Saturday, August 9, 2008

कभी जलती थी शमा रोशनी के लिए

कभी जलती थी शमा रोशनी के लिए
आज जलती है फ़क़त ख़ुशबू के लिए
कभी मिलते थे दोस्त दोस्ती के लिए
आज मिलते हैं फ़क़त गुफ़्तगू के लिए

डिग्री हो
सुशील हो
और धन भी कमाए
वही बस आज एक आदर्श पत्नी कहलाए
चाहे रात भर छटपटाती रहे एक मजनू के लिए

किस्से कहानी कुछ
यूँ शुरू होते हैं
कि हर सिक्के के दो
पहलू होते हैं
जीते हैं हम जो मिल न सके उस पहलू के लिए

ये तेरा
ये मेरा
यही रोना है
टुकड़ों में
बंट गया
घर का कोना कोना है
कोई एक जगह न बची सुकूँ से रू-ब-रु के लिए

न शादी है पक्की
न देश से है भक्ति
दे देते हैं तलाक़
चाहे देश हो या व्यक्ति
नहीं खपता है कोई आज इज़्ज़त आबरू के लिए

सिएटल,
9 अगस्त 2008
================
शमा = मोमबत्ती
फ़क़त = सिर्फ़
गुफ़्तगू = बातचीत
सिक्के के दो पहलू = two sides of a coin
रू-ब-रू = आमने-सामने बैठ कर बात करना

इससे जुड़ीं अन्य प्रविष्ठियां भी पढ़ें


3 comments:

Anil Pusadkar said...

aaj milte hain faqat guftgun ke liye,...badhiya sir jee,badhai

Yogesh said...

kya baat hai !!

Bahut khoob !!

डिग्री हो
सुशील हो
और धन भी कमाए
वही बस आज एक आदर्श पत्नी कहलाए

विनय प्रजापति 'नज़र' said...

बहुत बहुत बहुत अच्छी रचना!