Saturday, February 18, 2017

टूट न जाएँ सपने मैं डरता हूँ

टूट जाएँ सपने 

मैं डरता हूँ

जग के भी देखो कहाँ

मैं जगता हूँ


रूठ जाएँ अपने

मैं डरता हूँ

खोल के भी आँखें अपनी

बंद रखता हूँ


भूल जाऊँ उसे

मैं डरता हूँ

ग़म और ख़ुशी से मैं 

दूर रहता हूँ


छूट जाए बचपन

मैं डरता हूँ

बरखा की बूँदें 

लब पे चखता हूँ


डूब जाए सूरज

मैं डरता हूँ

मेघों को नैनों में 

रोके रखता हूँ


बीत जाए जीवन

मैं डरता हूँ

दीया इक नया जला

दिया करता हूँ


18 फ़रवरी 2017

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Friday, February 10, 2017

जिस देश में वॉल स्ट्रीट की पूजा होती हो

जिस देश में 

वॉल स्ट्रीट की पूजा होती हो

और गेट्स जहाँ के हों महानायक

वह देश यदि दीवार बनाए

या कर ले दरवाज़े बन्द 

तो

दुनिया क्यूँ ऐसे बौखला रही है

जैसे गया हो कोई भूकम्प 


जबकि

दुनिया भर में यही हाल है

घर-घर की है यही कहानी

कि एक घर के कई घर हैं बनते

दीवारें और दरवाज़े बनते


सबको चाहिए अपने कमरे

अपने ताले-चाबी

आधिपत्य का यही हिसाब है

कि मेरे पास हैं कमरे कितने


दीवारों और दरवाज़ों से ही तो

हम सब सभ्य बने हैं

जानवरों से बर्ताव छोड़े

और इन्सान बने हैं


समृद्धि के हैं यही मापदण्ड

सफलताओं की भी पूँजी 


चाहे हो कोई छोटा नौकर

या हो बड़ा कोई अफ़सर

बग़ैर इजाज़त नहीं जा सकते

आप किसी के भी घर पर


और भेदभाव की तो बात ही करें

तो ही अच्छा होगा

क्योंकि भेदभाव की बातें करना

मात्र एक शग़ल है

पर भेदभाव करे कोई

यह तो लगभग असम्भव है


ये हैं मेरे बेटे-बेटी

ये हैं भाई-भतीजे

इन दोनों में बहुत है अंतर

किसी से भी आप पूछ लीजे 

एक के लिए उपहार ख़रीदे जाते

दूजे को दी जाती हैं शुभकामनाएँ 


फिर सहपाठी की औक़ात ही क्या है

और पड़ोसी तो एक आफ़त है


जिस देश में 

वॉल स्ट्रीट की पूजा होती हो

और गेट्स जहाँ के हों महानायक 

...


10 फ़रवरी 2017

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Saturday, February 4, 2017

नोट-गेट दोऊ बन्द पड़े

नोट-गेट दोऊ बन्द पड़े

जनता करे संताप

जब तक नेट बन्द हो

कविता पढ़िए आप


कविता पढ़िए आप

करिए वाह-वाही

होती रहती है दुनिया में 

इसकी-उसकी तबाही


कब तक किसका रोना रोए

कब तक करें सोच-विचार

जीवन की आपाधापी से

मिलते नहीं पल दो-चार


मिलते नहीं पल दो-चार

क्या-क्या करें हम भैया

नाच नचाए टू-डू-लिस्ट हमको

करे हम ताता-थैया


जाको राखे साइयाँ 

मार सके कोय

हरि इच्छा बलवान है कह के 

मुँह ढाकि हम सोय


4 फ़रवरी 2017

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Thursday, January 19, 2017

कुछ लोग दान देते हैं

कुछ लोग दान देते हैं

मैं ध्यान देता हूँ

सड़क पर

स्क्रीन पर नहीं


मुझे देर हो जाती है

संदेशों के पढ़ने में 

उनका जवाब देने में

ईमेटिकॉन चिपकाने में 


मैं नहीं चाहता कि

मेरी वजह से

किसी की तस्वीर पर

बेवजह

फूल चढ़ें

किसी के नाम के आगे

स्वर्गीय लिखा जाए


मुझे देर हो जाती है

घनघनाते फोन उठाने में 

अॉफ़िस का काम निपटाने में 

किसी के घर पहुँच पाने में 


मुझे ख़ुशी है कि

मैं सही-सलामत हूँ

काम पर आता-जाता हूँ

लोगों से मिलजुल पाता हूँ


कुछ लोग दान देते हैं

मैं ध्यान देता हूँ


19 जनवरी 2017

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Tuesday, January 17, 2017

आँखें नहीं है जिनके पास वे भी कितना रोते हैं

आँखें नहीं है जिनके पास

वे भी कितना रोते हैं

बादल-बिजली-पवन-निशा

सारा गाँव भिगोते हैं 


अपनी क़िस्मत अपने हाथों

लिखने वाले लिखते हैं

बाक़ी सब पूर्व-लिखाई

गंगा तट पे धोते हैं


कितना कुछ है अपने अन्दर 

कि अम्बर तक का अम्बार भी कम है

फिर भी कुछ खो जाने के डर से

चिन्तित हो के सोते हैं


वर्तमान का कुछ मान नहीं है

सब अगला या पिछला है

कभी कटाई करते हैं तो

बीज नया कभी बोते हैं


पोते-पोती बड़े हो गए

लीपा-पोती नहीं गई

कभी किसी की ख़ामी ढक ली

तो ज़ुल्म नया कोई ढोते हैं


व्रत के वृत्त से बाहर आओ

तो कुछ समझा पाऊँ मैं

कि उपवास और उपासना में 

कितना समय हम खोते हैं


17 जनवरी 2017

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