Thursday, August 7, 2008

जितने भी सगे थे सब के सब सगाँ निकले

जितने भी सगे थे सब के सब सगाँ निकले
परायों के आगोश में दिल के अरमाँ निकले

अंधे थे हम और अंधी थी चाहत हमारी
तिस पर तुर्रा ये कि हम बेज़ुबाँ निकले

दूर से देते रहे उम्र भर का वादा मुझे
पास आए तो दो दिन के मेहमाँ निकले

कुछ यूँ खेली आँख-मिचौली ज़िंदगी ने मुझसे
कि जिनके पीछे मैं आया यहाँ वो वहाँ निकले

काटने को तो काट सकता है 'राहुल' अकेला इसे
बशर्ते सफ़र के अंत में चार शख़्स मेहरबाँ निकले

सिएटल,
7 अगस्त 2008
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सगे = blood relatives
सगाँ = कुत्तें, dogs
तिस पर तुर्रा = and on top of that

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6 comments:

राजीव रंजन प्रसाद said...

वाह!!! बहुत अच्छी गज़ल..


***राजीव रंजन प्रसाद

Anil Pusadkar said...

shaandar.aur shabd nahi hai taareef ke liye,badhai

seema gupta said...

दूर से देते रहे उम्र भर का वादा मुझे
पास आए तो दो दिन के मेहमाँ निकले
"very nice one"
Regards

विनय प्रजापति 'नज़र' said...

शब्द चमत्कार प्रभावित करता है!

Anonymous said...

Very nice, Rahul! Har sher bahut hi deep hai.

Yogesh said...

One of the best I have ever read..

Bahut hi badhia !!

Very well composed. Mazaa aa gya padh kar...