उससे मोहब्बत कर ली
जब जिसे चाहा
उससे नफ़रत कर ली
जब जिसे चाहा
उसे भुला दिया

सिएटल,
5 दिसम्बर 2008
==================
माउस = mouse
क्लिक्स = clicks
कांटेक्ट्स = contacts
मैसेंजर = instant messenger (chat)
मोबाईल = mobile, cell phone
बिट्स = bits
बाईट्स = bytes
आउटसोर्स = outsource

Monday, December 1, 2008

मंज़र हिंदुस्तान के

आओ यू-ट्यूब पर तुम्हें दिखाऊँ
विडियो हिंदुस्तान की
इस क्लिप पर क्लिक करो
ये क्लिप है जलते मकान की
वन डे यहाँ पर बम
वन डे वहाँ पचास खतम

ये रहा वो ताज होटल
जहाँ रईस मनाते थे रंगरेलियाँ
यहाँ चली थी बंदूके दनदन
यहाँ चली थी गोलियाँ
शिवसेना-निर्माण सेना के महारथी
सो रहे थे खा के नींद की गोलियाँ
'आमची मुम्बई, आमची मुम्बई' की
जो लगाते थे बोलियाँ
होश ठिकाने आ गए उनके
जो डींगे हाँकते थे बलिदान की
इस क्लिप पर क्लिक करो
ये क्लिप है भाषण देते हैवान की

ये रहा स्कूल जहाँ पर
बच्चे पाते हैं डिग्रियाँ
डिग्रियाँ तो मिलती हैं लेकिन
नहीं मिलती हैं नौकरियाँ
पढ़ा-लिखा देख के इनको
माँ-बाप ब्याह देते हैं बेटियाँ
कमा-धमा जब पाते नहीं हैं
तो निकालने लगते हैं रैलियाँ
कोई करे कलकत्ता बंद
तो कोई उखाड़े पटरियाँ राजस्थान की
इस क्लिप पर क्लिक करो
ये क्लिप है लुटती दुकान की

ये रहा संसद भवन
जहाँ लोग बैठे पहन के चूड़ियाँ
आए दिन सांसद बिकते हैं
जैसे बिकती हैं भेड़-बकरियाँ
रोज विभाजन होते हैं
रोज बनती नई-नई टोलियाँ
कोई करे चारा घोटाला
कोई दबाए सीमेंट की बोरियाँ
धीरे-धीरे ऐसी-की-तैसी
इन्होंने कर दी भारत महान की
इस क्लिप पर क्लिक करो
ये क्लिप है उजड़ते उद्यान की

जब भी आतंकवादी हाथ में आया
जात-देश उसकी पूछते हैं
'गर अपने ही देश का निकले
तो बगले झांकने लगते हैं
'गर निकले वो पड़ोसी देश का
तो अनाप-शनाप उन्हें फिर बकते हैं
और वो हो गुजरात-बंगाल-आंध्र का
तो उन्हें कुछ नहीं कहते हैं
कब तक हम निकालते रहेंगे
गलतियाँ श्री लंका-पाकिस्तान की
इस क्लिप पर क्लिक करो
ये क्लिप है ख़ुद के ही संतान की

ये रहा इस देश का कैलेंडर
जो बात-बात पर करता है छुट्टी
ये रहे आरक्षण के आँकड़े
जो जात-पाँत की उलझाते गुत्थी
ये रहे इस देश के युवा
जो क्रोध में भींच रहे अपनी मुट्ठी
ये रही विसा लेती प्रतिभाएँ
जो देश से कर रही हमेशा की कुट्टी
कौन भला बचेगा पीछे
जो सोचेगा भारत के उत्थान की
इस क्लिप पर क्लिक करो
ये क्लिप है खोते स्वाभिमान की

जितने मुँह हैं, उतनी बाते
हर कोई देता है प्रवचन
धरम-करम भी अलग-थलग है
भाषाएँ भी हैं पूरी दर्जन
फूट डालने की सबको छूट है
किसी पर नहीं है कोई बंधन
कहीं करे कोई अल्लाह-ओ-अकबर
तो कहीं पुकारे कोई अलख-निरंजन
चीख-चिल्लाहट के इस माहौल से
उम्मीद नहीं है शांतिपूर्वक समाधान की
इस क्लिप पर क्लिक करो
ये क्लिप है ज़हर में डूबे तीर्थस्थान की

सिएटल,
1 दिसम्बर 2008
(प्रदीप से क्षमायाचना सहित)
=============
यू-ट्यूब = YouTube
विडियो = video
क्लिप = clip
क्लिक = click
वन डे = one day
रैलियाँ = rallies
कैलेंडर = calendar
विसा = visa, a permit to live and work in another country

Wednesday, November 26, 2008

क़हर

पहले भी बरसा था क़हर
अस्त-व्यस्त था सारा शहर
आज फ़िर बरसा है क़हर
अस्त-व्यस्त है सारा शहर

बदला किसी से लेने से
सज़ा किसी को देने से
मतलब नहीं निकलेगा
पत्थर नहीं पिघलेगा
जब तक है इधर और उधर
मेरा ज़हर तेरा ज़हर

बुरा है कौन, भला है कौन
सच की राह पर चला है कौन
मुक़म्मल नहीं है कोई भी
महफ़ूज़ नहीं है कोई भी
चाहे लगा हो नगर नगर
पहरा कड़ा आठों पहर

न कोई समझा है न समझेगा
व्यर्थ तर्क वितर्क में उलझेगा
झगड़ा नहीं एक दल का है
मसला नहीं आजकल का है
सदियां गई हैं गुज़र
हुई नहीं अभी तक सहर

नज़र जाती है जिधर
आँख जाती है सिहर
जो जितना ज्यादा शूर है
वो उतना ज्यादा क्रूर है
ताज है जिनके सर पर
ढाते हैं वो भी क़हर

आशा की किरण तब फूटेंगी
सदियों की नींद तब टूटेंगी
ताज़ा हवा फिर आएगी
दीवारे जब गिर जाएंगी
होगा जब घर एक घर
न तेरा घर न मेरा घर

Sunday, November 23, 2008

मर्म बर्फ़ का

--- एक ---
गिरि पर गिरी
धीरे से गिरी
धरा पर गिरी
धीरे से गिरी

न गरजी
न बरसी
नि:शब्द सी
बस गिरती रही

रुई से हल्की
रत्न सी उज्जवल
वादों से नाज़ुक
पंख सी कोमल
बन गई पत्थर
जो कल तक थी कोपल

ज़मीं और आसमां में
यहीं है अंतर
देवता भी यहाँ आ कर
बन जाता है पत्थर

--- दो ---
विचरती थी हवा में
बंधन से मुक्त
धरा पर गिरी
तो हो जाऊँगी लुप्त

यही सोच कर
गई थी सखियों के पास
कि मिल-जुल के
हम कुछ करेंगे खास

लेकिन कुदरत के आगे
न चली एक हमारी
देखते ही देखते
पाँव हो गए भारी

जा-जा के छाँव में
मैं छुपती रही
आ-आ के धूप
मुझे चूमती रही

जब बोटी-बोटी पिघली
तब बेटी थी निकली

सोचा था उसे
तन से लगा कर रहूँगी
जो दु:ख मैंने झेले
उनसे उसे बचा कर रहूँगी

मैं थी चट्टान सी दृढ़
और वो थी चंचल कँवारी
एक के बाद एक
छोड़ के चल दी बेटियाँ सारी

मैं जमती-पिघलती
झरनों में सुबकती रही
कभी क्रोध में आ कर
कुंड में उबलती रही

माँ हूँ मैं
और जननी वो कहलाए
कष्ट मैंने सहे
और पापनाशिनी वो कहलाए

ज़मीं और आसमां में
यही है अंतर
यहाँ रिसते हैं रिश्ते
वहाँ थी आज़ाद सिकंदर

--- तीन ---
ज़मीं और आसमां में
यही है अंतर
परिवर्तन का सदा
धरती जपती है मंतर

आसमां है
जैसे का तैसा ही कायम
धरती ही रुप
बदलती निरंतर

जो भी यहाँ
आया है अब तक
लौट के गया
कुछ और ही बन कर

चाँद भी जब से
इसके चपेटे में आया
ख़ुद को बिचारे ने
घटता-बढ़ता ही पाया

सिएटल,
22 नवम्बर 2008

Friday, November 7, 2008

ओबामा की जीत

हर्ष-उल्लास है क्यूँ इतना,
ओबामा जो है जीता?
भला कांच का इक टुकड़ा,
क्यूँ लगता है हीरा?

हर कोई मनाए खुशियाँ
हर कोई लगा झूमने
इक वोट दे कर जैसे
सब पा लिया उसने
जैसे लॉटरी हो कोई निकली
या घोड़ा हो कोई जीता

नेताओ की महफ़िल में
वादों के करिश्मे हैं
तुम्हे सब्ज़ लगे दुनिया
पहनाते वो चश्मे हैं
दिखने में लगे सुंदर
पर पकवान है फीका

चैंन से रहता है
चैंन से है सोता
दुनिया चाहे डूबे
चाहे लगाए गोता
वक्ता दे देगा भाषण
जब डूबेगा सकीना

कभी गुरु से तोड़े नाता
कभी हिलेरी से हाथ मिलाए
कब किससे हाथ मिलाए
कुछ समझ नहीं आए
न हुआ जो किसी का अब तक
क्या होगा किसी का

पूँजीवाद की दुनिया में
सेठों की ही चलती है
जिसे दे दें ये चंदा
जनता उसे ही चुनती है
जो बोए वही काटे
वही फलता जिसे सींचा

7 नवम्बर 2008
(अकबर इलाहबादी से क्षमायाचना सहित)
=============

Tuesday, November 4, 2008

परिणाम चाहे जो भी हो

डेमोक्रेट्स जीते या रिपब्लिकन्स जीते, हमे क्या
ये मुल्क नहीं मिल्कियत हमारी
हम इन्हें समझे हम इन्हें जाने
ये नहीं अहमियत हमारी

तलाश-ए-दौलत आए थे हम
आजमाने किस्मत आए थे हम
आते हैं खयाल हर एक दिन
जाएंगे अपने घर एक दिन
डेमोक्रेट्स जीते या रिपब्लिकन्स जीते
बदलेगी नहीं नीयत हमारी
हम इन्हें समझे ...

ना तो है हम डेमोक्रेट
और नहीं है हम रिपब्लिकन
बन भी गये अगर सिटीज़न
बन न पाएंगे अमेरिकन
डेमोक्रेट्स जीते या रिपब्लिकन्स जीते
छुपेगी नहीं असलियत हमारी
हम इन्हें समझे ...

न डेमोक्रेट्स का प्लान
न रिपब्लिकन्स का वाँर
कर सकता है
हमारा उद्धार
डेमोक्रेट्स जीते या रिपब्लिकन्स जीते
पूछेगा नहीं कोइ खैरियत हमारी
हम इन्हें समझे ...

हम जो भी हैं
अपने श्रम से हैं
हम जहाँ भी हैं
अपने दम से हैं
डेमोक्रेट्स जीते या रिपब्लिकन्स जीते
काम आयेगी बस काबिलियत हमारी
हम इन्हें समझे ...

फूल तो है पर वो खुशबू नहीं
फल तो है पर वो स्वाद नहीं
हर तरह की आज़ादी है
फिर भी हम आबाद नहीं
डेमोक्रेट्स जीते या रिपब्लिकन्स जीते
यहाँ लगेगी नहीं तबियत हमारी
हम इन्हें समझे ...

Monday, November 3, 2008

ये भी कोई चुनाव है?

अमरीकी वोटर की शामत आई है
एक तरफ़ कुआँ एक तरफ़ खाई है
किसे वोट दे किसे न दे
सोच सोच हालत पतली हो आई है

48 पुराने राज्यों के होते हुए
दो नए-नवेले राज्यों ने धूम मचाई है
एक तरफ़ अलास्का एक तरफ़ हवाई है
मैनलेंड के निवासियों पर जम कर चपत लगाई है

पहले साल भर चला वो नाटक था
जिसमें एक नारी थी एक वाचक था
चुनना दोनों में से सिर्फ़ एक था
जबकि इरादा किसी का न नेक था

धरा पे धरा ये संसार है
नारी से करता ये प्यार है
दिल करता उस पे निसार है
नित देता उसे उपहार है

लेकिन अहंकार के आगे मजबूर है
नारी रानी बने नहीं मंजूर है
हिलैरी का दिल इसने तोड़ दिया
हवाईअन से नाता जोड़ लिया

चलो डेमोक्रेट्स ने किया तो कोई ग़म नहीं
लेकिन रिपब्लिकन्स भी निकले कम नहीं
गधे तो गधे ही होते हैं
लेकिन हाथी तो साथी होते हैं
जब जनता नारी नकार चुकी थी
खा-पी के सब डकार चुकी थी
जनता को फिर झकझोड़ दिया
ओल्ड बॉयज़ क्लब का भ्रम तोड़ दिया
ओबामा के सामने बम फोड़ दिया
चुनाव का रुख मोड़ दिया

रानी नहीं तो पटरानी ले लो
बूढ़े के साथ जवानी ले लो
'गर मैं गुड़क गया तो
पेलिन राज करेंगी
5 बच्चों का खयाल रखती है
आप का भी ये खयाल रखेंगी

लेकिन मैं हूँ एक एन-आर-आई
पक्का घाघ और अवसरवादी
इनके झांसे में नहीं आनेवाला
लाख सफाई चाहे दे दें
मुझे तो नज़र आए दाल में काला

सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं
क्या अलास्का और क्या हवाई है?
एक बर्फ़ तो एक समंदर है
इनके बीच क्या हो सकती लड़ाई है?
हिम से ही सागर निकले
सागर से ही हिम बरसे
जल के ही दोनों रूप है
जल बिन हर कोई तरसे

हम तो अपने मस्त रहेंगे
वोट इनमें से एक को न देंगे
न इस चुनाव में
न किसी चुनाव में
न भाग लिया है
न भाग लेंगे
कल को अगर कोई मुसीबत आए
हम तो फ़्लाईट पकड़ कर भाग लेंगे

3 नवम्बर 2008

Friday, October 24, 2008

भारत - एक विडम्बना महान

आसमान में यान
पटरी पे नुकसान
भारत है यारो
एक विडम्बना महान

न पीने को पानी
न खाने को धान
महाशक्ति बनने का
रखता गुमान

अमिताभ हैं प्राण
शाह रुख हैं जान
गली-गली में दुश्मन
हिन्दू-मुसलमान

बिन्द्रा हैं शान
ठाकरे हैवान
दोनों का जनता
करती सम्मान

सीमा पे खेलता
जो जान पे जवान
मरणोपरान्त उसका
गाती गुणगान

और देश जो त्यागे
वो कहलाए महान
सर पे बिठाए
और उसे माने विद्वान

लुटते हैं शिक्षक
लुटते संस्थान
इस देश का कौन
करेगा उत्थान?

मजहब है बिकता
मन्दिर है दुकान
ईश्वर को छोड़
पंडित पूजे जजमान

गाँव से शहर की ओर
सबका रूझान
बिगड़ते हैं घर
उजड़ते हैं खलिहान

बढ़ती है भीड़
खोता है इंसान
फ़ैलते हैं शहर
सिकुड़ते हैं उद्यान

और योगी महोदय?
लेकर थोड़ा सा ज्ञान
कहते हैं नाक आपकी
एक जादू की खान

बस हवा निकली
और हुआ दर्द अन्तर्धान
मिनटों में कर लो
हर रोग का निदान

लगाते है शिविर
जहाँ होता है ध्यान
बढ़ती बेरोज़गारी की ओर
न देते हैं ध्यान

इस देश का देखो
कैसा संविधान
जो देते हैं वोट
नहीं जानते विधान

हर पांच साल
बस एक ही तान
लोकतन्त्र ने थमा दी
लुटेरों को कमान

असहयोग और अनशन से
जो जन्मी थी सन्तान
60 बरस की है
पर है अब भी वो नादान

कोइ भी समस्या
करनी हो निदान
असहयोग अनशन ही
इसे सूझे समाधान

दिल्ली,
24 अक्टूबर 2008
+91-98682-06383

Friday, October 17, 2008

करवा चौथ

भोली बहू से कहती हैं सास

तुम से बंधी है बेटे की सांस

व्रत करो सुबह से शाम तक

पानी का भी न लो नाम तक

जो नहीं हैं इससे सहमत

कहती हैं और इसे सह मत

करवा चौथ का जो गुणगान करें

कुछ इसकी महिमा तो बखान करें

कुछ हमारे सवालात हैं

उनका तो समाधान करें

डाँक्टर कहे

डाँयटिशियन कहे

तरह तरह के सलाहकार कहे

स्वस्थ जीवन के लिए

तंदरुस्त तन के लिए

पानी पियो , पानी पियो

रोज दस ग्लास पानी पियो

ये कैसा अत्याचार है ?

पानी पीने से इंकार है!

किया जो अगर जल ग्रहण

लग जाएगा पति को ग्रहण ?

पानी अगर जो पी लिया

पति को होगा पीलिया ?

गलती से अगर पानी पिया

खतरे से घिर जाएंगा पिया ?

गले के नीचे उतर गया जो जल

पति का कारोबार जाएंगा जल ?

ये वक्त नया

ज़माना नया

वो ज़माना गुज़र गया

जब हम-तुम अनजान थे

और चाँद-सूरज भगवान थे

ये व्यर्थ के चौंचले

हैं रुढ़ियों के घोंसले

एक दिन ढह जाएंगे

वक्त के साथ बह जाएंगे

सिंदूर-मंगलसूत्र के साथ

ये भी कहीं खो जाएंगे

आधी समस्या तब हल हुई

जब पर्दा प्रथा खत्म हुई

अब प्रथाओ से पर्दा उठाएंगे

मिलकर हम आवाज उठाएंगे

करवा चौथ का जो गुणगान करें

कुछ इसकी महिमा तो बखान करें

कुछ हमारे सवालात हैं

उनका तो समाधान करें

Thursday, October 9, 2008

रात और दिन पाँव पड़ूँ

रात और दिन पाँव पड़ूँ
मेरी सजनी फिर भी नैन चुराए
जाने कहाँ मंत्र है वो
मैं जो पढ़ूँ और वो मुस्काए

जप-तप फूल-शूल कछु काम न आए
मन में शक़ जब घर कर जाए
शूल चुभे तो निकल भी जाए
शक़ बस फूलता-फलता ही जाए

मुझे नहीं कहे मेरी गलती है क्या
फिर भी मुझको रोज सताए
ऐसा सलूक जो कोई करे
जग में जुल्मी वो कहलाए

एक बार मेरी अरज सुनो
एक बार मुझसे बात तो करो
इतना रहम तो करो ओ सनम
कि तेरा लिखा ख़त आज मुझे मिल जाए

दुनिया में यूँ तो दोस्त मिलते नहीं
मिलते हैं तो यूँ बिछड़ते नहीं
हम दोनो मिले पर मिल न सके
जाने किस किस की लगी हमें हाए

पढ़-पढ़ थक गया वेद-वेदान्त
कोई न मिला जो करे मन को शांत
और कोई क्यूँ करे उपचार
घर का ही भेदी जब लंका ढाए

सिएटल,
9 अक्टूबर 2008
(शैलेन्द्र से क्षमायाचना सहित)

Sunday, October 5, 2008

मेरे भोले-भाले दिल के टुकड़े

मेरे भोले-भाले दिल के टुकड़े
कर दिए उसने कुतर के
लिखूँ मैं कविता
ताकि आप सम्हलें

और रहे उससे बच के

शादीशुदा थी
न शर्म-हया थी
फिर भी समझ न पाया
मुझे क्या हुआ था
इक बेवफ़ा पे
हाए मुझे क्यूँ प्यार आया
कर के बेवफ़ाई
हँसे वो सितमगर
तड़पूँ मैं आहें भर भर के

भाग्य विधाता
क्यूँ है सताता
मन मेरा पूछता हाए
जितना मैं जोड़ूँ
उतना ही टूटे
मन मेरा डूबता जाए
मेरी दुर्दशा की
वजह वो बताए
कर्म हैं पिछले जनम के

मीठा-मीठा बोले
इत-उत डौले
पल पल मुझको लुभाए
मैं सीधा-सादा
फ़ंस गया बेचारा
जाल ही ऐसे फ़ैलाए
सुन न सकोगे
करतूतें सारी
कहने लगूँ जो उन्हें गिन-गिन के

सिएटल,
5 अक्टूबर 2008
(मजरुह से क्षमायाचना सहित)

Friday, October 3, 2008

मुर्गी का कभी न पेट खोलो

छोड़-छाड़ के सारे काम
जप रहा था मैं नाम घनश्याम
तभी कामदेव ने मार कर बाण
कर दिया मेरा काम तमाम

प्रकट हुई एक सुंदर सी सूरत
मानो अजंता की मनोहारी मूरत
मधुर-मधुर वो गीत सुनाए
भाव-भंगिमा से मुझे भरमाए
मटक-मटक कर इत-उत डोले
मन में भड़काए प्यार के शोले

बड़े-बूढ़ों ने एक बात कही थी
सीधी सच्ची बात कही थी
कि चाहे जितने तुम अंडे ले लो
पर मुर्गी का कभी न पेट खोलो
कि जो कुआँ तुम्हारी प्यास बुझाए
झांक के न कभी उसके अंदर देखो

लेकिन मुझमें इतना होश कहाँ था
सोच-सोच कर मेरा हाल बुरा था
कि जो ओढ़-आढ़ कर है इतनी सुंदर
अनावृत्त हो तो लगेगी और भी सुंदर
यही सोच कर मैंने हाथ बढ़ाया
धीरे से उसका पल्लू हटाया

मेरी किस्मत भी देखो कैसी फूटी
कि ऐन मौके पर नींद थी टूटी
किरणें ओढ़े खड़ी रही शाम
मैं पड़ा रहा दिल को थाम

सिएटल,
3 अक्टूबर 2008

Tuesday, September 23, 2008

कभी तो लिखो ख़त मुझे

कभी तो लिखो ख़त मुझे
कि मैं अभी मरा नहीं

अभी तो हुई लड़ाई है
बात कहाँ हो पाई है
दो चार लाईन लिख तो दो
बुरा भला कह तो दो
भड़ास दिल की निकाल लो
जी भर के मुझको कोस लो
नहीं तो कहोगी तुम सदा
कि मैंने कुछ कहा नहीं
नहीं नहीं नहीं नहीं
कभी तो लिखो ख़त मुझे
कि मैं अभी मरा नहीं

आँखें डबडबा रही
चाल डगमगा रही
ये दिल तुम्हें है सोचता
हर जगह है खोजता
जो तुम न मिल सकी अगर
तो कैसे कटेगी उमर
लाख मनाऊँ दिल को मैं
मगर दिल सम्हलता नहीं
नहीं नहीं नहीं नहीं
कभी तो लिखो ख़त मुझे
कि मैं अभी मरा नहीं

अधूरी बात छोड़ कर
मुझसे मुख मोड़ कर
जब से तुम रूठ गए
ख़्वाब सारे टूट गए
न जाने कैसे दिन ढले
कब और कैसे सांस चले
मैं सुध-बुध खो चुका
मुझे तो कुछ पता नहीं
नहीं नहीं नहीं नहीं
कभी तो लिखो ख़त मुझे
कि मैं अभी मरा नहीं

सिएटल,
23 सितम्बर 2008
(साहिर से क्षमायाचना सहित)

Monday, September 22, 2008

हज़ार खंजर

मेरा महबूब भी
कितनी बड़ी तोप है
आँखें चार किए हुए
हुए नहीं चार दिन
और हज़ारों खंजर का
थोप देता आरोप है

काश
ये मैं पहले जान लेता
कि जो दे देता है दिल
वही फिर ले लेता है जान
जब बरसता
उसका प्रकोप है

पहले
वो जब खुश था
तो रेन-फ़ारेस्ट की तरह सब्ज़ था
आजकल
गुस्सा है
तो ठंडा-ठंडा युरोप हैं

जल्लाद से भी बढ़कर
अगर कोई है
तो वो मेरा माशूक़ है
बिना अंतिम इच्छा पूछे ही
खींच लेता वो रोप है

सिएटल,
22 सितम्बर 2008
==============
रेन-फ़ारेस्ट = rain forest
सब्ज़ = हरा-भरा
युरोप = Europe
रोप = rope, रस्सी

Sunday, September 21, 2008

मेरा ब्लाग ही पहचान है

फोन नम्बर खो जाएगा
ई-मेल आई-डी बदल जाएगा
मेरा ब्लाग ही पहचान है
'गर याद रहे

वक़्त के सितम
कम हसीं नहीं
आज है याहू
कल कहीं नहीं
गूगल पे चलो
सर्च करो मुझे

हम लिखे यहाँ
दिल की बात को
दिन में कभी
कभी रात को
हो सके अगर
देना टिप्पणी मुझे

कल को अगर
दिल उदास हो
चाहने लगो
कोई पास हो
ब्लाग खोल कर
पढ़ लेना मुझे

सिएटल,
21 सितम्बर 2008
(गुलज़ार से क्षमायाचना सहित)

Friday, September 19, 2008

आज के बाद

तेरे नम्बर को ना रिंग करेंगे सनम, आज के बाद
तुझे ई-मेल भी ना लिखेंगे सनम, आज के बाद

तू मेरा मिलना समझ लेना एक सपना था
तुझको बहाना मिल ही गया जो तुझको ढूंढना था
सच कोई तुमसे कहेगा ना सनम, आज के बाद

बजती जाएगी घंटियां रोज किसी सेल फोन की
फ़िर भी ना सुनूंगा धुन तेरे रिंग-टोन की
कान में रूई हम लगाएंगे सनम, आज के बाद

हमको तुमको साथ अभी तो सदियों चलना था
बीच सफ़र में हाथ यूँ नहीं तुमको छोड़ना था
हम हाथ किसी का ना पकड़ेंगे सनम, आज के बाद

सिएटल,
19 सितम्बर 2008
(सावन कुमार से क्षमायाचना सहित)

Wednesday, September 17, 2008

राष्ट्रीय ज्ञान आयोग

गौड़सन्स टाईम्स के एक लेख में, केंद्रीय हिंदी समिति के सदस्य, राहुल देव लिखते हैं:
"राष्ट्रीय ज्ञान आयोग की सिफ़ारिश है कि अंग्रेज़ी को पहली कक्षा से पढ़ाया जाए और तीसरी से दूसरे विषयों की पढ़ाई का माध्यम बनाया जाए। वह यह भी कहता है कि कक्षा और विद्यालय के बाहर भी अंग्रेज़ी सीखने के लिए प्रेरक, उपयुक्त माहौल बनाया जाए। हर कक्षा में इसके लिए पुस्तकें, मल्टीमीडिया उपकरण रखे जाएं, अंग्रेज़ी क्लब बनाए जाएं। देश के 40 लाख शिक्षकों को अंग्रेज़ी दक्ष बनाने के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए जाएं। छ: लाख नए अंग्रेज़ी शिक्षक तैयार किए जाएं। "

राहुल देव पूछते हैं कि जब "ज्ञान आयोग स्वयं मानता है कि अंग्रेज़ी जो प्रथम भाषा के रुप में प्रयोग करने वाले एक प्रतिशत हैं। बाकी 99 प्रतिशत को अंग्रेज़ी दक्ष बनाने में कितना धन लगेगा? क्या यह संभव है जबकि एक प्रतिशत की भाषा बनने में अंग्रेज़ी को 175 साल लग गए?"

लेकिन साथ ही यह शिकायत भी करते हैं कि -
"सारे समाज में अंग्रेज़ी और भारतीय भाषाओं के बीच शक्ति और प्रतिष्ठा का जो संतुलन है उसे देखते हुए अगर पहली कक्षा से छात्रों को अंग्रेज़ी माध्यम में पढ़ाया गया तो क्या वे अपनी भाषाओं को वैसी ही इज़्ज़त दे पाएंगे? आज ही से शुरु से अंग्रेज़ी माध्यम में पढ़ने जीने वाले बच्चे भारतीय भाषाओं का कैसा प्रयोग करते हैं, कितना महत्व देते हैं, अपनी परंपराओं, विरासत, सांस्कृति जड़ों से कितना जुड़े हैं, यह सबके सामने हैं।"

यह तो ऐसे हुआ कि जैसे चित भी मेरी पट भी मेरी! अगर अंग्रेज़ी 175 साल बाद सिर्फ़ एक प्रतिशत लोगो की प्रथम भाषा बन पाई हो तो फिर अंग्रेज़ी के खिलाफ़ इतना शोर शराबा क्यों?


मैं केंद्रीय विद्यालय का विद्यार्थी रहा हूँ, जहाँ आमतौर पर सारे विषय अंग्रेज़ी में ही पढ़ाए जाते हैं। जो छात्र सामाजिक अध्ययन हिंदी में पढ़ना चाहते हैं, वे हिंदी में पढ़ सकते हैं। लेकिन गणित और विज्ञान अंग्रेज़ी में ही पढ़ाए जाते हैं। इसे आप गरीब सरकारी कर्मचारियों का कान्वेंट स्कूल कह सकते हैं। प्राय: सारे छात्र अंग्रेज़ी में ही सारे विषय पढ़ते थे। साथ में हिंदी भी और संस्कृत भी। एक मैं ही अकेला था जिसने सामाजिक अध्ययन हिंदी में लेना तय किया। क्यों? क्योंकि मैं केंद्रीय विद्यालय में कक्षा आठ में दाखिल हुआ था। मेरी प्राथमिक शिक्षा मध्य प्रदेश के रतलाम जिले में हुई थी। वहाँ, कक्षा छ: तक अंग्रेज़ी का एक अक्षर नहीं पढ़ाया जाता था। इस वजह से मेरी अंग्रेज़ी काफ़ी कमज़ोर थी।

सच तो यह है कि अंग्रेज़ी की बदौलत ही अच्छी नौकरी मिलती है, अच्छा वेतन मिलता है, उपर उठने के अवसर मिलते हैं। आज कम्प्यूटर पर, इंटरनेट पर यूनिकोड के सहारे हिंदी लिखना और पढ़ना आसान है, लेकिन फिर भी बिना अंग्रेज़ी के आप लंगड़ा कर ही चल सकते हैं। प्रोद्योगिकी, चिकित्सा, अभियांत्रिकी, विज्ञान, विधि के क्षेत्र में अंग्रेज़ी का ही बोलबाला है।

आज हर परिवार जो इस काबिल है कि वो अपने बच्चों को अंग्रेज़ी में शिक्षा दिला सके, दिला रहा है। इसका मतलब साफ़ है कि जो गरीब है, जिनके पास साधन नहीं है, उनके बच्चे अंग्रेज़ी शिक्षा के अभाव में और गरीब होते जा रहे हैं; और ये क्रम तब तक चलता रहेगा जब तक कि सरकार हस्तक्षेप न करे और हर जनसाधारण को शिक्षा का समान अवसर न दे। ज्ञान आयोग की सिफ़ारिश के मुताबिक अब हर सरकारी स्कूल केंद्रीय विद्यालय की पद्धति पर चलेगा। ये एक हर्ष का विषय है। केंद्रीय विद्यालय के कई विद्यार्थियों से मेरी मुलाकात होती रहती है और वे सब अपनी संस्कृति से उतने ही जुड़े हैं जितने कि अन्य भारतीय।

राहुल देव का एक सुझाव यह भी है कि
"सारा देश अगर अपनी भाषाओं को छोड़ कर वैश्वीकृत होने, महाशक्ति बनने, आर्थिक प्रगति के एकमात्र माध्यम के रुप में अंग्रेज़ी को अपनाने के लिए तैयार है तो एक जनमत संग्रह करा लिया जाए और अगर बहुमत अंग्रेज़ी के पक्ष में हो तो उसे ही राष्ट्रभाषा, राजभाषा, शिक्षा का प्रथम माध्यम बना दिया जाए।"

अच्छा सुझाव है। एक जनमत कश्मीर में भी हुआ था। आज तक उसको भुगत रहे हैं।

जनमत के बजाय आप स्वयं जाकर देख ले कि अंग्रेज़ी माध्यम वाले स्कूलों के आगे दाखिले के लिए कितनी लम्बी कतार है। सब समझ में आ जाएगा। ये तब जबकि इन स्कूलों की बहुत महंगी फ़ीस होती है।

इससे पहले कि आप ज्ञान आयोग की सिफ़ारिशो का विरोध करें, अंग्रेज़ी हटाओ के नारे लगाए, मेरा एक निवेदन है। पहले आप अंग्रेज़ी भूल कर दिखाए। कोशिश कर के देखें कि आप कितने दिन बिना अंग्रेज़ी के रह सकते हैं। सिर्फ़ बिना बोले ही नहीं - बिना समझे, बिना लिखें, बिना पढ़े, बिना सुने।

सिएटल,
17 सितम्बर 2008

Tuesday, September 16, 2008

आपने कभी एन-आर-आई देखा है?

देखा है एन-आर-आई को कुछ इतना समीप से
धन-सम्पदा है लाख मगर लगते गरीब से

धन से है कितना मोह ज़रा देख लीजिए
तेल बेचने लगे हैं अपने घर के प्रदीप से

सोचा था लौट आएंगे वापस वो एक दिन
अभी तक भटक रहे हैं किसी बदनसीब से

मणि मिले तो चाट ले चमड़ी गोरों की
चाहे पड़े रहे परिजन लाचार निर्जीव से

स्वार्थ और लोभ की ये ज़िन्दा मिसाल हैं
समाज से कटे-कटे रहते हैं द्वीप से

इनकी वफ़ा की लाश को आओ विदा करें
दे कर के पासपोर्ट जो मिला है रकीब से

होता न राहुल एन-आर-आई तो होता क्या भला
एन-आर-आई न टंगे दिखते यूँ इक सलीब से

सिएटल,
16 सितम्बर 2008
(साहिर से क्षमायाचना सहित)
==========================
मिसाल = उदाहरण
रकीब = दुश्मन
सलीब = सूली

Sunday, September 14, 2008

हिंदी दिवस -- 3 पहेलियाँ

हिंदी ही है दुनिया की एकमात्र भाषा
जिसे करोड़ों कहते हैं अपनी मातृभाषा

हिंदी दिवस के उपलक्ष्य पर प्रस्तुत हैं 3 पहेलियाँ। तीनों पहेलियों के उत्तर से 'शुद्ध हिंदी' वालो को आपत्ति हो सकती है। क्योंकि वे शब्द या तो उर्दू के हैं या अंग्रेज़ी के या भोजपुरी के - शुद्ध हिंदी के नहीं। या ये कहूँ कि उनकी जड़ संस्कृत में नहीं है। मैं ये समझता हूँ कि ऐसे शब्दों से हिंदी समृद्ध होती है, नष्ट नहीं। चाहे कितनी ही नदियाँ सागर में मिल जाए, सागर नष्ट नहीं होता, भ्रष्ट नहीं होता, प्रदूषित नहीं होता।

1 -
झूम-झूम के नाचे आज ??? ?? (3, 2)
पढ़े यूनिकोड, नहीं पढ़े ?? ??? (2, 3)

2 -
जब भी कोर्ट में मुझसे ?? ?? करें (2, 2)
कहे कि आप ज़ब्त अपने ???? करें (4, 4)

3 -
और हाँ, ये रही वो ??? (3)
जिन पे खेलता था ?? ?? (2, 2)

उदाहरण:
क -
जब तक देखा नहीं ??? (3)
अपनी खामियाँ नज़र ?? ?(2, 1)

उत्तर:
जब तक देखा नहीं आईना
अपनी खामियाँ नज़र आई ना

ख -
मफ़लर और टोपी में छुपा ?? ?? (2, 2)
जैसे ही गिरी बर्फ़ और आई ??? (3)

उत्तर:
मफ़लर और टोपी में छुपा सर दिया
जैसे ही गिरी बर्फ़ और आई सर्दियाँ

अधिक मदद के लिए अन्य पहेलियाँ यहाँ देखें:
http://mere--words.blogspot.com/search/label/riddles_solved

शुद्ध हिंदी के विषय पर आप मेरा एक लेख और एक कविता यहाँ देख सकते हैं:

शुद्ध हिंदी - एक आईने में - http://mere--words.blogspot.com/2007/12/blog-post_03.html
बदलते ज़माने के बदलते ढंग हैं मेरे - http://mere--words.blogspot.com/2008/06/blog-post_18.html

Saturday, September 13, 2008

क़हर

पहले भी बरसा था क़हर
अस्त-व्यस्त था सारा शहर
आज फ़िर बरसा है क़हर
अस्त-व्यस्त है सारा शहर

बदला किसी से लेने से
सज़ा किसी को देने से
मतलब नहीं निकलेगा
पत्थर नहीं पिघलेगा
जब तक है इधर और उधर
मेरा ज़हर तेरा ज़हर

बुरा है कौन, भला है कौन
सच की राह पर चला है कौन
मुक़म्मल नहीं है कोई भी
महफ़ूज़ नहीं है कोई भी
चाहे लगा हो नगर नगर
पहरा कड़ा आठों पहर

न कोई समझा है न समझेगा
व्यर्थ तर्क वितर्क में उलझेगा
झगड़ा नहीं एक दल का है
मसला नहीं आजकल का है
सदियां गई हैं गुज़र
हुई नहीं अभी तक सहर

नज़र जाती है जिधर
आँख जाती है सिहर
जो जितना ज्यादा शूर है
वो उतना ज्यादा क्रूर है
ताज है जिनके सर पर
ढाते हैं वो भी क़हर

आशा की किरण तब फूटेंगी
सदियों की नींद तब टूटेंगी
ताज़ा हवा फिर आएगी
दीवारे जब गिर जाएंगी
होगा जब घर एक घर
न तेरा घर न मेरा घर

सेन फ़्रांसिस्को
24 सितम्बर 2002
(अक्षरधाम पर हमले के बाद)

Thursday, September 11, 2008

शक़

बातों में बात है
बात एक लाख की
जो करते हैं शक़
नहीं कर सकते हैं आशक़ी

क्या करेंगे वो इश्क़
जिन्हें खाता हो शक़
जिनके मन में हो खोट
कैसे पहुँचेगे वो दिल तक
दिल तो समझे बस बातें जज़बात की

दायें भी देखें
बाएँ भी देखें
हर तरफ़ देख कर
पाँसा जो फ़ेंके
वो जीत भी जाए तो ऐसी जीत किस काम की

शक़ ने इस कदर
जकड़ा उन्हें
कि मैं था प्रेम
लगा प्रेम चोपड़ा उन्हें
ऐसी भी क्या दोस्ती जो दोस्ती हो बस नाम की

न आप हैं शक़्क़ी
न आप हैं शक़्क़ी
हम सब हैं भरोसेमंद
ये बात है पक्की
मैं तो बात कर रहा हूँ इस दुनिया जहान की

सिएटल,
11 सितम्बर 2008
==============
आशक़ी = आशिक़ी, प्रेम

Tuesday, September 9, 2008

जीते जी मरने की सज़ा

जाते जाते यार मुझे क्या दे गया
जीते जी मरने की सज़ा दे गया

रहता था खुश, स्वच्छंद था मैं
कली कली महके, ऐसी सुगंध था मैं
जागूँ सारी-सारी रात ऐसी दवा दे गया

न उससे बात करूँ, न मुलाकात करूँ
ज़र्द और ज़ब्त सब्ज़ जज़बात करूँ
ऐसी-वैसी कसम कई दफ़ा दे गया

कर के गया कुछ ऐसा बर्बाद मुझे
कि सांस भी लूँ तो आए याद मुझे
दिल ले कर बेरहम दमा दे गया

बचने की अब कोई उम्मीद नहीं
रोज़ ही रोज़े होगे, होगी ईद नहीं
प्यास न बुझे ऐसी यातना दे गया

मुक्ति की मेरी कोई तरकीब तो हो
चाहे मार ही डाले, कोई रक़ीब तो हो
यार मेरा जीने की बददुआ दे गया

सिएटल,
9 सितम्बर 2008

Friday, September 5, 2008

जुदाई

यार मेरा मुझसे आज जुदा हो गया
जो भी था पल भर में हवा हो गया

हँसता था वो
हँसाता था वो
बात बात पर गीत
गाता था वो
आज मुझे रोता छोड़ वो दफ़ा हो गया

न मेरी सुनता है वो
न मेरी मानता है वो
कर के ही रहता है
जो भी ठानता है वो
सोचा था क्या और ये क्या हो गया

मुझ पे मरना भी था
दुनिया से डरना भी था
हर कदम उसे
फ़ूंक-फ़ूंक के रखना भी था
कर्तव्य में जल प्यार फ़ना हो गया

सिएटल,
5 सितम्बर 2008
=========================
फ़ना = विनाश

Tuesday, September 2, 2008

तुम मुझे यूँ भुला ना पाओगे

तुम मुझे यूँ भुला ना पाओगे
हाँ तुम मुझे यूँ भुला ना पाओगे
जब कभी भी पढ़ोगे कविता मेरी
सच देख कर तुम बिलबिलाओगे
हाँ तुम मुझे यूँ भुला ना पाओगे
हो तुम मुझे यूँ ...

वो एन-आर-आई वो ईश्वर की बातें
जिनमें कोसे थे रिसते रिश्ते नाते
उन कविताओं की याद आएगी
जब खयालों में मुझको लाओगे
हाँ तुम मुझे यूँ भुला ना पाओगे
हो तुम मुझे यूँ ...

मैं कविता में तुमको लिखता था
जब भी तुमको मनाना होता था
और सहारा लिया था पैरोडी का
वो नगमें किस तरह भुलाओगे
हाँ तुम मुझे यूँ भुला ना पाओगे
हो तुम मुझे यूँ ...

मुझको पढ़े बिना क़रार न था
एक ऐसा भी दौर गुज़रा है
झूठ मानो तो देख लो स्टाटिस्टिक्स
मैं कहूंगा तो रूठ जाओगे
हाँ तुम मुझे यूँ भुला ना पाओगे
हो तुम मुझे यूँ ...

सिएटल,
2 सितम्बर 2008
(हसरत जयपुरी से क्षमायाचना सहित)
=============================
स्टाटिस्टिक्स = statistics

Friday, August 29, 2008

टिप्पणी लिखोगी तो बात समझ में आ जाएगी

टिप्पणी लिखोगी तो बात समझ में आ जाएगी
लोग अनायास तारीफ़ का सबब पूछेंगे
ये भी पूछेंगे कि तुम इतनी मेहरबाँ क्यूँ हो
उंगलियाँ उठेंगी भीगे हुए लफ़्ज़ो की तरफ़
शक की निगाह से देखेंगे एक एक हिज्जो की तरफ़
एक एक शब्द के कई अर्थ निकाले जायेंगे
न जाने किस किस तरह के गुमाँ पाले जाएंगे
लोग ज़ालिम हैं हर इक बात का ताना देंगे
बातों बातों में हमारा रिश्ता भी जोड़ जाएंगे
हो सके तो एनानिमस टिप्पणी भी मत लिखना
वरना आई-पी एड्रेस से समझ जाएंगे
चाहे कुछ भी हो बस ई-मेल ही लिखना मुझको
मेरे बारे में कोई बात न करना उनसे
टिप्पणी लिखोगी तो बात समझ में आ जाएगी

सिएटल,
29 अगस्त 2008
(कफ़ील आज़ेर से क्षमायाचना सहित)
=========================
अनायास = all of a sudden
सबब = cause
हिज्जा = spelling of a word
गुमाँ = imagination, fancy, doubt
एनानिमस = anonymous
आई-पी एड्रेस = IP address
ई-मेल = e-mail

Thursday, August 28, 2008

प्रियतम

कहते कहते प्रियतम
तुम्हें लगने लगा है प्रिय तम
अब अंधेरा ही तुम्हे रास आता है
और वहीं रहती हो तुम हरदम

गाते गाते सरगम
चढ़ने लगा है तुम्हारे सर ग़म
अब उदास और निराश ही
रहती हो तुम हरदम

अरे, ऐसी भी क्या है बेबसी?
तुम तो सुंदर थी एक बेब सी
इस प्यार-वफ़ा के चक्कर में
क्यूँ सिकुड़ गई सड़े सेब सी?

इस से तो अच्छे हैं वो मंकी
जो कर लेते हैं अपने मन की
न करते हैं कोई गिला-शिकवा
न रखते हैं शर्त किसी बंधन की

सिएटल,
28 अगस्त 2008
=======================
तम = अंधेरा
बेब = babe
सेब = सेव
मंकी = monkey

Wednesday, August 27, 2008

अपने एच-वन की उलझन को

अपने एच-वन की उलझन को कैसे मैं सुलझाऊँ
औरों को जो ग्रीनकार्ड मिले हैं कैसे मैं पा जाऊँ

बॉस के वादे हो गए झूठे
सारे सपनें टूटे
घिसघिस के वो काम कराए
चैन मेरा वो लूटे
ऐसे लीचड़-पाजी से मैं कैसे साथ निभाऊँ

मेरा पासपोर्ट वो छुपाए
बाँड मुझसे वो भरवाए
कोई ना जाने इस विलैन को
ये किस तरह सताए
कर ना पाऊँ वकील कोई पल-पल मैं घबराऊँ

आया जब से ऐसा फ़ंसा हूँ
मुझसे सहा ना जाए
लिखना चाहूँ ब्लाग पे अपने
फिर भी लिखा ना जाए
जौंक की तरह मुझसे चिपका कैसे पीछा छुड़ाऊँ

सिएटल,
27 अगस्त 2008
(एम-जी हशमत से क्षमायाचना सहित)
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एच-वन = H1
बॉस = Boss
बाँड = bond
ब्लाग = blog

Monday, August 25, 2008

बहुत घटिया, बड़ी अधपकी सी

बहुत घटिया, बड़ी अधपकी सी
लिखी कविता आपने जो मन को उबाएँ
सब करे वाह वाह, मैं रहूँ चुप-चुप
करूँ क्या ये मेरी समझ में न आए

कहूँ अति सुंदर या कहूँ अच्छी
या कह डालूँ बात सारी सच्ची
ख़ुदा करे कुछ ऐसा
कि आगे आप और कुछ लिख ही न पाए

लिखी तो बहुत है, नहीं एक में भी दम है
कि एकाध तो ऐसी कि जैसे बलगम है
मगर ये पाठक दुआ माँगता है
कि आपकी कलम और दवात छूट जाए

मुझे डर है आपमें ग़ुरूर आ न जाए
लगे झूमने और सुरूर आ न जाए
कहीं आप झूठी तारीफ़ सुनकर
लिखने के साथ साथ गाने न लग जाए

सिएटल,
25 अगस्त 2008
(एस-एच बिहारी से क्षमायाचना सहित)
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बलगम = phlegm

Saturday, August 23, 2008

तेरी खुशबू में बसी ई-मेल्स

तेरी खुशबू में बसी ई-मेल्स मैं डिलिट करता कैसे?
तेरी स्माईली से भरे आय-एम्स मैं डिलिट करता कैसे?

कभी रोमन तो कभी यूनिकोड में जो ख़त तूने लिखें
तूने दुनिया की निगाहों से जो बचाकर लिखे,
कभी घर तो कभी दफ़्तर से जो आय-एम तूने भेजें
कभी दिन में तो कभी रात में उठकर लिखे

जिनका हर लफ़्ज़, हर फ़ाँट मुझे याद था पानी की तरह,
प्यारे थे मुझको एक एक कॉमा, एक एक डॉट,
एक एक एक्रोनिम किसी अनमोल निशानी की तरह

तेरी खुशबू में बसी ई-मेल्स मैं डिलिट करता कैसे?
प्यार मे डूबे हुए आय-एम्स मैं डिलिट करता कैसे?
तेरे हाथों से लिखा 'आप भी ना' मैं डिलिट करता कैसे?

मैं उस कम्प्यूटर पर आज एक वाईरस छोड़ आया हूँ
मैं जो मरता हूँ तो क्या रोग उसे भी लगा आया हूँ

आज के बाद मेरे ब्लाग पर तुम मेरी कविताएँ पढ़ना
मेरी कविताएँ पढ़ कर मेरे हाल का अंदाज़ा करना
और हो सके तो मेरे वास्ते एक टिप्पणी लिखना

सिएटल,
23 अगस्त 2008
(राजेन्द्रनाथ रहबर से क्षमायाचना सहित)
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ई-मेल्स = emails
डिलिट = delete
स्माईली = smiley
आय-एम्स = IM, Instant Messenger
फ़ाँट = font
कॉमा = comma
डॉट = dot (.)
एक्रोनिम = acronym, जैसे कि ए-मि, शे-फि, OMG
कम्प्यूटर = computer
वाईरस = virus
ब्लाग = blog

Friday, August 22, 2008

बच्चे हमारे आज हो गए बड़े

बच्चे हमारे आज हो गए बड़े
पाँव पर अपने देखो ये हैं खड़े

नन्हें-मुन्नों को ले आगे बढ़े
हँसें तो लगे जैसे मोती जड़े

आओ चलो मिलकर दुआ करें
सफ़लता की सीढ़ी ये हरदम चढ़ें
आए मुसीबत, डट कर लड़ें
दिन दूनी रात चौगुनी ख्याति बढ़े
मिले पुरुस्कार, खिताब बड़े
इनके ही चर्चे, इनके ही किस्से
सदा सुनें और सदा पढ़ें

फ़ोर्ट वॉर्डेन

17 अगस्त 2008


[अनूप जी के कहने पर इस कविता और ट्रिप के बारे में थोड़ा खुलासा।

13 अगस्त से 17 अगस्त तक सिएटल की एक संस्था - आई-ए-डबल्यू-डबल्यू - (पश्चिमी वाशिंगटन भारतीय संघ) ने "कैम्प भारत 2008" का आयोजन किया था। स्थान था सिएटल से कुछ दूर, पोर्ट टाउनसेंड स्थित "फ़ोर्ट वार्डेन।" ये कोई किला नहीं है, बल्कि एक परिसर है जहाँ से तोप आदि शस्त्र के साथ सैनिक एक खास मुकाम की किसी आक्रमण से रक्षा करते है। यहाँ सैनिक रहते तो थे, तोपें भी थी, लेकिन यहाँ कभी भी कोई लड़ाई नहीं हुई, क्योंकि कोई आक्रमण भी नहीं हुआ।

अब इस फ़ोर्ट को एक रिज़ोर्ट का रुप दे दिया गया है - जहाँ सैनिको के केबिन को होटल के कमरों में बदल दिया गया है। कई तरह की आधुनिक सुविधाए मौजूद है। एक शानदार भोजनालय है - जहाँ अत्यंत स्वादिष्ट भोजन बनाया जाता है और अति सुरुचिपूर्ण तरीके से परोसा जाता है।

"कैम्प भारत 2008" में 9 वर्ष से 17 वर्ष की आयु तक के कुल 160 बच्चे थे। उनमें से 15-17 वर्षीय बच्चों को वाय-बी और वाय-सी नियुक्त किया गया और इन्होंने ज़िम्मेदारी ली इस कैम्प की रूपरेखा तैयार करने की और उसे चलाने की। कब क्या होगा, कहाँ होगा, कैसे होगा। सब इनके सर पर। मुझ जैसे 16 वयस्क स्वयंसेवक नियुक्त किए गए जो कि ज़रुरत पड़ने पर इन वाय-बी/वाय-सी की मदद कर सके। जैसे कि खेल कूद के दौरान रेफ़्री बन जाए, तम्बू गाड़ दे, कुर्सीयाँ आदि यहाँ से वहाँ रख दे। मुझे काम सौपा गया था - अधिकृत फ़ोटोग्राफ़र का और कबड्डी के रेफ़्री का।

उन पाँच दिनों में मैंने इन वाय-बी/वाय-सी को अपनी ज़िम्मेदारी बखूबी हँसते-हँसाते हुए निभाते देखा। ये पाँच दिन इतने सुखमय बीते कि इसकी तुलना नहीं की जा सकती। बस समझ लीजिए कि जैसे मैं किसी राजकुमार की बरात में गया था।

आते वक्त मेरे मन में एक विचार आया कि 'बच्चे हमारे आज हो गए बड़े।' और जैसा कि आमतौर पर होता है, पहली पंक्ति बनते ही पूरी कविता तैयार हो गई। ]

मेरा दिल अब भी धड़कता है

दिल दिल है कोई शीशा तो नहीं कि चोट लगी और टूट गया
प्यार प्यार है कोई दाग नहीं कि हाथ मला और छूट गया

सपनें सपनें हैं कोई फूल नहीं कि वक़्त ढला और बिखर गए
दोस्त दोस्त हैं कोई स्टेशन तो नहीं कि ट्रेन चली और बिछड़ गए

हम हम हैं कोई किरदार नहीं कि पन्नों में ही दब के रह गए
हम प्रेमी हैं कोई गुनहगार नहीं कि कारावास में ही मर गए

हमें प्यार हुआ और हमने प्यार किया
सिर्फ़ प्यार, प्यार और प्यार किया

माना कि हम शीरीं-फ़रहाद नहीं
पर किया किसी का घर बर्बाद नहीं
सब कुछ किया लेकिन विवाह नहीं
ताकि रिश्ता हो कोई तबाह नहीं

वो पावन ज्योत अब भी जलती है
जिसे मन-मंदिर में तुम जला गए
ये हवाएँ अब भी वो गीत गाती हैं
जिसे जाते वक़्त तुम गुनगुना गए

वो निर्मल नदी अभी भी बहती है
जिसमें प्रेम रस तुम बरसा गए
वो वादी अभी भी महकती है
जहाँ तुम प्रेम की बेल लगा गए

मेरा दिल अब भी धड़कता है
तुम रीत ही कुछ ऐसी चला गए

सिएटल,
22 अगस्त 2008

Tuesday, August 19, 2008

छप्पन छुरी

छल-छल के छलनी किया मछली ने मुझे
उड़-उड़ के लूटा तितली ने मुझे

दिल्ली वाली बिल्ली दिल ले गई
चेन्नई वाली चिड़िया चैन ले गई
कहीं का न छोड़ा किसी गली ने मुझे

पागल दीवाना जब दिल हो गया
उनका इरादा तबदील हो गया
प्यासा लौटाया बदली ने मुझे

चंचल छबीली मुझे टीज़ कर गई
छप्पन छुरी ऐसी टीस भर गई
जैसे धर दिया हो ब्रूस-ली ने मुझे

सिएटल,
19 अगस्त 2008
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छल =to deceive
छलनी = to be full of small holes
तबदील = change
टीज़ = tease
छप्पन छुरी = अपने रुप से पुरुषों पर गहरा वार करने वाली रमणी
टीस =throbbing pain
ब्रूस-ली = Bruce Lee

Monday, August 18, 2008

कुछ तो राब्ता है उनका मुझसे

सूरज निकला
पंछी चहचहाएँ
लेकिन सुबह न हुई
अलार्म बजा
नींद टूटी
लेकिन सुबह न हुई

जो रोज़ सुबह सुबह मुझे जबरन उठाती थी
गा गा के अ-लोरी मेरी नींद भगाती थी
आज
न जाने किस गलतफ़हमी की हैं शिकार
कि बदला बदला सा है उनका व्यवहार

ये जानकर कि
वे पढ़ती हैं अब भी कविताएँ मेरी
मेरे दिल को मिला है चैन-ओ-क़रार
कि चलो कुछ तो राब्ता है उनका मुझसे
मुझसे ना सही
मेरी कविताओं से तो है उनको प्यार

सिएटल,
18 अगस्त 2008
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राब्ता = सम्पर्क, सम्बंध, लगाव, नाता, connection
जबरन = ज़बरदस्ती, against your will
अ-लोरी = लोरी का विपरित

चैन-ओ-क़रार = शांति, comfort

Saturday, August 16, 2008

हुस्न और इश्क़ का असर हो गया

हुस्न और इश्क़ का असर हो गया
आदमी था काम का सिफ़र हो गया

हँस-हँस के लूटा हर बेब ने मुझे
आप को गिला कि मैं बेबहर हो गया

लिखता हूँ लिखता ही रहूँगा सदा
सुन-सुन के गालियाँ निडर हो गया

ख़ुद की कहता हूँ ख़ुदा की नहीं
जो मार के इन्सां अमर हो गया

नन्हा सलोना सा जीवन था मेरा
बढ़ते बढ़ते दीगर हो गया

फ़ोर्ट वॉर्डेन,
16 अगस्त २००८
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सिफ़र = zero, शून्य
गिला = शिकायत
बेब = babe
बेबहर = बिना बहर का, without meter
दीगर = अन्य, another, दूसरा

Friday, August 15, 2008

कातरता

कल रात
समंदर का कतरा कतरा
कतरा कतरा चाँद
कतरता रहा

मैं
जीवन की आपाधापी का
बहाना कर के
कतरा कर निकल गया
खूंटे से बंधे
मवेशियों की कतार में
शामिल हो गया

फ़ोर्ट वॉर्डेन
15 अगस्त 2008

Tuesday, August 12, 2008

खुशहाली की नई मिसाल देखिए

खुशहाली की नई मिसाल देखिए
एन-आर-आई एक जनाब देखिए

जी-हज़ूरी करते हैं औरों की लेकिन
माँ-बाप से करवाते काम देखिए

जिस फ़ौज ने मार डाले पूर्वज इनके
उसी फ़ौज में भरती संतान देखिए

बहुत घमंड है इन्हें दान पे अपने
ख़ुद खोजते सस्ती दुकान देखिए

आत्मा बेच कर धन हैं कमाते
फलता-फूलता ये व्यवसाय देखिए

बैंक बैलेंस देख के इतराते हैं लेकिन
अपना एक भी नहीं पास देखिए

नेताजी माताजी तक तो सही है
ख़ुद पर सहते नहीं कटाक्ष देखिए

जब भी पढ़ते हैं राहुल की रचना
तमतमाता हुआ रुख़सार देखिए

सिएटल,
12 अगस्त 2008

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भरती = enlisted
रुख़सार = गाल

भारत छोड़ो आंदोलन

वतनफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे मन में है
विदेशी नागरिकता का ख़्वाब आज हमारे जन-जन में हैं

डॉक्टर नहीं, इंजीनियर नहीं
वकील नहीं, कलाकार नहीं
ऐसा कोई व्यवसायी नहीं
जो बिकने को तैयार नहीं
बिक गया अमरीका में कोई तो कोई बिक गया लंदन में है

सुबह नहीं, शाम नहीं
दिन नहीं, रात नहीं
ऐसा कोई वक़्त नहीं
जब न होती बात यही
कि सबसे सुखी संतान वही जो पलती विदेशी आंगन में है

हाय करे, हैलो करे
झुक झुक के नमस्कार करे
गौरी चमड़ी, काली कार
देख देख के जयजयकार करे
मृत होते आत्मसम्मान को हम ढक रहे सिक्कों के कफ़न में है

मैं नहीं, आप नहीं
भाई नहीं, बाप नहीं
ऐसा कोई व्यक्ति नहीं
जो करता धन का जाप नहीं
एक एक करके सब के सब खप गए इस ईधन में हैं

पूजा नहीं, पाठ नहीं
किसी का सत्कार नहीं
उंगलियों पे गिन सको
इतने भी संस्कार नहीं
न खुद्दारी है किसी भाई में न मान-मर्यादा किसी बहन में है

गाँव नहीं, शहर नहीं
गली नहीं, बस्ती नहीं
एक भी मुझे मिली नहीं
ऐसी कोई हस्ती कहीं
जो तल्लीन देश के, समाज के, विकास के चिंतन में है

पूरब नहीं, पश्चिम नहीं
उत्तर नहीं, दक्षिण नहीं
ऐसी कोई दिशा नहीं
जहाँ न हो लक्षण यही
कि हर एक शाख पे उल्लू बैठा आज इस उपवन में है

सिएटल,
12 अगस्त 2008

Monday, August 11, 2008

हमारी थोड़ी सी बेवफ़ाई

हज़ार आय-एम हमने भेजे
कहीं से कोई पिंग ना आई
बड़ी वफ़ा से, निभाई तुमने
हमारी थोड़ी सी बेवफ़ाई

जहाँ से तुम बाय कर गये थे
वो विंडो अब भी खुली पड़ी है
हम अपने कम्प्यूटर में जाने कितने
और विंडो खोले हुए हैं
बड़ी वफ़ा से, निभाई तुमने
हमारी थोड़ी सी बेवफ़ाई ...

कहीं किसी रोज़ यूं भी होता
हमारी ई-मेल तुम भी पढ़ती
जो बातें हमने कही न तुमसे
वो बातें तुमने भी सोची होती
बड़ी वफ़ा से, निभाई तुमने
हमारी थोड़ी सी बेवफ़ाई...

तुम्हें है दु:ख कि हम क्यों आए
हमें है फ़ख़्र कि तुम हमारे
है फोन हाथों में अब भी लेकिन
रिंग रिंग बस वो पुकारे
बड़ी वफ़ा से, निभाई तुमने
हमारी थोड़ी सी बेवफ़ाई...

सिएटल,
11 अगस्त 2008
(गुलज़ार से क्षमायाचना सहित)
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आय-एम = IM, instant messenger
पिंग = ping
बाय = bye
विंडो = window
कम्प्यूटर = computer
ई-मेल = email
फ़ख़्र = pride
रिंग = ring