Friday, August 15, 2008

कातरता

कल रात
समंदर का कतरा कतरा
कतरा कतरा चाँद
कतरता रहा

मैं
जीवन की आपाधापी का
बहाना कर के
कतरा कर निकल गया
खूंटे से बंधे
मवेशियों की कतार में
शामिल हो गया

फ़ोर्ट वॉर्डेन
15 अगस्त 2008

इससे जुड़ीं अन्य प्रविष्ठियां भी पढ़ें


4 comments:

Anil Pusadkar said...

..........maveshiton ki kataar me shaamil ho gaya.bahut badhiya ,badhai aapko

मीत said...

वाह ! बहुत खूब.

Yogesh said...

Rahul ji,

Sach kahu, mujhe aapki kavita pasand nahi aai.
Shayad mujhe samaj hi nahin aai hogi is liye. Ya fir ye itne high level ki poetry hai, jo mujhe samaj nahi aai. May be...I am beginner in this field. But I say what ever i feel like.

Don't mind.

Anwar Qureshi said...

मैं
जीवन की आपाधापी का
बहाना कर के
कतरा कर निकल गया
खूंटे से बंधे
मवेशियों की कतार में
शामिल हो गया
बहुत अच्छा लिखा है आप ने ...