Monday, December 8, 2008

उस रात भी अमावस थी

उस रात भी अमावस थी
जब हमने कागज़ी रावण जलाए थे
और बच्चों को बड़े गर्व से बतलाया था
कि देखो ऐसे होती है बुराई पर अच्छाई की जीत

उस रात भी अमावस थी
जब ईंट-गारे की ईमारत जली थी
और हमने कागज़ी बाण चलाए थे
सम्पादक को पत्र लिख कर
कविता लिख कर
लेख लिख कर
परिजनों के साथ फोन पर
दिल की भड़ास निकाल कर

और अब?
क्रिसमस की छुट्टियाँ है
स्कूल भी बंद है
और बच्चों ने कई दिनों से
प्लान बना रखा है
मेक्सिको जाने का
टिकट पहले ही लिए जा चुके हैं
और यहीं तो साल में एक मौका होता है
सबके साथ घूम-फिर आने का

मारीच तो आते रहेंगे
कभी स्वर्ण हिरण बन कर
तो कभी नाव में बैठ कर

अंगरक्षक
जनता को
एक काल्पनिक रेखा के भरोसे
छोड़ कर
रक्षा करते रहेंगे
कभी महाराजाधिराज राम की
तो कभी महामहिम मुख्यमंत्री की

जनता के लुट जाने पर
वे आर्तनाद करेंगे
इधर-उधर
पशु-पक्षियों से
पेड़-पौधों से
पूछ-पूछ कर
समय बर्बाद करेंगे
किसी दूसरे देश से
मदद की मांग करेंगे

मिथकीय शत्रु के
मिट जाने पर भी
वे जनता को
परेशान करेंगे
कभी अग्निपरीक्षा लेंगे
तो कभी सत्ता के लोभ में
जंगल में रोता-बिलखता छोड़ देंगे

सिएटल,
8 दिसम्बर 2008

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9 comments:

श्यामल सुमन said...

कितने रावण को मैं मारूं।
कितनी लंका और जलाऊँ।
घर घर लंका घर घर रावण,
इतने राम कहाँ से लाऊँ।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
www.manoramsuman.blogspot.com

MANVINDER BHIMBER said...

उस रात भी अमावस थी
जब हमने कागज़ी रावण जलाए थे
और बच्चों को बड़े गर्व से बतलाया था
कि देखो ऐसे होती है बुराई पर अच्छाई की जीत
sunder bhaaw hai.....

सुशील कुमार छौक्कर said...

उस रात भी अमावस थी
जब ईंट-गारे की ईमारत जली थी
और हमने कागज़ी बाण चलाए थे
सम्पादक को पत्र लिख कर
कविता लिख कर
लेख लिख कर
परिजनों के साथ फोन पर
दिल की भड़ास निकाल कर

सही कह रहें आप। गहरी गहरी बात कह जाते हैं इन छोटे छोटे शब्दों से।

COMMON MAN said...

मारीच तो आते रहेंगे
कभी स्वर्ण हिरण बन कर
तो कभी नाव में बैठ कर

वाह राहुल जी, अभी मैंने आपकी सभी कवितायें पढीं, अच्छा लगा.

राजीव तनेजा said...

उस रात भी अमावस थी
जब ईंट-गारे की ईमारत जली थी
और हमने कागज़ी बाण चलाए थे
सम्पादक को पत्र लिख कर
कविता लिख कर
लेख लिख कर
परिजनों के साथ फोन पर
दिल की भड़ास निकाल कर

समय अनुरूप सटीक बातें...सुन्दर कविता

अशोक मधुप said...

और अब?
क्रिसमस की छुट्टियाँ है
स्कूल भी बंद है
और बच्चों ने कई दिनों से
प्लान बना रखा है
मेक्सिको जाने का
टिकट पहले ही लिए जा चुके हैं
और यहीं तो साल में एक मौका होता है
सबके साथ घूम-फिर आने का
एक बहुत ही अच्छी कविता। बधाई

Raja said...

राहुल जी, आपको शायद यह जान कर खुशी हो कि आज मुझे एक ईमेल मिली मेरे एक दोस्त से जो जमाइका में रहती है| उसने एक हिन्दी कविता का अंग्रेजी अनुवाद करने के लिए बोला| वोह कविता आप ही की है "उस रात भी अमावस थी"| मुझे भी अच्छी लगी|

राजा
rajeshmadhra@yahoo.com

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