नदी बहती है
नदी कहती है
नदी
बहते-बहते
कहती है
कहती है
सुनती नहीं
दीवारें सुनती हैं
कहतीं नहीं
जो सुनता है
वह कहता नहीं
जो कहता है
वह सुनता नहीं
राहुल उपाध्याय । 24 मई 2021 । सिएटल
नदी बहती है
नदी कहती है
नदी
बहते-बहते
कहती है
कहती है
सुनती नहीं
दीवारें सुनती हैं
कहतीं नहीं
जो सुनता है
वह कहता नहीं
जो कहता है
वह सुनता नहीं
राहुल उपाध्याय । 24 मई 2021 । सिएटल
Posted by Rahul Upadhyaya at 1:14 AM
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Labels: intense
मैं ग़ालिब हूँ, मैं मीर हूँ
किसी के कमान का न तीर हूँ
है सबका अपना वेद कोई
मैं खुद ही दवा खुद पीर हूँ
हैं दामन पे जो दाग मेरे
मैं उनसे हुआ अमीर हूँ
ज़हर पीऊँ मुझे रास नहीं
मैं पीता ना कोई खीर हूँ
तुम मिले मुझे सब मिला
मैं मालामाल फ़क़ीर हूँ
राहुल उपाध्याय । 9 फ़रवरी 2021 । सिएटल
है शिकवा उन्हें मैं प्यार किया करता हूँ
फ़क़त फक्र मुझे मैं प्यार किया करता हूँ
ज़माने भर के ग़मों की है एक भीड़ यहाँ
उन्हें तज के मैं प्यार किया करता हूँ
न इसका हूँ, न उसका हूँ, न किसी का हूँ मैं
हर कली से मैं प्यार किया करता हूँ
न मिलाई कुंडली, न मुहूर्त निकाला है कभी
सुबह से शाम से मैं प्यार किया करता हूँ
न सोचा, न समझा, न परखा है कभी
सरफिरा मैं, मैं प्यार किया करता हूँ
राहुल उपाध्याय । 7 फ़रवरी 2021 । सिएटल
——
फ़क़त फक्र = केवल गर्व
ऑनलाइन सब भेजा जा सकता है
डाटा ख़त्म हो जाए तो
यहाँ से बैठे-बैठे
रिचार्ज कराया जा सकता है
पानी गर्म करने वाली इमरशन रॉड
ख़राब हो जाए तो
नई डिलीवर करवाई जा सकती है
चूड़ी-बिंदिया-प्लाजो-चप्पल
सब भिजवाए जा सकते हैं
पिज़्ज़ा-भटूरे-भुट्टे भी
लेकिन
चाकू चुभ जाए
उँगली से खून निकल आए
तो मुँह में दबाकर
खून सोख नहीं सकता
रोक नहीं सकता
काँधे पर सर रख कर
बालों में उँगलियाँ नहीं फेर सकता
पीठ थपथपा कर
कच्ची नींद में नहीं ले जा सकता
अधखुली आँखों को
गर्म साँसों को
अपनी गर्दन पर
महसूस नहीं कर सकता
उन्हें विश्वास नहीं दिला सकता कि
मैं हूँ
मैं यहीं हूँ
मैं यही हूँ
स्क्रीन के कितना ही पास चला जाऊँ
7,384 मील की दूरी मिट नहीं सकती
राहुल उपाध्याय । 2 फ़रवरी 2021 । सिएटल
Posted by Rahul Upadhyaya at 9:13 PM
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Labels: intense, relationship
रोती है वो
ढेर सारे
सच्चे आँसू
जब भी मैं बात करता हूँ
मेरे जाने की
जबकि वह जानती है कि
सबको एक दिन जाना है
मुझे उससे पहले
बहुत पहले
और यह भी कि
वह मेरे बिना जी लेगी
बख़ूबी जी लेगी
जैसे जी रहीं हैं
कई विधवाएँ
और प्रेमिकाएँ
बहुत दुःख होता है
उसे रोता देख कर
और एक सुकून भी
कि मैं उसके बिना
न जीता हूँ
न जी सकूँगा
न जीऊँगा
एक्चुअरियल साइंस का
मुझ पर
और मुझे उस पर
इतना भरोसा है
राहुल उपाध्याय । 1 फ़रवरी 2021 । सिएटल
Posted by Rahul Upadhyaya at 4:27 PM
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Labels: intense, relationship
अपराध
अब रात में नहीं होते हैं
रातें रूमानी हो चली हैं
कभी बहता है यूट्यूब से संगीत
तो कभी आकाशवाणी से
तो कभी सोनी के वायरलेस
नॉइज़ कैंसलिंग ब्लूटूथ हेडसेट से आती तुम्हारी खनकती आवाज़ से
तुम्हारे होंठ और मेरे कान के बीच
हज़ारों मील के फ़ासले
विलीन हो जाते हैं
तुम निर्भीक और निश्छल भाव से
बातें
करती जाती हो
करती जाती हो
करती जाती हो
करती जाती हो
करती जाती हो
करती जाती हो
अपराध
अब नहीं होते हैं
ज़िन्दगी रूमानी हो चली है
पोर-पोर से बहता है संगीत
पल-पल
पग-पग
थिरकते हैं पाँव- थोड़े और तेज़
धड़कता है दिल - थोड़ा और तेज़
राहुल उपाध्याय । 9 जनवरी 2021 । सिएटल
गिरी शिमला में बर्फ़
और यहाँ
हो रहीं हैं यादें
गर्म मेरी
वो रोज़ दो घण्टे चलना
तुम्हारे साथ
समर हिल के घर से
जाखू हिल के स्कूल तक
खाना काग़ज़ की थैली में
गर्म भूनी हुई मूँगफलियाँ
लेना दोनों हथेली जोड़
काली बाड़ी का प्रसाद
खींचना नवविवाहित जोड़ों के
मुस्कराहट भरे फ़ोटो
लौटते वक़्त पकड़ना दौड़ कर
पाँच-पच्चीस की ट्रैन
यदि पढ़ रही हो
ये पंक्तियाँ
तो
करना मुझे पिंग
न तुम तजना
अपना परिवेश
अपना परिवार
न मैं करूँगा
मिन्नतें हज़ार
बस बता देना कि
क्या याद है तुम्हें
सिसिल होटल के
सामने वाला वो गज़ीबो
जहाँ मैंने एक-एक कर पी थीं
तुम्हारे माथे पर कस कर बाँधे
गहरे काले बालों के बीचों-बीच
उजली माँग में मोती सी सजीं
पानी की बूँदें
जिस दिन हमसे हमारी
ट्रेन छूट गई थी
और बरसते पानी ने दिए थे हमें
पल दो पल ठहर
एक दूजे को निहारने को
राहुल उपाध्याय । 28 दिसम्बर 2020 । सिएटल
गज़ीबो = एक मंडप संरचना, जो कभी-कभी अष्टकोणीय या बुर्ज के आकार का होता है, जिसे अक्सर पार्क, बगीचे या विशाल क्षेत्र में बनाया जाता है।
Posted by Rahul Upadhyaya at 1:07 PM
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मुझे चश्मा लगा
उसे भूख लगी
मेरे दीप जलें
उसके पास
चूल्हा तक नहीं
घड़ियों की तो गिनती ही क्या
मेरे पास
चार गाड़ियाँ हैं
छ: आईफ़ोन हैं
पाँच टीवी हैं
दो ऐलेक्सा हैं
चार बेडरूम का
एक दो मंज़िला
घर है
ज़मीन है
जेवरात हैं
विषमताओं का
मैं
शोक मनाऊँ कि जश्न?
जीवन
कोई भूगोल नहीं
कि
यहाँ से चलें
और वहाँ पहुँच गए
जीवन
एक बेहतर कल की
उम्मीद की
कल-कल है
राहुल उपाध्याय । 14 नवम्बर 2020 । सिएटल
--Posted by Rahul Upadhyaya at 12:04 AM
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तेरे जार में रोज़ कटता मेरा हाथ है
तेरे प्यार में
निकालने जाता हूँ
नानखटाई
और
कट जाता मेरा हाथ है
——
मेरा अपना ख़ून
मुझसे कुछ नहीं कहता
जब तक निकाल के न रख दूँ
किसी औज़ार से जुड़ी
पत्ती पर
और पढ़ूँ
कोई नम्बर
सौ से कम तो ख़ुश
ज़्यादा तो दुखी
वो नहीं
मैं
वह भी
डॉक्टर के कहने पर
किस काम के
ये ज्ञान
ये डॉक्टर
ये औज़ार
जो
हँसते-खेलते इंसान को
दुखी कर दें?
लम्बी उम्र जीने के लिए
दो पल के सुख से रोक दें
कल के लिए
आज बलि कर दें
——
तेरे जार में
तेरे प्यार में
रोज़ कटता मेरा हाथ है
राहुल उपाध्याय । 12 नवम्बर 2020 । सिएटल
Posted by Rahul Upadhyaya at 9:39 AM
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किसका जश्न मनाया जाता है
किसका स्मृति दिवस होता है
सब सत्ता पर निर्भर होता है
एक लौहपुरुष, एक दुर्गा-तुल्य
सब समर्थकों के जुमले हैं
इंसानों में इनकी गिनती कहाँ
ये विचारधाराओं के पुतले हैं
एक जन्मे, एक मरीं
हज़ारों एक ही दिन कत्ल हुए
जिन्हें चाहा याद किया
जिन्हें चाहा भूल गए
है इतिहासकारों में खोट कहाँ
जब हम ही बावले बनते हैं
अपने ही जीवनकाल की घटनाएँ
जब चुन-चुनकर हम भूलते हैं
राहुल उपाध्याय । 31 अक्टूबर 2020 । सिएटल
ये लफड़ों, ये झगड़ों, ये झड़पों का भारत
ये इनसां के दुश्मन समाजों का भारत
ये मज़हब के झूठे रिवाज़ों का भारत
ये भारत अगर मिट भी जाए तो क्या है
हर एक जिस्म पागल, हर एक रुह प्यासी
विज्ञापन पे खटपट, ट्वीटर पे लड़ाई
ये भारत है या आलम-ए-बदहवासी
यहाँ एक खिलौना है बिटिया की हस्ती
ये बस्ती है मुर्दा-परस्तों की बस्ती
यहाँ पर तो जीवन से है मौत सस्ती
जवानी भटकती है बेरोज़गार बनकर
जवां जिस्म मिटते है लाचार बनकर
यहाँ स्कूल खुलते हैं व्यापार बनकर
ये भारत जहां इंसानियत नहीं है
क़ानून नहीं है, हिफ़ाज़त नहीं है
जहां सच सुनने की आदत नहीं है
ये भारत अगर मिट भी जाए तो क्या है
(साहिर से क्षमायाचना सहित)
राहुल उपाध्याय । 15 अक्टूबर 2020 । सिएटल
Posted by Rahul Upadhyaya at 12:13 AM
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मैं कौन हूँ? मैं क्या हूँ?
किस संज्ञा-सर्वनाम में खो अपनी पहचान दूँ?
जब ध्वनि नहीं, ध्यान था
तब भी मैं विद्यमान था
अब अनगिनत रंग हैं
अनगिनत रूप हैं
इस अक्स को क्यों कोई निरर्थक नाम दूँ?
मैं सूक्ष्म हूँ, विशाल हूँ
मैं धरती हूँ, आकाश हूँ
मैं प्रकट में हूँ, नेपथ्य में हूँ
मैं सत्य में हूँ, असत्य में हूँ
इस अनंत को क्यों कोई संकुचित नाम दूँ?
मैं कल हूँ, मैं आज हूँ
मैं ज्ञात हूँ, मैं राज़ हूँ
मैं पंख हूँ, मैं परवाज़ हूँ
न अंत हूँ, न आग़ाज़ हूँ
किसी सीमा में इसे क्यों बाँध दूँ?
मैं कौन हूँ? मैं क्या हूँ?
किसी संज्ञा-सर्वनाम में क्यों खो अपनी पहचान दूँ?
राहुल उपाध्याय । 3 अक्टूबर 2020 । सिएटल
भजो राम प्यारे
मिटे रोग सारे
यदि ट्रम्प या मोदी
कहे लगा के नारे
कहेंगे सब इनका
है दिमाग फिरा रे
यही कहे तुलसी
तो लगे संत न्यारे
हमसे बढ़ा शातिर
है कोई और कहाँ रे
हर जगह से अपेक्षा
है अलग सदा से
डॉक्टर से न माँगे
ग्रहों के उपचार आदि
पंडितों से न माँगे
किसी दर्द की दवा रे
राहुल उपाध्याय । 24 सितम्बर 2020 । सिएटल
Posted by Rahul Upadhyaya at 10:35 PM
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मुझे
अहसास है
अपने अमरत्व का
इसीलिए
तुमसे
करता हूँ बातें
देता हूँ सदाएँ
इस ब्रह्माण्ड में
सब कुछ
परिवर्तित होता है
विलीन नहीं
राहुल उपाध्याय । 16 सितम्बर 2020 । सिएटल
Posted by Rahul Upadhyaya at 7:20 AM
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Labels: intense
तुझे मालूम है, तूझे मालूम है
पग-पग की ख़बरें तूझे मालूम है
कौन आएगा, कौन जाएगा
तुझे मालूम है, तूझे मालूम है
तूझे पग-पग की ख़बरें मालूम है
तू क्यूँ बदलेगा अपनी चाल पुरानी
तू क्यूँ बदलेगा अपनी राह सुहानी
तू क्यूँ बदलेगा अपनी चाल सुहानी
तू क्यूँ बदलेगा अपनी राह पुरानी
तू अनजान नहीं, तू तो मासूम है
तूझे मालूम है, तूझे मालूम है
पग-पग की ख़बरें तूझे मालूम है
कोरोना आएगा, कोरोना जाएगा
तू क्यूँ बदलेगा अपनी चाल पुरानी
तू क्यूँ बदलेगा अपनी राह सुहानी
तू क्यूँ बदलेगा अपनी चाल सुहानी
तू क्यूँ बदलेगा अपनी राह पुरानी
तू अनजान नहीं, तू तो मासूम है
तू अनजान नहीं, तू तो मौसम है
तूझे मालूम है, तूझे मालूम है
पग-पग की ख़बरें तूझे मालूम है
तू तो मौसम है, तू तो मौसम है
राहुल उपाध्याय । 30 अगस्त 2020 । सिएटल