Thursday, August 7, 2008

और यहीं कहीं रब देखा

पंडित को करता जप देखा
साधु को करता तप देखा
गिरजा दरगाह सब देखा
हर तरह का मजहब देखा
पर कभी नहीं रब देखा

आग उगलता पर्वत देखा
सागर पलटता करवट देखा
ज़मीं पे झुकता नभ देखा
कुदरत का हर करतब देखा
पर कभी नहीं रब देखा

उमड़ता घुमड़ता सावन देखा
हरा भरा सा वन देखा
इधर-उधर जब देखा
सौन्दर्य लबालब देखा
पर कभी नहीं रब देखा

किसी को मन-मरजी करते देखा
किसी को जीते जी मरते देखा
सुख और दु:ख सब देखा
हर तरह का मतलब देखा
पर कभी नहीं रब देखा

तुम्हें अपना बनते देखा
सांसों में तुम्हें घुलते देखा
तुम्हें प्रफ़ुल्लित जब देखा
जीवन होता सुलभ देखा
और यहीं कहीं रब देखा

सिएटल,
7 अगस्त 2008

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4 comments:

Ravi said...

रब तो हर कण-कण में हैं.
हर पल में, हर छन-छन में हैं।
गर गौर से सुनो तो हर वादी के,
सन्नाटे के सन-सन में हैं।
..Ravi

Shiv Kumar Mishra said...

सत्य वचन महाराज.
बहुत खूब.

Shivanshu said...

Bahut dino bad Acha padne ko mila ...

Good keep it up....

Yogesh said...

I loved to read it !!

Kabhi nahin rab dekha !!

Aapki poems bahut achhi hai, lagta hai aapka blog mujhe favorites me add karna padega...

Bahut badhia !!