Thursday, September 15, 2011

सपने जब सच होते हैं

सपने जब सच होते हैं, कितने फीके लगते हैं
अंगूर जो हम खा नहीं पाते, कितने मीठे लगते हैं

बाद में जा कर वो कितने टेढ़े हो जाते हैं
शुरू-शुरू में जो हमको सीधे लगते हैं

हरियाली और हरित क्रांति की क्यों है इतनी धूम
मुझको तो लाल-पीले ही फूल अच्छे लगते हैं

मंज़िल तक आते-आते लड़खड़ा गए पाँव
और उनका ये उलाहना कि हम पीए लगते हैं

प्रेसिडेंट और पी-एम हैं नाम के हुक्काम
कर्मों से तो वे केवल पी- लगते हैं



सिएटल,

15 सितम्बर 2011

Wednesday, September 14, 2011

पहेली 37


आज हिंदी दिवस है. इस सुअवसर पर प्रस्तुत  हैं दो पहेलियाँ.
 
#1
है रियल पर हम कहें xxxx
बलि चढ़े ताकि कोई मरे x xxx
 
#2
अंग्रेज़ मांगे xxxx
बनाऊँ एक, xx xx
 
कैसे सुलझाए? मदद चाहिए? चिंता करें. ऐसी 36 और पहेलियां हैं जो कि हल की जा चुकी हैं. आप पहले उन्हें पढ़ लें. धीरे-धीरे आपको इन पहेलियों का सारा भूगोल-इतिहास समझ में जाएगा और इन्हें हल करने में कोई कठिनाई नहीं होगी.
 
फिर भी न बात बने तो इन चार पंक्तियों की तरफ़ नज़र फेरें

हे हनुमान, राम, जानकी
रक्षा करो मेरी जान की

भूखें हैं तेरे बन्दें
भूखों को तू बन दे