Monday, December 29, 2008

वर्ष का आरम्भ

पहले प्रतीक्षा रहती थी वर्ष के आरम्भ की

क्यूंकि तब डायरी बदली जाती थी

पहले प्रतीक्षा रहती थी वर्षा के आरम्भ की

जो सावन की बदली लाती थी

 

अब कम्प्यूटर के ज़माने में डायरी एक बोझ है

और बेमौसम बरसात होती रोज है

 

बदली नहीं बदली

ज़िंदगी है बदली

 

बारिश की बूंदे जो कभी थी घुंघरु की छनछन

दफ़्तर जाते वक्त आज कोसी जाती हैं क्षण क्षण

पानी से भरे गड्ढे थे झिलमिलाते दर्पण

आज नज़र आते है बस उछालते कीचड़

 

जिन्होने सींचा था बचपन

आज वही लगते हैं अड़चन

 

रगड़ते वाईपर और फिसलते टायर

दोनो के बीच हुआ बचपन रिटायर

 

बदली नहीं बदली

ज़िंदगी है बदली

 

कभी राम तो कभी मनोहारी श्याम

कभी पुष्प तो कभी बर्फ़ीले पहलगाम

तरह तरह के कैलेंडर्स से सजती थी दीवारें

अब तो गायब हो गए हैं ग्रीटिंग कार्ड भी सारे

या तो कुछ ज्यादा ही तेज हैं वक्त के धारें

या फिर टेक्नोलॉजी ने इमोशन्स हैं मारे

दीवारों से फ़्रीज और फ़्रीज से स्क्रीन पर

सिमट कर रह गए संदेश हमारे

 

जिनसे मिलती थी अपनों की खुशबू

आज है बस रिसाइक्लिंग की वस्तु

 

बदली नहीं बदली

ज़िंदगी है बदली

 

पहले प्रतीक्षा रहती थी वर्ष के आरम्भ की ...

 

सिएटल,

31 दिसम्बर 2007

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डायरी = diary

वाईपर =wiper

टायर = tire

रिटायर = retire

कैलेंडर्स = calendars

ग्रीटिंग कार्ड = greeting card

टेक्नोलॉजी = technology

इमोशन्स = emotions

फ़्रीज = fridge

स्क्रीन्स =screens

रिसाइक्लिंग = recycling

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4 comments:

महेंद्र मिश्रा said...

आने वाले साल में चिटठा फलेफूले . नववर्ष की हार्दिक शुभकामना .

सुशील कुमार छौक्कर said...

फिर से प्यारी शब्दों की जादूगरी।
बदली नहीं बदली
ज़िंदगी है बदली
वैसे सर हम तो कुछ चीजों में नही बदले जी। खैर ।आपको पहले से ही नव वर्ष की ढेरों शुभकामनाएं। कभी हमारे घर भी आईए खट्टी मिट्ठी यादों की गोलियाँ मिलेगी।

COMMON MAN said...

बहुत सुन्दर.

राजीव तनेजा said...

नए वर्ष के पर आपकी ये शानदार कविता पढकर जी खुश हो गया