Tuesday, May 15, 2018

वो साथ न होकर भी साथ हो

ग़म और ख़ुशी के पल याद आना अच्छा लगता है

बे-सर-पैर का गाना गाना अच्छा लगता है

टहलते-टहलते भटक जाना अच्छा लगता है

फूल-पत्ते-चाँद-सितारे सबसे अपनापन लगता है


वो साथ होकर भी साथ हो

सब अच्छा लगता है


15 मई 2018

सिएटल

Monday, May 14, 2018

मैं जिस थाली में खाता हूँ

मैं जिस थाली में खाता हूँ

उस में तो छेद नहीं करता हूँ

पर दाल में कुछ काला है

कहने से नहीं डरता हूँ


आईना देखता हूँ, दिखाता हूँ

कसौटी पे सबको कसता हूँ


दूसरों के जूते पहनने की आदत है

'डेविल' का एडवोकेट बना फिरता हूँ


जिस पर वाह करनी है, उस पर वाह करता हूँ

किसीकी नहीं परवाह करता हूँ


मैं स्टीव जॉब्स तो नहीं 

लेकिन अपनी एक की दुनिया में 

ख़ुद से ख़ुश रहता हूँ


14 मई 2018

सिएटल

Sunday, May 13, 2018

मात्र दिवस

आज मातृ-दिवस पर

माँ पर कई कविताएँ आईं

मैंने एक भी नहीं पढ़ी 


पढ़ता तो दु: होता

लज्जित होता

ख़ुद को कोसता

कि

मैंने अपनी माँ को

इतना ऊँचा दर्जा नहीं दिया

इतना महिमामण्डित नहीं किया

जितना इन कविताओं में होता


माँ को बस माँ ही समझा

देवी माना

पूजा की

जब से देखा 

माँ ही समझा

माँ ही जाना


पत्नी-बेटी-बहन भी हैं वो

लेकिन उन आयामों को मैं क्या समझूँ

जब से देखा 

माँ ही समझा

माँ ही जाना


फूल लाया 

उपहार दिए

हर रोज़ की तरह उनसे दु:-सुख की बात की

हमेशा की तरह उन्होंने आशीर्वाद दिए


मातृ-दिवस

हम माँ-बेटे के कैलेण्डर में 

रहा हर दिन की तरह

मात्र दिवस


13 मई 2018

सिएटल


Saturday, May 12, 2018

May 13 हूँ

May 13 हूँ

तू Mary है

ये सच है 

या सिर्फ़ शब्दों की हेरा-फेरी है?


क्योंकि 

यूँ देखो तो smiles के s के बीच की दूरी मील नहीं 

Heart के बीच में होता कान नहीं 

और लाभ का उल्टा भला नहीं 


सब तिकड़म है कुछ और नहीं 

हर अक्षर से कई शब्द बनते है

हर शब्द के कई मायने होते हैं 

और हेरा-फेरी भी करने लगो

तो अर्थ का होता अनर्थ है

जैसे 

slaughters में दिख जाती दवाई है

और poison में कहते बेटा है

अरे! ऐसा भी कहीं होता है?


मेरी मानो तो

शब्दों की गिरफ़्त से निकलो

मन की भावनाओं को समझो


मन अच्छा हो

तो कठौती में गंगा है

वरना पाँचसितारा भी 

खटकता है


सिडनी में होती है ख़ुशहाली 

और शंघाई में सर दुखता है


12 मई 2018

सिएटल



Tuesday, May 8, 2018

सभी कुछ है दुनिया में

सभी कुछ है दुनिया में 

मगर ये कमी है

कि आँखों में इसकी

मुरव्वत नहीं है


मोहब्बत तो करते हैं

मोहब्बत करने वाले

मोहब्बत है कहने की

इजाज़त नहीं है


जो सच है वही हम

कहते हैं देखो

ये शिकवा-शिकायत-

अदावत नहीं है


समन्दर है दरिया में 

सच तो यही है

बादल के पानी का स्रोत

ऐरावत नहीं है


शरीफ़ों की नगरी में 

शरीफ़ ही शरीफ़ हैं

बस गले मिल के रोने की

फ़ुरसत नहीं है


(शैलेन्द्र से क्षमायाचना सहित)

8 मई 2018

सिएटल


मुरव्वत = मानवता

अदावत = दुश्मनी

ऐरावत = इन्द्र का हाथी


Saturday, May 5, 2018

मेरे पिता का नाम

भारत में होता

भारत में रहता

भारतीय होता

भारतीय पासपोर्ट होता

तो

मेरे साथ

मेरे पिता का नाम भी होता


अब कोई नहीं जानता

मेरे सिवा

मेरे पिता का नाम


5 मई 2018

सिएटल


Friday, April 27, 2018

अँगूठे

हम सब एक हैं

कोई भी धर्म हो

देश हो

जात हो

उम्र हो

लिंग हो

सबके सब

स्मार्टफ़ोन में 

मुँह छुपाए

रहे आँखें सेंक हैं


लेकिन मेरी मम्मी और मामी जैसे भी अनेक हैं

जिनमें अभी भी विवेक है

या यूँ  कहिए कि ज़्यादा पढ़े-लिखे नहीं हैं

इसलिए अँगूठे दिए नहीं टेक हैं 


27 अप्रैल 2018

सिएटल