Thursday, April 2, 2020

न किया गिला

न किया गिला 
न किया शिकवा कभी
सर आँखों लिया 
जो भी मिला सिला कभी

हम भी तुम्हें 
बाँहों में लेते
जो होता मेहरबाँ 
तुझपे तेरा खुदा कभी

अब फ़ुरसत ही 
फ़ुरसत है रात-दिन
कोरोना दे राहत तो 
करें तस्सवुर-ए-जानाँ कभी

ये दूरी जो 
आज है सुरक्षा-कवच
क्या बन जाएगी 
न मिलने का बहाना कभी

बेख़ौफ़ है ज़िन्दगी 
और बेख़ौफ़ ही रहेगी
डरता जो राहुल 
घर छोड़ न यूँ आता कभी

राहुल उपाध्याय । 2 अप्रैल 2020 । सिएटल
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Tuesday, March 31, 2020

आँखों में आँखें डाल के

आँखों में आँखें डाल के
आता है जो क़रार 
व्हाट्सैप की दुनिया में 
कहाँ है वो मेरे यार

दहशत की ज़िन्दगी में 
अरमां तो फ़ना होने ही थे
जीते जी मरने का 
नाम ही है दूजा प्यार

क़त्ल करते थे जो मेरा कभी
घरों में बन्द हैं आज
मेरी मौत मेरे ही हाथों
लिखी है लक्ष्मण रेखा पार

मोहब्बत में दम होता
तो मोहब्बत का नाम भी होता
और यूँ न होता तेरा-मेरा
पृथक-पृथक संसार 

किसी एक की ये बात नहीं है
सबका एक ही है हाल
क्या मज़हब और क्या माशूक़ 
सबके बन्द हैं द्वार 

किसकी क़िस्मत किससे अच्छी 
समझ न पाए कोई
जो गुज़र गए वो सुखी हुए
या बचे-खुचे परिवार

शायर हूँ, बदनाम भी
पर क्यूँ डालूँ हथियार
पिक्चर अभी बाक़ी है
जाऊँगा न मान के हार

राहुल उपाध्याय । 31 मार्च 2020 । सिएटल
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Sunday, March 29, 2020

हवा साफ़ है

हवा साफ़ है
बच्चे साथ हैं
चिड़ियों की चहचहाट है
न दिन है, न रात है
चौबीसों घण्टे 
व्हाट्सैप पर 
चुटकुलों की बौछार है
मौज मस्ती करने का
यह नया अंदाज़ है

ऑटो-डिपाज़िट है 
ऑटो-विथड्रॉल है
फ़ोन तो कोई आता नहीं 
मिलने का का क्या सवाल है
आधुनिकीकरण का
हासिल ये परिणाम है

मिडिल क्लास की पिकनिक है
बाक़ी की लग गई वाट है
अमीर के डूब गए स्टॉक्स
ग़रीब की मिट गई आय है
बदलते समय का 
यह नया अायाम है

राहुल उपाध्याय । 29 मार्च 2020 । सिएटल
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Friday, March 13, 2020

मन करता है मैं आनन्द बन जाऊँ

मन करता है
मैं आनन्द बन जाऊँ
ख़ुशियाँ बाँटूँ
हर्ष-उल्लास लाऊँ 
उत्साह जगाऊँ 
मर के अमर हो जाऊँ

फिर सोचता हूँ
कि सबका टायमर तो एक ही है 
यदि सब आनन्द बन गए
तो डॉक्टर कौन बनेगा?
इलाज कौन करेगा?
उसे खाना कौन खिलाएगा
उसे दफ़्तर कौन पहुँचाएगा?
उसका घर कौन बनाएगा?
उसके बच्चों को कौन पढ़ाएगा?
फ़र्नीचर कौन बनाएगा?
कार कौन बनाएगा?
बस कौन चलाएगा?

सच तो यही है कि
आनन्द जो बनते हैं
वे वेले होते हैं
निठल्ले होते हैं
ऊँचे आसन पर बैठकर
वही ज्ञान बाँट सकते हैं कि
ज़िन्दगी लम्बी नहीं 
बड़ी होनी चाहिए

राहुल उपाध्याय । 12 मार्च 2020 । सिएटल
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Wednesday, March 11, 2020

दूध का दूध

दूध का दूध
वॉटर का वॉटर हो गया
मन्दिर में भगवान नहीं 
यह तथ्य उजागर हो गया

सुन्दरकाण्ड का पाठ हो
या हो सत्यनारायण कथा
सब के सब हैं किट्टी पार्टी
जहाँ चहचहाएँ विमला-कमला-लता

सिमरन, संगत, साधु से भी
नहीं होता कोई लाभ
कोरोना के रोग का भी
डॉक्टर ही ढूँढ रहे इलाज

यज्ञ, जप और हवन ने भी
डाल दिए हथियार
आज के बाद इन सबको
दूर से करो नमस्कार

कर्मकाण्ड हो या भक्तिभाव 
सब के सब बेकार
कोरोना की इस सीख को
कभी न भूलो यार

राहुल उपाध्याय । 11 मार्च 2020 । सिएटल
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Friday, March 6, 2020

होंठों पे नक़ाब रहता है

होंठों पे नक़ाब रहता है
जहाँ सेनिटाईज़र ले के बंदा चलता है
हम उस विश्व के वासी है
जिस विश्व में कोरोना रहता है

मेहमां जो हमारा होता है
वो ख़तरे से भरा होता है
न जाने कहाँ से हो के आया
थोबड़े पे कहाँ लिखा होता है

दूर से ही करे नमस्कार उसे
चलता-फिरता टाईम बाम्ब लगता है

कुछ लोग जो ज़्यादा जानते है
फ़ॉरवर्ड करके ही वो मानते हैं
ये वेले बैठे व्हाट्सैपवाले
हर मर्ज़ का इलाज जानते है

कोरोना क्या कोरोना के बाप से भी
निपटने का इन्होंने ठेका ले रखा है

जो जिसको सूझा किया उसने
खुद को ही नज़रबन्द किया कुछ ने
कुछ शहर ही छोड़ के भाग गए
तो पिकनिक का मज़ा लूटा कुछ ने

मन्दिरों में भी लग गए ताले अब
अब भगवान से भरोसा उठता है 

(शैलेन्द्र से क्षमायाचना सहित)
राहुल उपाध्याय । 6 मार्च 2020 । सिएटल
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Wednesday, March 4, 2020

टीवी जिसे कहते हैं

टीवी जिसे कहते हैं
दु:खों का कटोरा है
हिंसा की दीं कभी ख़बरें 
तो कभी दंगों को निचोड़ा है

कोराना-सा कोई वायरस
इमरजेंसी का कोई आलम 
हर वक़्त का रोना तो 
बेकार का रोना है

चैनल का रिपोर्टर तो
आदत से है लाचार
'गर गुलशन भी वह देखे
तो कहे काँटों का बिछाना है

सी-एन-एन हो कि आज तक
सब बढ़-चढ़ के डराते हैं
जैसे दुनिया का अंत 
बस आज ही होना है

घण्टों-घण्टों की कवरेज 
फिर भी न कुछ हासिल
ले-दे के बस अंत में
हाथ ही तो धोना है

(निदा फ़ाज़ली से क्षमायाचना सहित)
राहुल उपाध्याय । 4 मार्च 2020 । सिएटल
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Tuesday, March 3, 2020

मेरे शहर आया एक नन्हा वायरस

मेरे शहर आया एक नन्हा वायरस
चीन से प्लेन पे हो के सवार

उसके हाथों में हैं हम सबके प्राण
उसके नाम से ही काँपे हम और आप
जब हटेगा, जब मिटेगा वो
तब जा के आएगी साँस में साँस 

उसके आने से मेरे जीवन में
उड़ गया चैन, छीन गया है क़रार 
हाथ धो कर भी जी नहीं भरता
चाहे धोऊँ उसे हज़ारों बार   

व्हाट्सैप पे मिले तो पूछूँ मैं
क्यूँ है ख़फ़ा, क्यूँ तू इतना ख़ूँख़ार?
क्या बिगाड़ा है हमने तेरा जो
कर रहा वार पे वार बेशुमार 

(साहिर से क्षमायाचना सहित)
राहुल उपाध्याय । 3 मार्च 2020 । सिएटल
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Sunday, March 1, 2020

हाथ धो कर जो पीछे पड़ा है

हाथ धो कर जो पीछे पड़ा है
हाथ धो कर उससे निजात पाओ
लोहा ही लोहे को काटता है
डॉक्टर ने कहा उपाय यही है

कर्मकाण्ड में विश्वास है जिनको
कहते ऋषि-मुनि का श्राप यही है
जपो निरन्तर हनुमत बीरा
हर मर्ज़ का इलाज यही है

एक दिन ऐसा आएगा
इंसान इंसान से कतराएगा
नास्त्रेदमस का नाम जो हैं जानते 
कहते लिखा उसने साफ़ यही है

जितने मुँह उतनी बातें 
इसकी-उसकी-किसकी माने?
नक़ाब चढ़ाए, घर सील करें?
बचने की क्या अब राह यही है?

संचार के माध्यम हैं कुछ इतने पक्के
कि किसी को किसी से मिलने की चाह नहीं है
सुबह-शाम व्हाट्सैप पे करें गुड मार्निंग
कोरोना के युग का सच मात्र यही है

बाज़ार से आटा-चावल-दाल हैं गायब
सब के घर के भंडार भरे हैं
कल को जब प्रलय आएगा
भूखें न मरें बस प्रयास यही है

राहुल उपाध्याय । 1 मार्च 2020 । सिएटल
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Saturday, February 29, 2020

कोरोना का कोई इलाज नहीं है

कोरोना का कोई इलाज नहीं है
कल तो होगा जो आज नहीं है

जब तक जीवन है जी भर के जियो
निराश होने की कोई बात नहीं है

न आए मर्ज़ी से, न जाएँगे मर्ज़ी से
आने-जाने का कोई हिसाब नहीं है

चुटकुला आए कोई व्हाट्सैप पर
हँसी छूटे तो कोई अपराध नहीं है

क्यूँ मुँह लटकाए बैठे 'राहुल'
ज़िन्दा है कोई लाश नहीं है

राहुल उपाध्याय । 29 फ़रवरी 2020 । सिएटल
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Wednesday, February 26, 2020

नासै रोग हरे सब पीरा

नासै रोग हरे सब पीरा
जपत निरंतर हनुमत बीरा

यानि जितने रोगी मरे 
सब हनुमान चालीसा न जपने से मरे

लगता है हम दोहरे व्यक्तित्व वाले बन गए हैं

एक तरफ़ तो इतने जागरूक 
कि डॉक्टर बनने के सपने
देखते हैं और दिखाते हैं
और दूसरी ओर 
हनुमान चालीसा दोहराते हैं

आप कहेंगे
आपको क्या आपत्ति हैं
जो दो-चार लोग मिलकर ख़ुश हो लेते हैं
कोई गायन प्रतिभा पर वाह-वाह लूट लेता है
कोई हारमोनियम का उस्ताद निकल आता है
कोई नाच लेता है, झूम लेता है
सब खा-पी लेते हैं
रंग-बिरंगे परिधान पहनने का अवसर मिल जाता है
हमारी संस्कृति की छँटा सँवर जाती है
मिलने के बहाने मिल जाते हैं
दु:ख-सुख की बात कर लेते हैं

क्या सचमुच शब्द इतने बेमानी हो गए हैं?

क़सूर इनका नहीं 
क़सूर है इस व्यवस्था का 
जिसमें शब्दों पर कोई ध्यान नहीं देता

कविता या तो कोई पढ़ता नहीं है
और पढ़ता है तो
सन्दर्भ सहित व्याख्या से तो कोसों दूर भागता है
और गीत हुआ तो 
धुन से बाहर ही नहीं निकल पाएगा
और भाषा अवधी हो तो पूरा बेड़ा ही गर्क है

अंधन को आँख देत
कोढ़ियन को काया 

अंधा बनाया ही क्यों?
कोढ़ दिया ही क्यों?

हम कब उबरेंगे इन जय इनकी, जय उनकी से?

क्यों नहीं अपनाते:
हम को मन की शक्ति देना, मन विजय करें
दूसरों की जय से पहले, खुद को जय करें

भेद-भाव अपने दिलसे, साफ़ कर सकें 
दूसरोंसे भूल हो तो, माफ़ कर सकें 
झूठ से बचे रहें, सचका दम भरें 

मुश्किलें पड़ें तो हम पे, इतना कर्म कर 
साथ दें तो धर्म का, चलें तो धर्म पर 
खुदपे हौसला रहे, सचका दम भरें 

राहुल उपाध्याय । 26 फ़रवरी 2020 । सिएटल
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Monday, February 24, 2020

जो पर्वत हैं

जो पर्वत हैं
वे बेज़ुबान हैं

जो बेज़ुबान हो जाते हैं
क्या उन्हें पर्वत बना दिया जाता है?

या जो पर्वत बन जाते हैं
वे बेज़ुबान हो जाते हैं 

पता नहीं 
पर पते की बात यह अवश्य है
कि जो जितना बड़ा होता है
उतना ही ख़ामोश होता है

और इसमें कोई बुराई भी नहीं 

चुप रहना
एक अलौकिक शक्ति है
और इसे स्वर्णतुल्य भी माना गया है

और वैसे भी
छोटे मुँह, बड़ी बात के
कई उदाहरण भी हैं

बिचारा शिशुपाल 
यूँही मारा गया

और 
जो चुप रहें
पितामह कहलाए

या पितामह थे
इसलिए चुप रहें?

इससे पहले 
कि कोई मेरे सौ गिने
मैं अपनी क़लम यही रोक देता हूँ

राहुल उपाध्याय । 24 फ़रवरी 2020 । सिएटल
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Tuesday, February 11, 2020

हमें तुमसे प्यार कितना, ये हम नहीं जानते

हमें तुमसे प्यार कितना, ये हम नहीं जानते
मगर जीता नहीं सकते विधान सभा

सुना योगाभ्यास अच्छा सीखाते हो तुम
बातें भी अच्छी-अच्छी बनाते हो तुम
दिल तो तुम्हारा लगे, बर्फ़ के समाम
तुमपे ऐतबार कितना, ये हम नहीं जानते
मगर जीता नहीं सकते विधान सभा

हिन्दू-मुस्लिम की बात करके जलाते हो दिल
विकास के नाम पे फाड़ा 370 का बिल
क्या क्या जतन करते हो, तुम्हें क्या पता
ये दिल बेवकूफ कितना, ये हम नहीं जानते
मगर जीता नहीं सकते विधान सभा

(मजरूह से क्षमायाचना सहित)
राहुल उपाध्याय । 11 फ़रवरी 2020 । सिएटल
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आप के हसीन रुख़ पे आज नया नूर है

आप के हसीन रुख़ पे आज नया नूर है
मोदी का बल विफल रहा तो मेरा क्या क़ुसूर है

केजरी की झाड़ू से दिल्ली का बदला रूप है
घटा से जैसे छन रही सुबह-सुबह की धूप है
जिधर नज़र मुड़ी उधर सुरूर ही सुरूर है

मनोज तिवारी जी चाह रहे ट्वीट वो डिलीट हो
मोदी जी भी मान गए कि केजरी तुम हिट हो
शाह हार के कहीं न कहीं रो रहे ज़रूर हैं 

जहाँ-जहाँ पड़े कदम वहाँ फ़िज़ा बदल गई
के जैसे सर-बसर बहार आप ही में ढल गई
किसी में ये कशिश कहाँ जो आप में हुज़ूर है

(अनजान से क्षमायाचना सहित)
राहुल उपाध्याय । 11 फ़रवरी 2020 । सिएटल
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Thursday, February 6, 2020

फूल ही फूल होते

फूल ही फूल होते
खार न होते
'गर होती उसे अमन की चाहत
उसके हाथ हथियार न होते

आँख के बदले
आँख न लेते
तो दीवाली जैसे
त्योहार न होते

हमसे न कहो
सबसे प्रेम करो
'गर होता प्रेम
यूँ नरसंहार न होते

'गर सच में चाहते
हो सबका स्वागत
तो खुद के घर के
बंद द्वार न होते

दीवारों से यदि होती 
हमें सच में नफ़रत 
अपना-पराया
परिवार न होते

राहुल उपाध्याय । 6 फ़रवरी 2020 । सिएटल
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Wednesday, February 5, 2020

बरसात के फ़ोटो अच्छे नहीं आते हैं

बरसात के फ़ोटो अच्छे नहीं आते हैं

एक तो
फ़ोन ख़राब न हो जाए
इसलिए लेता ही कम हूँ
दूजा
डी-एस-एल-आर तो 
भूल कर भी नहीं निकालता हूँ
और तीजा
सर पर 'हूडी' चड़ा लेने से
कोल्हू के बैल की तरह
जो नाक की सीध में है
बस वही दिखता है
चौथा
नज़रें ज़मीं में गाड़े चलता हूँ
ताकि किसी कुलबुलाते
लघु कुण्ड में कहीं पाँव
छपाक से न घुस जाए

कुल मिलाकर जब कुछ
दिखता ही नहीं है
तो फ़ोटो क्या खाक लूँगा?

ऐसे में याद आते हैं
बारिश के दिन
जब मैं और तुम
सरपट उतरते थे
पहाड़ी से
पाँच-पच्चीस की 
आख़री 
ट्रेन पकड़ने

और
ट्रेन छूट जाने पर
मूसलाधार बारिश में भी
चींटी की चाल चला करते थे
जैसे कह रहे हो
जिसको जो बिगाड़ना हो बिगाड़ ले
हम तो अब अपनी मर्ज़ी से चलेंगे-रूकेंगे

कभी किसी 
पेड़ की छाँव में
रैन-बसेरे में
रूक भी जाते थे
चुपचाप कुछ कह भी देते थे

घर आकर 
गरम-गरम गौर-राब 
की चुस्कियों का आनन्द 
अमृत-तुल्य होता था

(छतरी थी तो सही
लेकिन वो पहले ही दिन 
खो गई थी
और दूसरी कभी ली नहीं)

बरसात के फ़ोटो अच्छे नहीं आते हैं
इसलिए
यादों के चलचित्र ही चला लेता हूँ

राहुल उपाध्याय । 5 फ़रवरी 2020 । सिएटल
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Friday, January 31, 2020

मुझसे ख़फ़ा

मुझसे ख़फ़ा 
मुझ ही से ख़ुश
मान न मान
मैं तेरा महबूब

न तू मुझसे
न मैं तूझसे जुदा
सच तो यही कि
तू मेरा वजूद

करी वफ़ाएँ
करी जफ़ाएँ 
हर हाल है सादिक़ 
तेरा सलूक

न तूझे पता
न मुझे पता
कौन किसके नशे में 
कितना है चूर

ख़्वाबों में तू
ख़यालों में तू
तू पास ही है 
होके भी दूर

राहुल उपाध्याय । 31 जनवरी 2020 । सिएटल
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Monday, January 27, 2020

नारियल का तेल पिघलने लगा है

नारियल का तेल पिघलने लगा है
मौसम का प्रकोप बढ़ने लगा है

ग़म होते तो ख़ुशियाँ भी होतीं
चित्त हमारा अब थमने लगा है

सफ़र में है कुछ ऐसी कशिश
मंज़िल से डर लगने लगा है

कहने को अब कुछ भी नहीं
सोते-जागते दिल कहने लगा है

बैठे-बैठे सो जाता है 'राहुल'
और सोते-सोते जगने लगा है

राहुल उपाध्याय । 27 जनवरी 2020 । सिएटल
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Saturday, January 18, 2020

मिलोगी तुम

मिलोगी तुम
तो पूछूँगा तुमसे कि
चौरासी पूनम चाँद तका था तुमने?
देर रात तक अपना गाना सुना था तुमने?
गई थी उस पीपल के पास
जो गवाह है हमारी अनकही बातों का?
क्या अब भी तुम चढ़ा लेती हो
गले का हार नाक पर
जब होती हो गहरी सोच में?
क्या अब भी पहनती हो पीला गुरू को?
और छोड़ रखा है नमक मंगल को?

मिलोगी तुम
तो करूँगा बंद - आँखें तुम्हारी
अपनी हथेलियों से - पीछे से आकर

अंगुलियों के वृत्त 
पहचान लोगी?
कर लोगी हथेलियों के 
हल्के 
दबाव की शिनाख्त?

मेरे तो होश ही उड़ जाएँगे 
तुम्हारी ज़ुल्फ़ों के साए में 

मिलोगी तुम

मिलोगी तुम

मिलोगी तुम
तो खोऊँगा नहीं 

राहुल उपाध्याय । 18 जनवरी 2020 । सिएटल
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Sunday, January 12, 2020

कोई तो है

कोई तो है
जो टोकता है मुझे
मेरी लाल शर्ट पर
मेरे बिखरे बाल पर
डी-पी न बदलने पर

कोई तो है
जो एक दिन बात न हो
तो दूसरे दिन उलाहना देता है
कि कहाँ थे?
पता है कितना याद किया कल?
हर नोटिफिकेशन पर थी मेरी आँखें बिछी
हर अलर्ट से थी आस जगी
न आया कहीं से कुछ तो थी नाराज़गी बढ़ी

कोई तो है

कोई तो है
जो मुझे
मेरे होने का
अहसास दिलाता है

राहुल उपाध्याय । 12 जनवरी 2020 । सिएटल


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Wednesday, January 8, 2020

राष्ट्रपति बन जाना ही होता काफ़ी नहीं

राष्ट्रपति बन जाना ही होता काफ़ी नहीं 
दुबारा न जीते तो आप कुछ भी नहीं 

मिलियन कमाना ही होता काफ़ी नहीं 
वह घट जाए तो आप कुछ भी नहीं 

सुप्रसिद्ध कलाकार होना ही काफ़ी नहीं 
काम न मिलता रहे तो आप कुछ भी नहीं 

किसी से प्यार करना ही होता काफ़ी नहीं 
प्यार न करते रहे तो आप कुछ भी नहीं 

ज़िन्दगी है जुआ जिसमें जीतना काफ़ी नहीं 
जीतते न रहे तो आप कुछ भी नहीं 

राहुल उपाध्याय । 6 जनवरी 2020 । सिएटल

Monday, January 6, 2020

हम हुए फ़ना

हम हुए फ़ना 
तुम हुए ख़ुदा
इश्क़ है ज़ालिम 
पर ऐसा भी क्या

हम जलते रहे
तुम खिलते रहे
ग़ैरों की बातों पे
तुम्हारा ठहाका लगा

कोई ख़्वाहिश नहीं 
कोई आरज़ू नहीं 
हमसफ़र ही नहीं 
तो फिर रखा है क्या 

अपने आप से ही हम
बतिया लेते मगर
न आता है वो और 
हम न जाते वहाँ 

इस क़दर तन्हा हैं
एक अरसे से हम
कि ख़्वाबों का भी आना-जाना
हुआ बन्द है यहाँ 

राहुल उपाध्याय । 6 जनवरी 2020 । सिएटल

Saturday, January 4, 2020

जबसे जाना कि जाना है

जबसे जाना कि जाना है
छोड़ा हर फसाना है

न महबूब, न कोई प्रियतम
न कोई जान-ए-जाना है

तेरी मेरी बिसात है क्या
जग सारा बेगाना है

किस-किस को सर पे बिठाए
ठोकर में सारा ज़माना है

सम्बन्धों की नुमाईश में 
नम्बर न हमें लगाना है

चाहे जो वो कर ही डाले
'राहुल' बड़ा दीवाना है

राहुल उपाध्याय । 4 जनवरी 2020 । सिएटल