जहाँ से हम आए हैं
वहीं हमें जाना हैं
ज़मीं से आए हैं
ज़मी में समाना है
रंगीं हो पत्ते
या काले हो बादल
अंत तो सभी का
वही पुराना है
बड़े से आसमां में
मैं ढूंढता था जिसको
टेका जो माथा तो
उसे यहीं पे जाना है
अब गली-गली हाथ फैलाए
मैं भीख मांगूँगा नहीं
क्योंकि कदमों तले मेरे
गड़ा खजाना है
'गर होता वो उपर
तो सोचो आस्ट्रेलिया का क्या होता?
जहाँ हूँ मैं
वहीं उसका ठिकाना है
सिएटल 425-898-9325
6 नवम्बर 2009
Friday, November 6, 2009
जहाँ हूँ मैं वहीं उसका ठिकाना है
Posted by Rahul Upadhyaya at 12:10 AM
आपका क्या कहना है??
2 पाठकों ने टिप्पणी देने के लिए यहां क्लिक किया है। आप भी टिप्पणी दें।
ऊपर क्लिक कर देखें कि इस कविता पर किसने क्या कहा?
Saturday, October 31, 2009
देख तेरे एन-आर-आई की हालत
देख तेरे एन-आर-आई की हालत
क्या हो गई भगवान
कितना बदल गया शैतान
कितना बदल गया शैतान
हंस की चाल कौआ ज्यों चलता
मूँछ मुड़ा बंदा ये विचरता
खान-पान, परिधान ये बदले
बोल-चाल व नाम भी बदले
बदले ये पहचान
अपनी धरोहर न अपनाना चाहे
दूर-दूर उससे रहना चाहे
भूल चुका जो अपनी ज़ुबाँ को
मान न दे जो अपनी माँ को
एन-आर-आई वो संतान
पढ़ा लिखा के देश ने सींचा
फल वो पाए जो दे दे वीसा
ऐसी कैसी कौम ये ईश्वर
देश की निंदा करे निरंतर
कहे भारत श्मशान
जहाँ भी देखे रुपया-पैसा
वहीं पे डाले अपना डेरा
सूट में लेकिन लगे भिखारी
जिसमें नहीं स्वाभिमान
बन के मेहमां देश में आए
एक भी दमड़ी खर्च न पाए
तरह-तरह की बात बनाए
अपने जहाँ के गीत वो गाए
गाए गौरों के गुणगान
सुख-सुविधा का इतना आदी
बुरी लगे उसे अपनी माटी
माँ के हाथ का खा ना पाए
पानी हलक से उतर ना पाए
करे तुरंत प्रस्थान
सिएटल | 425-898-9325
31 अक्टूबर 2009
(प्रदीप से क्षमायाचना सहित)
Posted by Rahul Upadhyaya at 11:16 PM
आपका क्या कहना है??
2 पाठकों ने टिप्पणी देने के लिए यहां क्लिक किया है। आप भी टिप्पणी दें।
ऊपर क्लिक कर देखें कि इस कविता पर किसने क्या कहा?
Monday, October 26, 2009
हाय! क्या चीज है एन-आर-आई भी
नाम भी, काम भी, कमाई भी
हाय! क्या चीज है एन-आर-आई भी
इसी को शायद कहते हैं ख़ुदा की नेमत
कि केक खाई भी और केक बचाई भी
बात-बात में ले आते हैं देश की बात
कभी करते हैं बड़ाई तो कभी बुराई भी
शाने-वतन में है कुछ इनका भी हाथ
कभी बढ़ाई तो कभी घटाई भी
कल तलक जो थे बाप-दादा के दुश्मन
आज उन्हीं के बन बैठे घर-जमाई भी
भूख बढ़ती है तो बढ़ती ही चली जाती है
जेब में है लाख मगर छूटती नहीं एक पाई भी
शौच का ढंग जो बदला तो बदली सोच भी साथ
हाय किस मिट्टी का बना है एन-आर-आई भी
कैसा भावुक है ये एन-आर-आई यारो
कभी देता है मुझे गाली तो कभी बधाई भी
सिएटल 425-898-9325
26 अक्टूबर 2009
(फ़िराक गोरखपुरी से क्षमायाचना सहित)
Posted by Rahul Upadhyaya at 11:11 PM
आपका क्या कहना है??
3 पाठकों ने टिप्पणी देने के लिए यहां क्लिक किया है। आप भी टिप्पणी दें।
ऊपर क्लिक कर देखें कि इस कविता पर किसने क्या कहा?
Labels: Anatomy of an NRI, new, nri, parodies
Wednesday, October 21, 2009
एच-वन से भरी मेरी सी-वी
एच-वन से भरी मेरी सी-वी
मजबूर करे पीसने के लिए
पागल सा भटकता रहता हूँ
सही दाम पे मैं बिकने के लिए
मिलियन्स बनाउँगा मैं भी कभी
मैं भी अमीर कहलाऊँगा
हर ज़रूरत जब होगी पूरी
तब लौट के घर मैं जाऊँगा
घर बार सभी मैं तजता हूँ
सपनों के पीछे जगने के लिए
निर्धन की तरह मैं रहता हूँ
पाई-पाई मैं गिनता हूँ
फ़्री में कोई कुछ भी बाँटे
मैं हाथ फ़ैलाए फिरता हूँ
आईस-क्रीम का एक स्कूप ही काफ़ी है
घंटों लम्बी लाईन में लगने के लिए
सिएटल 425-898-9325
21 अक्टूबर 2009
(इंदीवर से क्षमायाचना सहित)
================================
एच-वन = H1; सी-वी = CV = Curriculum Vitae
मिलियन्स = millions; फ़्री = free
आईस-क्रीम = ice-cream; स्कूप = scoop; लाईन = line
Posted by Rahul Upadhyaya at 11:40 PM
आपका क्या कहना है??
1 पाठक ने टिप्पणी देने के लिए यहां क्लिक किया है। आप भी टिप्पणी दें।
ऊपर क्लिक कर देखें कि इस कविता पर किसने क्या कहा?
Tuesday, October 20, 2009
शुभकामनाओं की मियाद
साल दर साल
मन में उठता है सवाल
शुभकामनाओं की मियाद
क्यूं होती है बस एक साल?
चलो इसी बहाने
पूछते तो हो
एक दूसरे का हाल
साल दर साल
जब जब आता नया साल
Posted by Rahul Upadhyaya at 10:38 PM
आपका क्या कहना है??
5 पाठकों ने टिप्पणी देने के लिए यहां क्लिक किया है। आप भी टिप्पणी दें।
ऊपर क्लिक कर देखें कि इस कविता पर किसने क्या कहा?
Labels: festivals
Wednesday, October 14, 2009
शुभ दीपावली
Posted by Rahul Upadhyaya at 4:02 PM
आपका क्या कहना है??
5 पाठकों ने टिप्पणी देने के लिए यहां क्लिक किया है। आप भी टिप्पणी दें।
ऊपर क्लिक कर देखें कि इस कविता पर किसने क्या कहा?
Labels: Diwali
Friday, October 9, 2009
मनमोहक दृश्य
बहारें रंग भरती हैं
कोहरा रंग चुराता है
भरने-लुटने के संवाद में
पत्तियों का रूप मनोरम हो जाता है
बावला बाबुल
वात्सल्य का अंधा
समझ नहीं कुछ पाता है
शाख बढ़ा कर
हाथ हिला कर
शू-शू करता जाता है
नटखट कोहरा
बाज न आए
इत-उत मंडराता है
कभी इधर से
कभी उधर से
पत्तियों को छूता जाता है
देख कुदरत की ऐसी झाँकी
मन मोहित हो जाता है
कवि हृदय कविता लिखता है
भँवरा गुन-गुन गुण गाता है
सिएटल 425-898-9325
9 अक्टूबर 2009
Posted by Rahul Upadhyaya at 2:10 PM
आपका क्या कहना है??
1 पाठक ने टिप्पणी देने के लिए यहां क्लिक किया है। आप भी टिप्पणी दें।
ऊपर क्लिक कर देखें कि इस कविता पर किसने क्या कहा?
