कल रात
समंदर का कतरा कतरा
कतरा कतरा चाँद
कतरता रहा
मैं
जीवन की आपाधापी का
बहाना कर के
कतरा कर निकल गया
खूंटे से बंधे
मवेशियों की कतार में
शामिल हो गया
फ़ोर्ट वॉर्डेन
15 अगस्त 2008
समंदर का कतरा कतरा
कतरा कतरा चाँद
कतरता रहा
मैं
जीवन की आपाधापी का
बहाना कर के
कतरा कर निकल गया
खूंटे से बंधे
मवेशियों की कतार में
शामिल हो गया
फ़ोर्ट वॉर्डेन
15 अगस्त 2008
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4 comments:
..........maveshiton ki kataar me shaamil ho gaya.bahut badhiya ,badhai aapko
वाह ! बहुत खूब.
Rahul ji,
Sach kahu, mujhe aapki kavita pasand nahi aai.
Shayad mujhe samaj hi nahin aai hogi is liye. Ya fir ye itne high level ki poetry hai, jo mujhe samaj nahi aai. May be...I am beginner in this field. But I say what ever i feel like.
Don't mind.
मैं
जीवन की आपाधापी का
बहाना कर के
कतरा कर निकल गया
खूंटे से बंधे
मवेशियों की कतार में
शामिल हो गया
बहुत अच्छा लिखा है आप ने ...
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