Monday, October 9, 2017

उसे भूल जाऊँ ये मुमकिन नहीं है

उसे भूल जाऊँ 

ये मुमकिन नहीं है

उसे याद आऊँ 

ये मुमकिन नहीं है


सफ़र में मिलेंगे

चेहरे हज़ारों 

उसे देख पाऊँ 

ये मुमकिन नहीं है


सुनूँगा तराने

महफ़िलों में लाखों 

उसे सुन पाऊँ 

ये मुमकिन नहीं है


शब हो, सुबह हो

यहाँ हो, वहाँ हो

उसे दूर पाऊँ 

ये मुमकिन नहीं है


जाम है, साक़ी

सुराही कहीं है

होश में मैं आऊँ 

ये मुमकिन नहीं है


9 अक्टूबर 2017

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Saturday, September 30, 2017

जीत कर भी कौन जीता है

जीत कर भी कौन जीता है

आज जीते

कल हारे

यूँही घटनाक्रम चलता है

कोई भी समाधान स्थायी नहीं है


समाधान स्थायी होते

तो दशावतार नहीं होते


यह तो हम ही हैं

जो उत्सव मनाने को

लालायित रहते हैं

हर जीत को याद करके

हर्षित होते हैं


यह हम पर निर्भर है कि

हम पूरा चित्र देखें

और स्थितप्रज्ञ रहें

या 

छोटी-छोटी ख़ुशियाँ मनाते रहें

और दुखों पे आँसू बहाते रहें


विजयदशमी, 2017

30 सितम्बर 2017

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Tuesday, September 26, 2017

उसूलों से इंसाँ बनता है

उसूलों से इंसाँ बनता है

ईंटों से मकाँ बनता है

जब दिलवाले मिल जाए

ख़ूबसूरत समां बनता है


साक़ी पिलाता है

और हम पीते जाते हैं

अपने हाथों से 

जाम कहाँ बनता है


हमारी-तुम्हारी समझ

बस इतनी है प्यारे

कि जो भी बनता है

सब यहाँ बनता है


ये चाँद, ये तारे

ये नक्षत्र सारे

जाने क्या-क्या

तमाम वहाँ बनता है


स्वर्ग है कोई

नर्क है कोई

जैसा हो मन

वैसा जहाँ बनता है


26 सितम्बर 2017

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Saturday, September 23, 2017

सामाँ फेंका तो कश्ती हल्की हो गई

सामाँ फेंका तो कश्ती हल्की हो गई

तूफ़ाँ आया तो लगा ग़लती हो गई


क्या सही, क्या ग़लत, क्या पता

ख़ुश हुआ, जब बात मन की हो गई


सूरज हो, चाँद हो, या चराग हो कोई

जब भी आँख खोली, रोशनी हो गई


फ़ार्म भरा, फ़ीस दी, फोन किया

बैठे-बिठाए ही ज़िन्दगी में भर्ती हो गई


जब स्कूल में था, तो सोचा था कि

एक दिन लगेगा कि छुट्टी जल्दी हो गई


23 सितम्बर 2017

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यादों की किताब

यादों की किताब

के पन्ने

कभी हवा खोल देती है

कभी मैं 


कभी गुनगुनाता हूँ

कभी मुस्कुराता हूँ

कभी हड़बड़ा के

किताब बंद कर देता हूँ


किताब

पुरानी हो चली है

जर्जर हो गई है

जिल्द खुल रही है

सिलाई उधड़ रही है

पन्ने बिखर रहे हैं

कुछ खो गए हैं

कुछ फट गए हैं


सोचता हूँ

कुछ पन्ने सहेज लूँ


कविताओं में


23 सितम्बर 2017

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Thursday, August 17, 2017

क्यूँ मन्दिर बने

क्यूँ मन्दिर बने

क्यूँ मस्जिद बने

बने तो बने

एक चौखट बने

जहाँ पे जाके

सबका सर झुके

कृतज्ञता में 

विनम्रता से


भजन हो

भोजन ही हो

किसी भूखे की

जहाँ भूख मिटे

अजान हो

सुजान ही हो

किसी खोए को

जहाँ राह मिले


जहाँ किसीका 

किसी पे हाथ उठे

उठे तो उठे

कुछ देने के लिए

उठे तो उठे

कुछ पाने के लिए

कृतज्ञता में 

विनम्रता से


क्यूँ कुछ बने

जो कल को टूटे ...


17 अगस्त 2017

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Sunday, August 6, 2017

सब समझ जाती हो

______,


चाँद कहूँ

तो उसमें भी दाग़ है


सूरज कहूँ

तो उसमें भी आग है


ऑक्सीजन कहूँ 

तो पहाड़ों में कम हो जाती हो


परिजन कहूँ 

तो अपेक्षाएँ बढ़ जातीं हैं

उपेक्षाएँ नज़र आतीं हैं


कुछ कहूँ 

तो सब समझ जाती हो


6 अगस्त 2017

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