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Tuesday, May 25, 2021

नदी बहती है

नदी बहती है 

नदी कहती है

नदी

बहते-बहते

कहती है 


कहती है

सुनती नहीं 


दीवारें सुनती हैं

कहतीं नहीं 


जो सुनता है

वह कहता नहीं 


जो कहता है

वह सुनता नहीं 


राहुल उपाध्याय । 24 मई 2021 । सिएटल 

Tuesday, February 9, 2021

मैं ग़ालिब हूँ, मैं मीर हूँ

मैं ग़ालिब हूँ, मैं मीर हूँ 

किसी के कमान का न तीर हूँ 


है सबका अपना वेद कोई

मैं खुद ही दवा खुद पीर हूँ


हैं दामन पे जो दाग मेरे

मैं उनसे हुआ अमीर हूँ 


ज़हर पीऊँ मुझे रास नहीं

मैं पीता ना कोई खीर हूँ


तुम मिले मुझे सब मिला

मैं मालामाल फ़क़ीर हूँ


राहुल उपाध्याय । 9 फ़रवरी 2021 । सिएटल 


Sunday, February 7, 2021

प्यार किया करता हूँ

है शिकवा उन्हें मैं प्यार किया करता हूँ

फ़क़त फक्र मुझे मैं प्यार किया करता हूँ 


ज़माने भर के ग़मों की है एक भीड़ यहाँ 

उन्हें तज के मैं प्यार किया करता हूँ 


न इसका हूँ, न उसका हूँ, न किसी का हूँ मैं 

हर कली से मैं प्यार किया करता हूँ 


न मिलाई कुंडली, न मुहूर्त निकाला है कभी

सुबह से शाम से मैं प्यार किया करता हूँ


न सोचा, न समझा, न परखा है कभी 

सरफिरा मैं, मैं प्यार किया करता हूँ


राहुल उपाध्याय । 7 फ़रवरी 2021 । सिएटल 

——

फ़क़त फक्र = केवल गर्व








Tuesday, February 2, 2021

दूरी

ऑनलाइन सब भेजा जा सकता है

डाटा ख़त्म हो जाए तो 

यहाँ से बैठे-बैठे

रिचार्ज कराया जा सकता है

पानी गर्म करने वाली इमरशन रॉड 

ख़राब हो जाए तो

नई डिलीवर करवाई जा सकती है

चूड़ी-बिंदिया-प्लाजो-चप्पल 

सब भिजवाए जा सकते हैं

पिज़्ज़ा-भटूरे-भुट्टे भी


लेकिन 

चाकू चुभ जाए

उँगली से खून निकल आए

तो मुँह में दबाकर 

खून सोख नहीं सकता

रोक नहीं सकता 

काँधे पर सर रख कर

बालों में उँगलियाँ नहीं फेर सकता

पीठ थपथपा कर 

कच्ची नींद में नहीं ले जा सकता

अधखुली आँखों को

गर्म साँसों को 

अपनी गर्दन पर

महसूस नहीं कर सकता

उन्हें विश्वास नहीं दिला सकता कि

मैं हूँ 

मैं यहीं हूँ

मैं यही हूँ 


स्क्रीन के कितना ही पास चला जाऊँ 

7,384 मील की दूरी मिट नहीं सकती


राहुल उपाध्याय । 2 फ़रवरी 2021 । सिएटल 





Monday, February 1, 2021

इतना भरोसा है

रोती है वो 

ढेर सारे

सच्चे आँसू 

जब भी मैं बात करता हूँ 

मेरे जाने की 


जबकि वह जानती है कि 

सबको एक दिन जाना है 

मुझे उससे पहले 

बहुत पहले 

और यह भी कि 

वह मेरे बिना जी लेगी 

बख़ूबी जी लेगी 

जैसे जी रहीं हैं 

कई विधवाएँ 

और प्रेमिकाएँ


बहुत दुःख होता है 

उसे रोता देख कर 

और एक सुकून भी 

कि मैं उसके बिना

न जीता हूँ

न जी सकूँगा 

न जीऊँगा


एक्चुअरियल साइंस का

मुझ पर

और मुझे उस पर

इतना भरोसा है


राहुल उपाध्याय । 1 फ़रवरी 2021 । सिएटल 



Saturday, January 9, 2021

अपराध

अपराध 

अब रात में नहीं होते हैं 


रातें रूमानी हो चली हैं

कभी बहता है यूट्यूब से संगीत 

तो कभी आकाशवाणी से 

तो कभी सोनी के वायरलेस 

नॉइज़ कैंसलिंग ब्लूटूथ हेडसेट से आती तुम्हारी खनकती आवाज़ से 


तुम्हारे होंठ और मेरे कान के बीच 

हज़ारों मील के फ़ासले

विलीन हो जाते हैं

तुम निर्भीक और निश्छल भाव से 

बातें 

करती जाती हो 

करती जाती हो 

करती जाती हो 

करती जाती हो 

करती जाती हो 

करती जाती हो 


अपराध 

अब नहीं होते हैं 


ज़िन्दगी रूमानी हो चली है

पोर-पोर से बहता है संगीत 

पल-पल

पग-पग 


थिरकते हैं पाँव- थोड़े और तेज़ 

धड़कता है दिल - थोड़ा और तेज़ 


राहुल उपाध्याय । 9 जनवरी 2021 । सिएटल 


Monday, December 28, 2020

शिमला

गिरी शिमला में बर्फ़ 

और यहाँ 

हो रहीं हैं यादें 

गर्म मेरी


वो रोज़ दो घण्टे चलना 

तुम्हारे साथ 

समर हिल के घर से 

जाखू हिल के स्कूल तक

खाना काग़ज़ की थैली में

गर्म भूनी हुई मूँगफलियाँ 

लेना दोनों हथेली जोड़ 

काली बाड़ी का प्रसाद

खींचना नवविवाहित जोड़ों के

मुस्कराहट भरे फ़ोटो 

लौटते वक़्त पकड़ना दौड़ कर

पाँच-पच्चीस की ट्रैन


यदि पढ़ रही हो

ये पंक्तियाँ 

तो

करना मुझे पिंग


न तुम तजना 

अपना परिवेश 

अपना परिवार 

न मैं करूँगा 

मिन्नतें हज़ार 


बस बता देना कि

क्या याद है तुम्हें 

सिसिल होटल के

सामने वाला वो गज़ीबो 

जहाँ मैंने एक-एक कर पी थीं

तुम्हारे माथे पर कस कर बाँधे 

गहरे काले बालों के बीचों-बीच

उजली माँग में मोती सी सजीं

पानी की बूँदें 

जिस दिन हमसे हमारी

ट्रेन छूट गई थी 

और बरसते पानी ने दिए थे हमें 

पल दो पल ठहर

एक दूजे को निहारने को


राहुल उपाध्याय । 28 दिसम्बर 2020 । सिएटल 

गज़ीबो = एक मंडप संरचना, जो कभी-कभी अष्टकोणीय या बुर्ज के आकार का होता है, जिसे अक्सर पार्क, बगीचे या विशाल क्षेत्र में बनाया जाता है।

Saturday, November 14, 2020

मुझे चश्मा लगा

मुझे चश्मा लगा

उसे भूख लगी


मेरे दीप जलें

उसके पास 

चूल्हा तक नहीं 


घड़ियों की तो गिनती ही क्या

मेरे पास

चार गाड़ियाँ हैं

छ: आईफ़ोन हैं 

पाँच टीवी हैं 

दो ऐलेक्सा हैं

चार बेडरूम का 

एक दो मंज़िला 

घर है

ज़मीन है

जेवरात हैं 


विषमताओं का 

मैं 

शोक मनाऊँ कि जश्न?


जीवन

कोई भूगोल नहीं 

कि

यहाँ से चलें 

और वहाँ पहुँच गए


जीवन

एक बेहतर कल की 

उम्मीद की

कल-कल है


राहुल उपाध्याय । 14 नवम्बर 2020 । सिएटल 

--

Thursday, November 12, 2020

रोज़ कटता मेरा हाथ है

तेरे जार में रोज़ कटता मेरा हाथ है


तेरे प्यार में

निकालने जाता हूँ 

नानखटाई 

और

कट जाता मेरा हाथ है


——


मेरा अपना ख़ून 

मुझसे कुछ नहीं कहता


जब तक निकाल के न रख दूँ

किसी औज़ार से जुड़ी

पत्ती पर

और पढ़ूँ 

कोई नम्बर 


सौ से कम तो ख़ुश 

ज़्यादा तो दुखी


वो नहीं 

मैं 


वह भी

डॉक्टर के कहने पर


किस काम के

ये ज्ञान 

ये डॉक्टर 

ये औज़ार 

जो

हँसते-खेलते इंसान को

दुखी कर दें?


लम्बी उम्र जीने के लिए

दो पल के सुख से रोक दें


कल के लिए

आज बलि कर दें


——


तेरे जार में 

तेरे प्यार में 

रोज़ कटता मेरा हाथ है


राहुल उपाध्याय । 12 नवम्बर 2020 । सिएटल 



Saturday, October 31, 2020

क्या भूलूँ, क्या याद करूँ

किसका जश्न मनाया जाता है 

किसका स्मृति दिवस होता है

सब सत्ता पर निर्भर होता है


एक लौहपुरुष, एक दुर्गा-तुल्य

सब समर्थकों के जुमले हैं

इंसानों में इनकी गिनती कहाँ 

ये विचारधाराओं के पुतले हैं


एक जन्मे, एक मरीं

हज़ारों एक ही दिन कत्ल हुए

जिन्हें चाहा याद किया 

जिन्हें चाहा भूल गए 


है इतिहासकारों में खोट कहाँ 

जब हम ही बावले बनते हैं 

अपने ही जीवनकाल की घटनाएँ 

जब चुन-चुनकर हम भूलते हैं 


राहुल उपाध्याय । 31 अक्टूबर 2020 । सिएटल 


Thursday, October 15, 2020

ये लफड़ों, ये झगड़ों, ये झड़पों का भारत

ये लफड़ों, ये झगड़ों, ये झड़पों का भारत 

ये इनसां के दुश्मन समाजों का भारत 

ये मज़हब के झूठे रिवाज़ों का भारत 

ये भारत अगर मिट भी जाए तो क्या है


हर एक जिस्म पागल, हर एक रुह प्यासी

विज्ञापन पे खटपट, ट्वीटर पे लड़ाई 

ये भारत है या आलम-ए-बदहवासी


यहाँ एक खिलौना है बिटिया की हस्ती

ये बस्ती है मुर्दा-परस्तों की बस्ती

यहाँ पर तो जीवन से है मौत सस्ती


जवानी भटकती है बेरोज़गार बनकर

जवां जिस्म मिटते है लाचार बनकर

यहाँ स्कूल खुलते हैं व्यापार बनकर


ये भारत जहां इंसानियत नहीं है

क़ानून नहीं है, हिफ़ाज़त नहीं है

जहां सच सुनने की आदत नहीं है 


ये भारत अगर मिट भी जाए तो क्या है


(साहिर से क्षमायाचना सहित)

राहुल उपाध्याय । 15 अक्टूबर 2020 । सिएटल 


Saturday, October 3, 2020

संज्ञा-सर्वनाम

मैं कौन हूँ? मैं क्या हूँ?

किस संज्ञा-सर्वनाम में खो अपनी पहचान दूँ?


जब ध्वनि नहीं, ध्यान था

तब भी मैं विद्यमान था

अब अनगिनत रंग हैं 

अनगिनत रूप हैं 

इस अक्स को क्यों कोई निरर्थक नाम दूँ?


मैं सूक्ष्म हूँ, विशाल हूँ 

मैं धरती हूँ, आकाश हूँ 

मैं प्रकट में हूँ, नेपथ्य में हूँ 

मैं सत्य में हूँ, असत्य में हूँ 

इस अनंत को क्यों कोई संकुचित नाम दूँ?


मैं कल हूँ, मैं आज हूँ

मैं ज्ञात हूँ, मैं राज़ हूँ 

मैं पंख हूँ, मैं परवाज़ हूँ 

न अंत हूँ, न आग़ाज़ हूँ 

किसी सीमा में इसे क्यों बाँध दूँ?


मैं कौन हूँ? मैं क्या हूँ?

किसी संज्ञा-सर्वनाम में क्यों खो अपनी पहचान दूँ?


राहुल उपाध्याय । 3 अक्टूबर 2020 । सिएटल 


Thursday, September 24, 2020

भजो राम प्यारे

भजो राम प्यारे 

मिटे रोग सारे

यदि ट्रम्प या मोदी 

कहे लगा के नारे 

कहेंगे सब इनका 

है दिमाग फिरा रे

यही कहे तुलसी

तो लगे संत न्यारे


हमसे बढ़ा शातिर 

है कोई और कहाँ रे 

हर जगह से अपेक्षा 

है अलग सदा से

डॉक्टर से न माँगे 

ग्रहों के उपचार आदि

पंडितों से न माँगे 

किसी दर्द की दवा रे


राहुल उपाध्याय । 24 सितम्बर 2020 । सिएटल 


Wednesday, September 16, 2020

अमरत्व

मुझे 

अहसास है 

अपने अमरत्व का

इसीलिए 

तुमसे 

करता हूँ बातें

देता हूँ सदाएँ 


इस ब्रह्माण्ड में

सब कुछ

परिवर्तित होता है

विलीन नहीं


राहुल उपाध्याय । 16 सितम्बर 2020 । सिएटल 


Sunday, August 30, 2020

तुझे मालूम है, तूझे मालूम है

तुझे मालूम है, तूझे मालूम है 

पग-पग की ख़बरें तूझे मालूम है


कौन आएगा, कौन जाएगा 

तुझे मालूम है, तूझे मालूम है

तूझे पग-पग की ख़बरें मालूम है 


तू क्यूँ बदलेगा अपनी चाल पुरानी 

तू क्यूँ बदलेगा अपनी राह सुहानी

तू क्यूँ बदलेगा अपनी चाल सुहानी 

तू क्यूँ बदलेगा अपनी राह पुरानी 

तू अनजान नहीं, तू तो मासूम है

तूझे मालूम है, तूझे मालूम है 

पग-पग की ख़बरें तूझे मालूम है


कोरोना आएगा, कोरोना जाएगा 

तू क्यूँ बदलेगा अपनी चाल पुरानी 

तू क्यूँ बदलेगा अपनी राह सुहानी

तू क्यूँ बदलेगा अपनी चाल सुहानी 

तू क्यूँ बदलेगा अपनी राह पुरानी 

तू अनजान नहीं, तू तो मासूम है

तू अनजान नहीं, तू तो मौसम है

तूझे मालूम है, तूझे मालूम है 

पग-पग की ख़बरें तूझे मालूम है


तू तो मौसम है, तू तो मौसम है 


राहुल उपाध्याय । 30 अगस्त 2020 । सिएटल