Thursday, November 26, 2009

जन्म

जन्म के पीछे कामुक कृत्य है
यह एक सर्वविदित सत्य है

कभी झुठलाया गया
तो कभी नकारा गया
हज़ार बार हमसे ये सच छुपाया गया

कभी शिष्टता के नाते
तो कभी उम्र के लिहाज से
'अभी तो खेलने खाने की उम्र है
क्या करेंगे इसे जान के?'

सोच के मंद मुस्करा देते थे वो
रंगीन गुब्बारे से बहला देते थे वो

बढ़े हुए तो सत्य से पर्दे उठ गए
और बच्चों की तरह हम रुठ गए
जैसे एक सुहाना सपना टूट गया
और दुनिया से विश्वास उठ गया

ये मिट्टी है, मेरा घर नहीं
ये पत्थर है, कोई ईश्वर नहीं
ये देश है, मातृ-भूमि नहीं
ये ब्रह्मांड है, ब्रह्मा कहीं पर नहीं

एक बात समझ में आ गई
तो समझ बैठे खुद को ख़ुदा
घुस गए 'लैब' में
शांत करने अपनी क्षुदा

हर वस्तु की नाप तोल करे
न कर सके तो मखौल करे

वेदों को झुठलाते है हम
ईश्वर को नकारते है हम
तर्क से हर आस्था को मारते हैं हम

ईश्वर सामने आता नहीं
हमें कुछ समझाता नहीं

कभी शिष्टता के नाते
तो कभी उम्र के लिहाज से
'अभी तो खेलने खाने की उम्र है
क्या करेंगे इसे जान के?'

बादल गरज-बरस के छट जाते हैं
इंद्रधनुष के रंग बिखर जाते है

सिएटल,
26 नवम्बर 2007
(मेरा जन्म दिन)

Thursday, November 19, 2009

मणियाँ

फूलों की बगिया ज्यों किश्तों में खिलती है
इंसां की किस्मत भी किश्तों में जगती है

भला छाते ही बादल कहीं बरखा भी होती है?
होने-बरसने में यारो इक उम्र गुज़रती है

मिलना-बिछड़ना, व हँसना व रोना
इन के ही मिश्रण से शख़्सियत निखरती है

जब आता है संकट, हम खुद को परखते हैं
और मूल्यों-विश्वासों की दुनिया सँवरती है

जब होता है मन का, तो लगता है अच्छा
जब मन का न हो, तभी तो मणियाँ निकलती हैं

सिएटल
19 नवम्बर 2009

Monday, November 16, 2009

मेरी कलम

कोई पूछे कि न पूछे
ये कलम मुझको बुलाती है
हर मोड़ पे, हर हाल में
ये गीत सुनाती है

शमा जलती है, बुझती है
मिट जाती है जल कर
दिनकर आ के, जगमगा के
चला जाता है थक कर
इक कलम ही है
जो दु:ख-सुख में
मेरा साथ निभाती है

ताज हो, तख्त हो, दौलत हो
ज़माने भर की
उस पे बंदिश कि
न कहो बात अपने मन की
ऐसी ज़िंदगी भी कहीं
ज़िंदगी कही जाती है

कोई पक्षपात करे, द्वेष करे
जाल बिछाए
कोई नेता हो, अभिनेता हो
या लाख कमाए
सब के वादों को, इरादों को
ये साफ दिखाती है

कोई रूठे, कोई फूले
या कोई आँख दिखाए
बन के यमदूत भी
'गर आप मुझे लाख डराए
ये न रूकी है
न रुकती है
न रोकी जाती है

सिएटल
16 नवम्बर 2009

Friday, November 6, 2009

जहाँ हूँ मैं वहीं उसका ठिकाना है

जहाँ से हम आए हैं
वहीं हमें जाना हैं
ज़मीं से आए हैं
ज़मी में समाना है

रंगीं हो पत्ते
या काले हो बादल
अंत तो सभी का
वही पुराना है

बड़े से आसमां में
मैं ढूंढता था जिसको
टेका जो माथा तो
उसे यहीं पे जाना है

अब गली-गली हाथ फैलाए
मैं भीख मांगूँगा नहीं
क्योंकि कदमों तले मेरे
गड़ा खजाना है


'गर होता वो उपर
तो सोचो आस्ट्रेलिया का क्या होता?
जहाँ हूँ मैं
वहीं उसका ठिकाना है

सिएटल 425-898-9325
6 नवम्बर 2009

Saturday, October 31, 2009

देख तेरे एन-आर-आई की हालत

देख तेरे एन-आर-आई की हालत

क्या हो गई भगवान

कितना बदल गया शैतान

कितना बदल गया शैतान


हंस की चाल कौआ ज्यों चलता

मूँछ मुड़ा बंदा ये विचरता

खान-पान, परिधान ये बदले

बोल-चाल व नाम भी बदले

बदले ये पहचान


अपनी धरोहर न अपनाना चाहे

दूर-दूर उससे रहना चाहे

भूल चुका जो अपनी ज़ुबाँ को

मान न दे जो अपनी माँ को

एन-आर-आई वो संतान


पढ़ा लिखा के देश ने सींचा

फल वो पाए जो दे दे वीसा

ऐसी कैसी कौम ये ईश्वर

देश की निंदा करे निरंतर

कहे भारत श्मशान


जहाँ भी देखे रुपया-पैसा

वहीं पे डाले अपना डेरा

धन माया का है वो पुजारी

सूट में लेकिन लगे भिखारी

जिसमें नहीं स्वाभिमान


बन के मेहमां देश में आए

एक भी दमड़ी खर्च न पाए

तरह-तरह की बात बनाए

अपने जहाँ के गीत वो गाए

गाए गौरों के गुणगान


सुख-सुविधा का इतना आदी

बुरी लगे उसे अपनी माटी

माँ के हाथ का खा ना पाए

पानी हलक से उतर ना पाए

करे तुरंत प्रस्थान


सिएटल | 425-898-9325

31 अक्टूबर 2009

(प्रदीप से क्षमायाचना सहित)

Monday, October 26, 2009

हाय! क्या चीज है एन-आर-आई भी

नाम भी, काम भी, कमाई भी
हाय! क्या चीज है एन-आर-आई भी

इसी को शायद कहते हैं ख़ुदा की नेमत
कि केक खाई भी और केक बचाई भी

बात-बात में ले आते हैं देश की बात
कभी करते हैं बड़ाई तो कभी बुराई भी

शाने-वतन में है कुछ इनका भी हाथ
कभी बढ़ाई तो कभी घटाई भी

कल तलक जो थे बाप-दादा के दुश्मन
आज उन्हीं के बन बैठे घर-जमाई भी

भूख बढ़ती है तो बढ़ती ही चली जाती है
जेब में है लाख मगर छूटती नहीं एक पाई भी

शौच का ढंग जो बदला तो बदली सोच भी साथ
हाय किस मिट्टी का बना है एन-आर-आई भी

कैसा भावुक है ये एन-आर-आई यारो
कभी देता है मुझे गाली तो कभी बधाई भी

सिएटल 425-898-9325
26 अक्टूबर 2009
(
फ़िराक गोरखपुरी से क्षमायाचना सहित)

Wednesday, October 21, 2009

एच-वन से भरी मेरी सी-वी

एच-वन से भरी मेरी सी-वी
मजबूर करे पीसने के लिए
पागल सा भटकता रहता हूँ
सही दाम पे मैं बिकने के लिए

मिलियन्स बनाउँगा मैं भी कभी
मैं भी अमीर कहलाऊँगा
हर ज़रूरत जब होगी पूरी
तब लौट के घर मैं जाऊँगा
घर बार सभी मैं तजता हूँ
सपनों के पीछे जगने के लिए

निर्धन की तरह मैं रहता हूँ
पाई-पाई मैं गिनता हूँ
फ़्री में कोई कुछ भी बाँटे
मैं हाथ फ़ैलाए फिरता हूँ
आईस-क्रीम का एक स्कूप ही काफ़ी है
घंटों लम्बी लाईन में लगने के लिए

सिएटल 425-898-9325
21 अक्टूबर 2009
(
इंदीवर से क्षमायाचना सहित)
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एच-वन = H1; सी-वी = CV = Curriculum Vitae
मिलियन्स = millions; फ़्री = free
आईस-क्रीम = ice-cream; स्कूप = scoop; लाईन = line