Thursday, February 14, 2019

तुम मिलोगी यह सोचकर

तुम मिलोगी यह सोचकर

कुछ लम्हें 

तह लगाकर रखे हैं

ताकि सिलसिलेवार तुम्हें सब सुना सकूँ 

कि कैसे छायागीत पर अपना गीत बजा

चाँद थमा

रात रूकी

आसमाँ झुका

महफ़िल जमी

और एक कविता बही ...


उस कविता के शब्द

तो मैं दुनिया को सुपुर्द कर चुका हूँ

लेकिन उनके सही मायने

तुम ही समझोगी

एक ही साँस में 

जब मैं पढ़ूँगा 

और तुम सुनोगी

हर बिन्दु

हर बिन्दी

हर नुक़्ता 

हर द्विअर्थी शब्द

जो कहा वह भी

जो नहीं कहा वह भी

सब समझ जाओगी


क्या तुम अब भी यही सोचती हो

कि हम

एक दूजे के लिए

नहीं है?


तुम मिलोगी यह सोचकर ...


14 फ़रवरी 2019

सिएटल

Tuesday, February 12, 2019

कितनी नींवें रखी गईं हैं

कितनी नींवें रखी गईं हैं 

कितनी इमारतें ध्वस्त हुईं हैं

हर गली में अंतरराष्ट्रीय मंच है

और हर मोहल्ला एक पीठ


एक-दूसरे की पीठ खुजाते-खुजाते

ही जाती है एक दिन खीज

कि तुमसे ज़्यादा तो हम भले थे

और हम यहाँ तुम्हें पूजने चले थे?


संघ, संस्थाओं की भीड़ बड़ी है

फिर भी हमें कम लगी है

बस बनाकर एक और संगठन

जग का हम अब उद्धार करेंगे

हिन्दी बिचारी डूब रही हैं

इसका बेड़ा हम पार करेंगे


(नाम होगा इतना भयंकर कि

गांधी भी बिचारे रो पड़ेंगे

कि हाय रे इतना युग-परिवर्तक 

नाम मैं क्यों सोच पाया)


हर हिन्दी दिवस पर फूल चढ़ाएँगे

हर वसंत पंचमी पर गीत गूंजेंगे

होली पर हा-हा-ही-ही होगा

दीवाली पर कवि सम्मेलन का स्वाँग भी होगा


कपड़े होंगे रंग-बिरंगे

फ़ोटो में हम ख़ास लगेंगे

बनारसी साड़ी, नेहरू जैकेट, लखनवी कुर्ता

इन सबमें में हम इतिहास रचेंगे


कभी-कभार एक किताब छपेंगी

जोर-शोर से उसका विमोचन होगा

पाठक चाहे दस ही हो लेकिन

समोसे खाने वाले बीस-तीस तो होंगे

जिसे देखो वो बधाई देगा

हाथों-हाथ भूरी-भूरी प्रशंसा करेगा


कभी किसी की षष्ठी-पूर्ति 

को कभी किसी को पुरस्कार वितरण

इन सबका भी इसमें समावेश होगा

सबका साथ, सबका विकास

यही हमारा भी नारा होगा


और फिर किसी बात पर फूट पड़ेगी

कोई हमसे दूर होगा

फिर से एक संस्था जन्मेंगी

फिर से जग का उद्धार होगा


12 फ़रवरी 2019

सिएटल


Monday, February 4, 2019

दो साल में चार दिन ही बचे थे

दो साल में चार दिन ही बचे थे

और सारा देश

ख़ुशी से झूम उठा


क्या राष्ट्रपिता की हत्या का दु: 

इतना अल्पकालिक था?


अल्पकालिक?

महाशय, आपका दिमाग तो सही है?

यहाँ तो चौथे/तेरहवीं पर ही लोग

इधर-उधर की बातें करने लग जाते हैं 

आगामी चुनाव,

पिछले भ्रष्टाचार की

बखिया उधेड़ने लग जाते हैं

व्हाट्सैप पर आए वीडियो

चटखारे लेकर देखने-दिखाने लग जाते हैं


दिन, महीनों, सालों की अवधियों का

अब मोल ही क्या रहा

एक क्षण आप दु: से चूर हैं

तो दूसरे ही क्षण ठहाकों की गूँज है


एक पोस्ट से दूसरी पोस्ट

दूसरी से तीसरी

चक्र चलता रहता है

बेतहाशा 


हम इंसान नहीं 

एक बिसात है

जिसकी पल-पल 

बदलती चाल है


4 फ़रवरी 2019

(बाऊजी की पचासवीं मासिक पुण्यतिथि)

सिएटल

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बिसात = chessboard 


Wednesday, January 23, 2019

किताबें

किताबें तब भी उपयोगी थीं

और आज भी उपयोगी हैं


पहले दरवाज़ा रोकने के काम आती थीं

आजकल मॉनिटर ऊँचा करने में


बहुत पहले

एक समय

वे कवर चढ़ाकर अलमारी में सजाई जाती थीं

ठोकर लग जाने पर सर से लगाई जाती थीं

विद्या मानी जाती थीं


विद्या कब शिक्षा बन गई, कब रोज़गार 

पता ही चला ...


23 जनवरी 2019

सिएटल

Saturday, January 12, 2019

बचपन के साथी हैं पचपन के पार

बचपन के साथी हैं पचपन के पार


मोटी है तोंद और ग़ायब हैं बाल

फिर भी थमी, और हुई तेज़ रफ़्तार 


जीते हैं सब, किसी ने मानी हार

अपनों को खोया, तो पाया ग़ैरों का प्यार


बंगलो के स्वामी, और दो-तीन हैं कार

पासपोर्ट है सबका, भरी सबने उड़ान


मिलते हैं तो लगता है जैसे मिले कल ही थे यार

बिछड़े तो लगता है जाने अब कब होगी मुलाक़ात 


बचपन के साथी है पचपन के पार


12 जनवरी 2019

सिएटल