आप जाने की ज़िद न करो
यूँही डॉलर कमाते रहो
हाय, मर जाएंगे
हम तो लुट जाएंगे
ऐसी बातें किया न करो
खुद ही सोचो ज़रा, क्यों न रोकेंगे हम?
जो भी जाता है रो-रो के आता है फिर
आपको अपनी क़सम जान-ए-जां
बात इतनी मेरी मान लो
आप जाने की ...
कद्र करते हैं देश की बहुत हम मगर
चंद डॉलर यही हैं जिनसे कुछ शान है
इनको खोकर कहीं, जान-ए-जां
उम्र भर न तरसते रहो
आप जाने की ...
कितना कुछ पाया हमने आ के यहाँ
कार और घर की चाबी भी है हाथ में
कल भटकना क्यूँ दर-दर जान-ए-जां
बात मानो यहीं पे रहो
आप जाने की …
सिएटल 425-898-9325
1 जुलाई 2009
(फ़ैयाज़ हाशमी से क्षमायाचना सहित)
Wednesday, July 1, 2009
आप जाने की ज़िद न करो
Posted by Rahul Upadhyaya at 11:49 PM
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Friday, June 26, 2009
पिछले दो दिन से
पिछले दो दिन से
मेरा मोबाईल फोन
बंद पड़ा है
मैसेंजर पर स्टेटस
इनविज़िबल है
और खुफ़िया एकाउंट की
ईमेल चेक नहीं की है
इन सब की वजह सिर्फ़ एक है:
गवर्नर सेनफ़र्ड का
फूट-फूट कर बयान देना
सिएटल 425-445-0827
26 जून 2009
==================
मैसेंजर = messenger
इनविज़िबल = invisible
एकाउंट = account
चेक = check
Posted by Rahul Upadhyaya at 1:31 PM
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Thursday, June 4, 2009
जबसे वो कमाने लगे हैं
जबसे वो कमाने लगे हैं
आँखें हमें दिखाने लगे हैं
गुरूर तो कुछ पहले भी था
अब धौंस भी जमाने लगे हैं
डर है कहीं बिगड़ जाए न वो
बनाने में जिसे ज़माने लगे हैं
अहसान जो किए थे हमने उनपे
धीरे-धीरे सब याद आने लगे हैं
वो फोन भी नहीं उठाते हमारा
हम नखरें उनके उठाने लगे हैं
घोलते थे सांसें सांसों में दो दिल
अब तकियों में मुँह छुपाने लगे हैं
कब तक करेगी फ़्रेम हिफ़ाज़त बिचारी
तस्वीरों से सब रंग अब जाने लगे हैं
सिएटल 425-445-0827
4 जून 2009
Posted by Rahul Upadhyaya at 1:55 PM
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Labels: new, relationship
Wednesday, June 3, 2009
माईक्रोसाफ़्ट लाया बिंग
चीख रहा है चित्र बड़ा सा
मिमिया रहा है रिज़ल्ट
रंगों की नुमाईश है
सर्चर की इंसल्ट
तथ्य के बल पर कर देता है
गुगल ज़रूरत पूरी
पिक्सल-पिक्सल भरना चाहे
एम-एस-एन गागर अधूरी
गुगल ऐसा शब्द है
जिससे लाखों हैं परिचित
बच्चे-बूढ़े हर कोई गाए
इसके गुण अमित
बदल-बदल के नाम कई सारे
माईक्रोसाफ़्ट लाया बिंग
एक दिन ऐसे गायब होगा
जैसे गधे के सर से सींग
पिक्सल-पिक्सल जोड़ के बनाए
एक सुंदर सा चित्र
सुंदर-सुंदर चित्र देख कर शायद
एकाध जाए पसीज
बड़ा हुआ तो क्या हुआ
ये है माईक्रोसाफ़्ट
इन्नोवेशन का नाम नहीं है
प्रोडक्ट थर्ड क्लास
सिएटल 425-445-0827
3 जून 2009
====================
रिज़ल्ट = result; सर्चर = searcher; इंसल्ट = insult; गुगल = Google; पिक्सल = pixel ; एम-एस-एन = msn; बिंग = bing; माईक्रोसाफ़्ट = Microsoft; इन्नोवेशन = innovation; प्रोडक्ट = product; थर्ड क्लास = third class
Posted by Rahul Upadhyaya at 4:59 PM
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Labels: digital age, news
Saturday, May 30, 2009
मिमिया रहा है काव्य
चीख रहे हैं चित्र सारे
मिमिया रहा है काव्य
रंगों की नुमाईश है
साहित्य का दुर्भाग्य
शब्द के बल पर जो कह देती थी
अपने मन की बात
पिक्सल-पिक्सल मर रही है
फोटोशॉप्पर के हाथ
माँ एक ऐसा शब्द है
जिसमें सैकड़ो अर्थ निहित
फोटो जोड़ा साथ में
अर्थ हुए सीमित
जिसे पढ़ के सुन के होते थे
पाठक-श्रोता भाव-विभोर
पलट-पलट के ग्लॉसी पन्ने
हो रहे हैं बोरम्-बोर
एक हज़ार शब्द के बराबर
होता होगा एक अकेला चित्र
लेकिन एक भी ऐसा चित्र नहीं
जो समझा सके कबीर का कवित्त
बड़ा हुआ तो क्या हुआ
जैसे पेड़ खजूर
लिखते आज कबीर तो क्या
साथ में होता पेड़ हुज़ूर?
सिएटल 425-445-0827
30 मई 2009
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पिक्सल = pixel ; फोटोशॉप्पर = photoshopper;
ग्लॉसी = glossy; बोर = bore
Posted by Rahul Upadhyaya at 10:38 AM
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Labels: digital age, new, world of poetry
Friday, May 29, 2009
जय रघुबीर
बात-बात पर आप क्यूँ
मचा रहें उत्पात
पहले सम्हालिए देवता
फिर करें नेताओं की बात
जिन्हें आप हैं पूजते
वे भी करते थे भाई-भतीजावाद
कैकयी की एक ज़िद पर
कर दिया अयोध्या बर्बाद
कैकयी जिन्हें थी चाहतीं
वे ही बने युवराज
सोनिया जिन्हें हैं चाहतीं
क्यों न करें वे राज?
सोनिया की भारतीयता पर
उचित नहीं कोई प्रहार
कैकयी भी नहीं थीं रघुवंश की
वे थीं एक पराई नार
न कृष्ण ने पूजा राम को
न अर्जुन गए राम-मंदिर
फिर भी आप आज भी
क्यों भजते हैं जय रघुबीर?
त्रेतायुग हो, द्वापर युग हो
या फिर हो सतयुग
हर युग का अपना एक ढंग है
हर युग का है एक रूप
समय के साथ जो चलते रहें
पहनें उन्होंने हार
लकीर के फ़कीर जो बने रहें
उन्हें मिली है हार
सिएटल 425-445-0827
29 मई 2009
Posted by Rahul Upadhyaya at 10:43 AM
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Wednesday, May 27, 2009
टर्मिनल पेशेंट
कुत्ते हैं
लेकिन एक भी कुत्ता
यहाँ भोंकता नहीं है
पेड़ हैं
लेकिन एक भी पेड़
यहाँ कचरा करता नहीं है
शांति और सफ़ाई के
इस वातावरण में
मैं रहता हूँ ऐसे
जैसे अस्पताल में
रहता हो कोई
खाता हूँ
पीता हूँ
पढ़ता हूँ
सोता हूँ
मनोरंजन के लिए
कभी-कभार देख लेता हूँ टी-वी
बमबारी की ख़बरें देख कर
ख़ुद को रोक पाता नही हूँ
उठाता हूँ रिमोट
और बदल देता हूँ चैनल
मैं
कचरे के डब्बे में बंद
एक सड़ता हुआ पत्ता नहीं हूँ
मैं
मालकिन की गोद में
सोता हुआ एक कुत्ता नहीं हूँ
मैं हूँ इन सबसे अलग
मैं हूँ इन सबसे अलग
एक टर्मिनल पेशेंट
ये अलग बात है कि
दिखने में ऐसा
मैं लगता नहीं हूँ
सिएटल 425-445-0827
27 मई 2009
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टर्मिनल पेशेंट =terminal patient;
टी-वी = TV; रिमोट = remote ; चैनल = channel
Posted by Rahul Upadhyaya at 4:56 PM
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