Monday, May 28, 2018

मैं हूँ नहीं, होने का अहसास हूँ

मैं हूँ नहीं, होने का अहसास हूँ


जिनसे मैं मिलता-जुलता हूँ

फोन पर बातचीत होती है

व्हाट्सैप पर दुआ-सलाम होती है


उन सबको छोड़कर

बाक़ी सब के लिए

यही था

यही हूँ

और यही रहूँगा


चाहे रहूँ 

या ना रहूँ


इसे अमरत्व कहते हैं

अमर होना कहते हैं


——-

कुछ हैं

जिन्हें 

मानव जाति की औसत आयु को

ध्यान में रखते हुए

मैं मान चुका हूँ

कि वे नहीं हैं


जैसे कि

मेरी पाँचवी कक्षा की

प्रिंसिपल मैडम


उनसे मिलना

उनसे सम्पर्क करना

उनके बारे में जानना

मेरे जीवन का हिस्सा कभी नहीं रहा


इसे अपना रास्ता नापना कहते हैं


——

मैं हूँ नहीं, होने का अहसास हूँ


28 मई 2018

सिएटल


Friday, May 25, 2018

जैसा बीज होता है

जैसा बीज होता है, वैसा ही फल होता है

फल, किसी की मेहनत का नहीं फल होता है


खाद का, जल का, किसी का नहीं असर होता है

बीज में ही निहित बीज का भविश्यफल होता है


तरह-तरह के तरूवर, तरह-तरह के पेड़

हर किसी में इसी धूल-मिट्टी-गारे का मिश्रण होता है


सेब बनेगा या संतरा, इसमें माली क्या कर सकता है

बस जी जाए, बड़ जाए, यही तो फ़र्ज़ होता है


टाटा बनाऊँ या बिड़ला, सचिन बनाऊँ या हेमा

बिरला है वो अभिभावक जो इसमें सफल होता है


25 मई 2018

सिएटल


Tuesday, May 15, 2018

वो साथ न होकर भी साथ हो

ग़म और ख़ुशी के पल याद आना अच्छा लगता है

बे-सर-पैर का गाना गाना अच्छा लगता है

टहलते-टहलते भटक जाना अच्छा लगता है

फूल-पत्ते-चाँद-सितारे सबसे अपनापन लगता है


वो साथ होकर भी साथ हो

सब अच्छा लगता है


15 मई 2018

सिएटल

Monday, May 14, 2018

मैं जिस थाली में खाता हूँ

मैं जिस थाली में खाता हूँ

उस में तो छेद नहीं करता हूँ

पर दाल में कुछ काला है

कहने से नहीं डरता हूँ


आईना देखता हूँ, दिखाता हूँ

कसौटी पे सबको कसता हूँ


दूसरों के जूते पहनने की आदत है

'डेविल' का एडवोकेट बना फिरता हूँ


जिस पर वाह करनी है, उस पर वाह करता हूँ

किसीकी नहीं परवाह करता हूँ


मैं स्टीव जॉब्स तो नहीं 

लेकिन अपनी एक की दुनिया में 

ख़ुद से ख़ुश रहता हूँ


14 मई 2018

सिएटल

Sunday, May 13, 2018

मात्र दिवस

आज मातृ-दिवस पर

माँ पर कई कविताएँ आईं

मैंने एक भी नहीं पढ़ी 


पढ़ता तो दु: होता

लज्जित होता

ख़ुद को कोसता

कि

मैंने अपनी माँ को

इतना ऊँचा दर्जा नहीं दिया

इतना महिमामण्डित नहीं किया

जितना इन कविताओं में होता


माँ को बस माँ ही समझा

देवी माना

पूजा की

जब से देखा 

माँ ही समझा

माँ ही जाना


पत्नी-बेटी-बहन भी हैं वो

लेकिन उन आयामों को मैं क्या समझूँ

जब से देखा 

माँ ही समझा

माँ ही जाना


फूल लाया 

उपहार दिए

हर रोज़ की तरह उनसे दु:-सुख की बात की

हमेशा की तरह उन्होंने आशीर्वाद दिए


मातृ-दिवस

हम माँ-बेटे के कैलेण्डर में 

रहा हर दिन की तरह

मात्र दिवस


13 मई 2018

सिएटल


Saturday, May 12, 2018

May 13 हूँ

May 13 हूँ

तू Mary है

ये सच है 

या सिर्फ़ शब्दों की हेरा-फेरी है?


क्योंकि 

यूँ देखो तो smiles के s के बीच की दूरी मील नहीं 

Heart के बीच में होता कान नहीं 

और लाभ का उल्टा भला नहीं 


सब तिकड़म है कुछ और नहीं 

हर अक्षर से कई शब्द बनते है

हर शब्द के कई मायने होते हैं 

और हेरा-फेरी भी करने लगो

तो अर्थ का होता अनर्थ है

जैसे 

slaughters में दिख जाती दवाई है

और poison में कहते बेटा है

अरे! ऐसा भी कहीं होता है?


मेरी मानो तो

शब्दों की गिरफ़्त से निकलो

मन की भावनाओं को समझो


मन अच्छा हो

तो कठौती में गंगा है

वरना पाँचसितारा भी 

खटकता है


सिडनी में होती है ख़ुशहाली 

और शंघाई में सर दुखता है


12 मई 2018

सिएटल