Wednesday, August 6, 2008

मिलन

मैं छुपता रहा
तुम खिलती रही
ये कैसा खेल?

हाथों में मेरे
तुम समाती रही
ये कैसा जादू?

हुआ कि नहीं?
सच था कि सपना?
ये कैसे प्रश्न?

एक नज़र
वो आईना तो देखो
ये कैसा चिन्ह?

सिएटल,
6 अगस्त 2008

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5 comments:

seema gupta said...

हाथों में मेरे
तुम समाती रही
ये कैसा जादू?
"good poetry,liked it'

Anil Pusadkar said...

main chhupta raha,tum khilti rahi. sunder bhav aur sunder kawita

vipinkizindagi said...

behatarin....

राजीव रंजन प्रसाद said...

बहुत सुन्दर रचना...बधाई स्वीकारें..


***राजीव रंजन प्रसाद

तेरे लिये said...

बहुत सुंदर है राहुल...