ऐ मेरे वतन के लोगो, तुम खूब कमा लो दौलत
दिन रात करो तुम मेहनत, मिले खूब शान और शौकत
पर मत भूलो सीमा पार अपनो ने हैं दाम चुकाए
कुछ याद उन्हे भी कर लो जिन्हे साथ न तुम ला पाए
ऐ मेरे वतन के लोगों, जरा आँख मे भर लो पानी
जो करीब नहीं हैं उनकी जरा याद करो कुरबानी
कोई सिख कोई जाट मराठा, कोई गुरखा कोई मदरासी
सरहद पार करने वाला हर कोई है एक एन आर आई
जिस माँ ने तुम को पाला वो माँ है हिन्दुस्तानी
जो करीब नहीं हैं उनकी जरा याद करो कुरबानी
जब बीमार हुई थी बच्ची या खतरे में पड़ी कमाई
दर दर दुआएँ मांगी, घड़ी घड़ी की थी दुहाई
मन्दिरों में गाए भजन जो सुने थे उनकी जबानी
जो करीब नहीं हैं उनकी जरा याद करो कुरबानी
उस काली रात अमावस जब देश में थी दीवाली
वो देख रहे थे रस्ता लिए साथ दीए की थाली
बुझ गये हैं सारे सपने रह गया है खारा पानी
जो करीब नहीं हैं उनकी जरा याद करो कुरबानी
न तो मिला तुम्हे वनवास ना ही हो तुम श्री राम
मिली हैं सारी खुशीयां मिले हैं ऐश-ओ-आराम
फ़िर भला क्यूं उनको दशरथ की गति है पानी
जो करीब नहीं हैं उनकी जरा याद करो कुरबानी
सींचा हमारा जीवन सब अपना खून बहा के
मजबूत किए ये कंधे सब अपना दाँव लगा के
जब विदा समय आया तो कह गए कि सब करते हैं
खुश रहना मेरे प्यारो अब हम तो दुआ करते हैं
क्या माँ है वो दीवानी क्या बाप है वो अभिमानी
जो करीब नहीं हैं उनकी जरा याद करो कुरबानी
तुम भूल न जाओ उनको इसलिए कही ये कहानी
जो करीब नहीं हैं उनकी जरा याद करो कुरबानी
सेन फ़्रांसिस्को
15 अगस्त 2001
(प्रदीप से क्षमायाचना सहित)
Monday, May 12, 2008
ऐ मेरे वतन के लोगो
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Rahul Upadhyaya
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जिसका डंडा उसका झंडा
जैसा देस वैसा भेस, ये सुना था
सोच समझ कर ही देश चुना था
वैसा ही पाया संसार
जैसा ख्वाबों ने बुना था
खुशियों का समंदर बढ़ा
दिन दूना और रात चौगुना था
जबसे आया मिलैनियम ये
तब से हमे मिले नियम ये
जिसका डंडा उसका झंडा
यही है इस युग का फ़ंडा
न जाने किसके गले पड़ेगा फ़ंदा
जो भी मांगे उसे दे दो चंदा
चाहे बाज़ार हो कितना भी मंदा
और न मिले कोई काम धंधा
सब हैं मस्त अपनी धुन में
नहीं कोई अपना सच्चा साथी
सब करते हैं अपना उल्लू सीधा
चाहे हो वो गधा या हाथी
क्या करेगा कोई बंदा
जब लीडर ही हो एक अंधा
नहीं पूरे होते अंधे के सपने
वो होते हैं अनदेखे सपने
बात मेरी मान लो
बस इतना जान लो
जब तक जी चाहे परदेस में रहो
पर जब तक रहो परदे में रहो
ओ परदेसी
परदे सीना ध्यान से
खतरा है स्वाभिमान से
निकले न कहीं म्यान से
झलके न कहीं ज्ञान से
परदे की आड़ में हो सकता है बच जाओ
इस मेल्टिंग पाँट में तुम भी पक जाओ
सेन फ़्रांसिस्को
20 सितम्बर 2001
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12:33 PM
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ये कुलदीप ये cool dude
ये कुलदीप ये cool dude
कमाल का इनका attitude
गुलाब जामुन और चाँकलेट
आलू पराठा और ऑमलेट
ये है इनके pet food
ये कुलदीप ये cool dude ...
पढ़ते लिखते दिन और रात
अव्वल आते हर जमात
काश ये होते इतने good
ये कुलदीप ये cool dude ...
संगीत इनका धूम-धड़ाक
बात करते तू-तड़ाक
behavior इनका very crude
ये कुलदीप ये cool dude ...
सुबह से हो जाता शुरू
TV जो इनका है गुरू
मार्गदर्शक इनका hollywood
ये कुलदीप ये cool dude ...
दिल को लगे ठेस सी
देख के इनकी प्रेयसी
लोग कहते हम हैं prude
ये कुलदीप ये cool dude ...
नाम के होते हैं parents
जो pay करते हैं इनके rent
और बदले में चाहे gratitude
ये कुलदीप ये cool dude ...
कपड़े इनके कटे-फ़टे
दुनिया से रहते कटे-कटे
डाल के सर पे अपने hood
ये कुलदीप ये cool dude ...
आने-जाने पे नहीं है रोक
खाने-पीने पे नहीं है रोक
फिर भी मांगे और latitude
ये कुलदीप ये cool dude ...
सेन फ़्रांसिस्को
अक्टूबर 2002
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21 वीं सदी
डूबते को तिनका नहीं 'lifeguard' चाहिए
'graduate' को नौकरी ही नहीं एक 'green card' चाहिए
खुशीयाँ मिलती थी कभी शाबाशी से
हर किसी को अब 'monetary reward' चाहिए
जो करते थे दावा हमारी हिफ़ाज़त का
उन्हे अपनी ही हिफ़ाज़त के लिये 'bodyguard' चाहिए
घर बसाना इतना आसान नहीं इन दिनों
कलेजा पत्थर का और हाथ में 'credit card' चाहिए
'blog, email' और 'newsgroup' के ज़माने में
भुला दिये गये हैं वो जिन्हे सिर्फ़ 'postcard' चाहिए
सिएटल,
24 फ़रवरी 2007
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मर्ज़
बाबुल चाहे सुदामा हो
ससुराल चाहे सुहाना हो
नया रिश्ता जोड़ने पर
अपना घर छोड़ने पर
दुल्हन जो होती है
दो आँसू तो रोती है
और इधर
हर एक को खुशी होती हैं
जब मातृभूमि
संतान अपना खोती हैं
क्यूं देश छोड़ने की
इतनी सशक्त अभिलाषा है?
क्या देश में
सचमुच इतनी निराशा है?
जाने कब क्या हो गया
वजूद जो था खो गया
ज़मीर जो था सो गया
लकवा जैसे हो गया
भेड़-चाल की दुनिया में
देश अपना छोड़ दिया
धनाड्यों की सेवा में
नाम अपना जोड़ दिया
अपनी समृद्ध संस्कृति से
अपनी मधुर मातृभाषा से
मुख अपना मोड़ लिया
माँ बाप का दिया हुआ
नाम तक छोड़ दिया
घर छोड़ा
देश छोड़ा
सारे संस्कार छोड़े
स्वार्थ के पीछे-पीछे
कुछ इतना तेज दौड़े
कि न कोई संगी-साथी है
न कोई अपना है
मिलियन्स बन जाए
यहीं एक सपना है
करते-धरते अपनी मर्जी हैं
पक्के मतलबी और गर्जी हैं
उसूल तो अव्वल थे ही नहीं
और हैं अगर तो वो फ़र्जी है
पैसों के पुजारी बने
स्टाँक्स के जुआरी बने
दोनों हाथ कमाते हैं
फिर भी क्यूं उधारी बने
किसी बात की कमी नहीं
फिर क्यूं चिंताग्रस्त हैं
खाने-पीने को बहुत हैं
फिर क्यूं रहते त्रस्त हैं
इन सब को देखते हुए
उठते कुछ प्रश्न हैं
पैसा कमाना क्या कुकर्म है?
आखिर इसमें क्या जुर्म है?
जुर्म नहीं, ये रोग है
विलास भोगी जो लोग है
'पेरासाईट' की फ़ेहरिश्त में
नाम उनके दर्ज हैं
पद-पैसो के पीछे भागना
एक ला-ईलाज मर्ज़ है
सिएटल,
24 फ़रवरी 2007
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क़हर
पहले भी बरसा था क़हर
अस्त-व्यस्त था सारा शहर
आज फ़िर बरसा है क़हर
अस्त-व्यस्त है सारा शहर
बदला किसी से लेने से
सज़ा किसी को देने से
मतलब नहीं निकलेगा
पत्थर नहीं पिघलेगा
जब तक है इधर और उधर
मेरा ज़हर तेरा ज़हर
बुरा है कौन, भला है कौन
सच की राह पर चला है कौन
मुक़म्मल नहीं है कोई भी
महफ़ूज़ नहीं है कोई भी
चाहे लगा हो नगर नगर
पहरा कड़ा आठों पहर
न कोई समझा है न समझेगा
व्यर्थ तर्क वितर्क में उलझेगा
झगड़ा नहीं एक दल का है
मसला नहीं आजकल का है
सदियां गई हैं गुज़र
हुई नहीं अभी तक सहर
नज़र जाती है जिधर
आँख जाती है सिहर
जो जितना ज्यादा शूर है
वो उतना ज्यादा क्रूर है
ताज है जिनके सर पर
ढाते हैं वो भी क़हर
आशा की किरण तब फूटेंगी
सदियों की नींद तब टूटेंगी
ताज़ा हवा फिर आएगी
दीवारे जब गिर जाएंगी
होगा जब घर एक घर
न तेरा घर न मेरा घर
सेन फ़्रांसिस्को
24 सितम्बर 2002
(अक्षरधाम पर हमले के बाद)
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Rahul Upadhyaya
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ॠषिवर
हम भी अजीब हैं
अल्ज़्हाईमर्स के मरीज हैं
वो है हम सब में
और हम ही को खबर नहीं है
ठीक उसी तरह जैसे
आँखे जो सब कुछ देखती हैं
नहीं देख पाती हैं खुद को
तलाश है एक आईने की
जो दिखा दे मुझे मेरी आत्मा
मेरा अंतर मेरा परमात्मा
आशा कम है चूंकि
आईने की नहीं
रिसिवर की है ज़रुरत
जैसे कि रेडियो वेव्स को
न तो देखा जा सकता हैं
न सुना जा सकता हैं
न सूंघा जा सकता हैं
न छुआ जा सकता हैं
न काटा जा सकता हैं
न मारा जा सकता हैं
क्या कृष्ण इसी की बात कर रहे थे?
अर्जुन को स्पंदन से ज्ञात कर रहे थे?
कैसे बनूं रिसिवर?
देखे हैं कई ॠषिवर
सिर पर है शिखा
जैसे कि एंटीना
पर वो तो बाद की बात है
बाहरी सजावट की बात है
मुझे अपनी पात्रता बढ़ानी होगी
ईर्ष्या दिल से मिटानी होगी
धूल मिट्टी कचरा हटाना होगा
कैसे बनूं रिसिवर?
सेन फ़्रांसिस्को
जुलाई 2002
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Rahul Upadhyaya
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