Sunday, August 6, 2017

सब समझ जाती हो

______,


चाँद कहूँ

तो उसमें भी दाग़ है


सूरज कहूँ

तो उसमें भी आग है


ऑक्सीजन कहूँ 

तो पहाड़ों में कम हो जाती हो


परिजन कहूँ 

तो अपेक्षाएँ बढ़ जातीं हैं

उपेक्षाएँ नज़र आतीं हैं


कुछ कहूँ 

तो सब समझ जाती हो


6 अगस्त 2017

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Friday, July 28, 2017

भरा हुआ अर्ध विराम (2)



मैं झूठ नहीं बोलूँगा 

कि झूठ अच्छा नहीं लगता


सपने किसे अच्छे नहीं लगते?


28 जुलाई 2017

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अर्ध विराम = ;

भरा हुआ अर्ध विराम = pregnant pause

(2) - इस श्रंखला की दूसरी कड़ी


Thursday, July 27, 2017

प्रकाश ही प्रकाश है

सूरज उगता है

सूरज डूबता है

हर क्षण

बारह घंटे की दूरी पर


फिर कैसा दिन?

और कैसी रात?


फिर सुबह होगी ... 

एक भद्दा मज़ाक़ है


सूरज है आत्मा

धरती है माया

जो

जो है नहीं, वो दिखाती है

ख़ुद ही मुँह चुराती है

और सूरज को दोषी ठहराती है


दिन है, रात है

सुबह है, शाम है


बस

प्रकाश ही प्रकाश है


27 जुलाई 2017

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Wednesday, July 26, 2017

भरा हुआ अर्ध विराम (1)

तुमने कभी नदी को सागर से मिलते देखा है?

नदी फैल सी जाती है

सागर उमड़ता आता है


तुमने कभी किसी को बाँहों में भरते देखा है?

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अर्ध विराम = ;

भरा हुआ अर्ध विराम = pregnant pause

(1) - इस श्रंखला की पहली कड़ी


Tuesday, July 25, 2017

पग-पग का है अहसास मुझे

क्या भूलूँ 

क्या मैं याद करूँ 

पग-पग का है अहसास मुझे


कई प्रधानमंत्री गए

कई प्रधानमंत्री आए

कई राष्ट्रपति गए

कई राष्ट्रपति आए

इन सब का मुझे कोई भास नहीं 

पर

कब किसने मेरी बाँह थामी

कब किसका मैंने साथ दिया

इन सबका है अहसास मुझे

पग-पग का है अहसास मुझे


चला था नीड़ से नीड़ निर्माण की ओर

पता चला कब टूटी डोर

रात भयावह सी आती है

माँ की ममता चीत्कारती है

सुबह होते-होते

तस्वीर बदल सी जाती है

घड़ी के काँटों में मैं फँस जाता हूँ

कब ह्रास हुआ

कब हास हुआ

इन सबका है अहसास मुझे

पग-पग का है अहसास मुझे


क्या कर्म मेरा

क्या वर्ण मेरा

उत्तर क्या

ये प्रश्न मेरा


पश्चिम में क्यूँ पूरब के ख़्वाब आते

घर होते हुए क्यूँ हम बेघर हो जाते


एक-एक प्रश्न है याद मुझे

पग-पग का है अहसास मुझे


क्या भूलूँ 

क्या मैं याद करूँ 

पग-पग का है अहसास मुझे


(घर छोड़ने की 35 वीं वर्षगाँठ पर)

25 जुलाई 2017

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नीड़ = घोंसला, घर

ह्वास = घिस जाना, कम हो जाना, घट जाना

हास = परिहास, हँसी




Friday, June 30, 2017

इन्द्रधनुष का गणित

इन्द्रधनुष का गणित

जबसे समझ में आया

गार्डन होज़ के फ़व्वारे को

घुमा-फिरा के 

इन्द्रधनुष बना लेता हूँ


अब वो मज़ा कहाँ

भाग-भाग के

देखने का

दिखाने का

अड़ोसी-पॾोसी को

बताने का


अब रंगीं खिलौने भी

बेरंग से लगते हैं

जादूगरी के वीडियों भी

बचकाने से लगते हैं


वही कबूतर

वही रूमाल

वही लड़की

वही आरी


सब कुछ वही है

कुछ भी नया नहीं है


ग़म और ख़ुशी 

सब देख चुके हैं

पॉवर बदलते

बाईफोकल लैंस


कभी बहुत दु: हुआ था

छतरी के खोने पे

आज कोई इंसान भी चला जाए

तो सोचता हूँ

क्या रखा है रोने-धोने में 


इन्द्रधनुष का गणित

जबसे समझ में आया ...


30 जून 2017

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Friday, June 23, 2017

फ़ेसबुक की तरह हँसता ही रहा हूँ मैं

फ़ेसबुक की तरह

हँसता ही रहा हूँ मैं 

कभी इस 'पोज़' में 

कभी उस 'पोज़' में 

हँसता ही रहा हूँ मैं 


मैं देता रहा

ख़ुशख़बरियाँ कई

मेरी बात मेरे

मन ही में रही

यूँही घुट-घुट के

यूँही झूठमूठ में 

हँसता ही रहा हूँ मैं 


कैसे जुड़ गया

कैसे जोड़ा गया

किस-किससे मुझे

फिर जोड़ा गया

कभी इस गुट में 

कभी उस गुट में 

हँसता ही रहा हूँ मैं 


अपनों की सुनूँ 

या कि ग़ैरों की

हर तरफ़ है फ़ौज 

बे-सर-पैरों की

कभी इस तर्क पे

कभी उस तर्क पे

हँसता ही रहा हूँ मैं 


(रवीन्द्र जैन से क्षमायाचना सहित)

23 जून 2017

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