Wednesday, August 27, 2008

अपने एच-वन की उलझन को

अपने एच-वन की उलझन को कैसे मैं सुलझाऊँ
औरों को जो ग्रीनकार्ड मिले हैं कैसे मैं पा जाऊँ

बॉस के वादे हो गए झूठे
सारे सपनें टूटे
घिसघिस के वो काम कराए
चैन मेरा वो लूटे
ऐसे लीचड़-पाजी से मैं कैसे साथ निभाऊँ

मेरा पासपोर्ट वो छुपाए
बाँड मुझसे वो भरवाए
कोई ना जाने इस विलैन को
ये किस तरह सताए
कर ना पाऊँ वकील कोई पल-पल मैं घबराऊँ

आया जब से ऐसा फ़ंसा हूँ
मुझसे सहा ना जाए
लिखना चाहूँ ब्लाग पे अपने
फिर भी लिखा ना जाए
जौंक की तरह मुझसे चिपका कैसे पीछा छुड़ाऊँ

सिएटल,
27 अगस्त 2008
(एम-जी हशमत से क्षमायाचना सहित)
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एच-वन = H1
बॉस = Boss
बाँड = bond
ब्लाग = blog

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4 comments:

Nitish Raj said...

वाह सुंदर बन पड़ी है बढ़िया

नीरज गोस्वामी said...

मजेदार दमदार रचना...
नीरज

Yogesh said...

Rahul ji,
mujhe lagta hai abhi aapki poem incomplete hai

main padh hi rha tha, ek dam laga ye kya poem khatam ho gayee...

isko poora zaroor keejiyega...

ashwini47 said...

Ti Si Gareat ho sir