Monday, October 15, 2018

तीन साल हुए उसे गुज़रे हुए

तीन साल हुए उसे गुज़रे हुए

और लिंकड-इन कह रहा है कि

उसे जन्मदिन की शुभकामनाएँ दूँ


-आई का बस चलता तो

मेरी तरफ़ से शुभकामनाएँ दे भी दी जातीं

वह उन्हें स्वीकार भी लेता और 

मुझसे पूछ भी लेता कि

तुम कैसे हो? सब ठीक चल रहा है


सूक्ष्म तौर पर 

जड़ में चेतन है

या जड़ और चेतन एक ही हैं

और यह उसकी पराकाष्ठा का एक नमूना होता


लेकिन 

वह जो जीता है

महकता है

लहलहाता है

क्षुब्ध होता है

वह स्थूल पुंज है


स्थूल नहीं तो कुछ नहीं 

सिर्फ एक सपाट, लम्बा सन्नाटा


16 अक्टूबर 2018

सिएटल


Saturday, October 13, 2018

दुश्मनी किसी से नहीं

दुश्मनी किसी से नहीं 

बेरूखी सब से हैं

आपका तो मालूम नहीं 

सुखी हम तब से हैं


शाम-सुबह की बात नहीं 

बात हर घड़ी की है

घड़ी चले ना चले

धड़कनें बस में हैं


लेन-देन की कालिख में 

इन्सान कहाँ बचता है

रिश्ता-नाता जो भी कहे

तोड़ लिया मज़हब से है


सिरफिरों की जमात में 

सिर कौन झुकाएगा

कहनेवाले कहते रहे कि

शऊर नहीं हम में हैं


14 अक्टूबर 2018

सैलाना






Tuesday, October 2, 2018

क़ानून?

क़ानून?

क़ानून क्या होता है?

समाज जो चाहे वही होता है

धर्मेन्द्र दो शादी करते हैं

बाल-विवाह आज भी होता है

मन-मर्ज़ी से शादी करने वाले

घरवालों द्वारा मार दिए जाते हैं

रिश्वत दी-ली जाती है

कर-चोरी में हम सब भागीदार हैं


सुप्रीम कोर्ट?

सुप्रीम कोर्ट क्या चीज़ है,

जब हम ख़ुद के बनाए उसूल तोड़ देते हैं

रोज क़सम हम लेते हैं

रोज क़सम हम तोड़ देते हैं 

अपवादों की सूचियाँ लम्बी हैं

कहने को हम कह देते हैं कि

हमारे घर में सबका स्वागत है

लेकिन तब तक जब तक 

जाने का समय तय है

और सब?

सब में वही सब शामिल हैं

जिनके साथ हमारा स्तर मिलता हो


क़ानून की नज़रों में भी सब कहाँ बराबर है?

कोई उपर बैठकर सुनता है

कोई नीचे से जिरह करता है

और बीच में कटघरा मुँह ताकता रहता है


2 अक्टूबर 2018

सिएटल 

Monday, September 24, 2018

ज़िक्र होता है जब क़यामत का

ज़िक्र होता है जब क़यामत का तेरे जलवों की बात होती है

तू जो चाहे तो नोट बदलता है तू जो जागे तो रात होती है


तेरे छप्पन इँची सीने के धोखे में 

देखे थे हमने ख़्वाब कैसे कैसे

'गर करेगा कोई हमला तो

देंगे हम जवाब कैसे-कैसे

अब तो सिर्फ क्रिकेट-विकेट चलता है

और सीमाओं पे वारदात होती है


तेरे कुर्ते-पजामे में हमने

बापू-टेरेसा की सादगी देखी

तेरे भाषण, तेरे तेवर में 

नए ज़माने की ताज़गी देखी

अब जो जाना तो पाया कि दो करोड़ की सम्पत्ति है

और तेरे ही तेरे मन की बात होती है


फिर से आए हैं चुनावों के मौसम

विपक्ष को जिताने के नहीं पक्ष में हैं हम

यह जनतंत्र कैसा षड़यंत्र है

तुझे वोट देने को मजबूर हैं हम

पर कुछ तो कर अच्छे दिनों के लिए

यहाँ तो दिन-दहाड़े ही रात होती है


(आनन्द बक्षी से क्षमायाचना सहित)

24 सितम्बर 2018

सिएटल



Sunday, September 23, 2018

फल की अभिलाषा

चाह नहीं, मैं ट्रक में भर के

गोदामों में पक जाऊँ 

या किसी मेज़ की शोभा बनूँ

और फ़्रीज़ में उम्र बढ़ाऊँ 


चाह नहीं मैं पीस-पिसा के

'जाम' में बदला जाऊँ 

और पाँच सितारा होटल में 

ऊँगलियों पे चाटा जाऊँ 


मुझे छोड़ देना उस पेड़ पर

जिस पर बच्चे पत्थर मारे फेंक

कोई रोके, कोई टोके

कोई मासूमों में भरे विवेक


(माखनलाल चतुर्वेदी से क्षमायाचना सहित)

23 सितम्बर 2018

सिएटल


Wednesday, September 19, 2018

न नक़ली है, न असली है


नक़ली है, असली है

जिसे समझा कली, कली है

मेरे ही अहसासों की मूरत

कभी लगी बुरी, कभी भली है


चलो बनाए सम्बन्ध ऐसे

बंद हों, बन्धन हों

रजनीश की बातें आज भी अमर हैं

भले ही स्वीकारने में थोड़ी कमी है


गंगा-जमना-सरस्वती तलक तो सही था

ब्रह्मपुत्र कहाँ से यहाँ फँस गया ये

समन्दर से मिलने की

इसको क्या पड़ी है?


इशारों-इशारों में कहते हैं जो

इशारों-इशारों में कब समझते हैं वो

अपने ही वादों से मुकरना है जीवन

जो तिल-तिल कटे वही ज़िन्दगी है


19 सितम्बर 2018

सिएटल