Tuesday, September 24, 2013

किनारे दूर ही रहे तो अच्छा लगता है

किनारे दूर ही रहे तो अच्छा लगता है
बहता दरिया वरना इक नाला लगता है

कश्तियों का भी तो कुछ सोचो यार ज़रा
साहिलों पे बंधना क्या उचित मेहनताना लगता है?

कुंजियों को जबसे तालों में कैद किया है
हर मुश्किल का हल अब आसां लगता है

दिल में हो उमंगें और कप भी हो भरे-भरे
पीता तो नहीं लेकिन स्वप्न सुहाना लगता है

सागर मिले कई नदियों से और नदी मिले एक सागर से
प्रकृति के नियमों में 'राहुल' घोटाला लगता है

24 सितम्बर 2013
सिएटल । 513-341-6798

Monday, September 23, 2013

गणेश चतुर थी!


 
गणेश चतुर थी! गणेश चतुर थी!
 
सुन-सुन के कान पक गए. अरे भई, कोई तो हो जो सही हिंदी बोले. मैं यह नहीं कह रहा कि शुद्ध हिंदी बोले - पर कम से कम सही हिंदी तो बोले. आजकल कोई भी सही हिंदी नहीं बोलता. बम्बई/मुम्बईवालों से तो उम्मीद ही छोड़ दी है.
मेरे को अभी काम पे जाना है. अपुन के पास खाली-पीली बोम मारने वास्ते टाईम नहीं है. उधर चमन भाई का भाई खल्लास हो गएला है तो अभीच जाना मांगता है.
 
लेकिन ये सारे हिंदुस्तान को क्या हो गया? क्या चेन्नई एक्स्प्रेस की हवा लग गई है जो सब के सब मीनम्मा जैसी बातें करने लगे हैं? मेरा बाप मेरे को डराती. इन गुण्डों को पीचे लगाती. चलो हम गर से बाग जाए.
 
जबकि सच पूछिए तो हमारी हिंदी फ़िल्मों की वजह से ही हिंदी आज फल-फूल रही है. यही तो एक मात्र मनोरंजन का साधन है. (वरना रोजी-रोटी के चक्कर में अंग्रेज़ी कब की हिंदी को खा गई होती.) चाहे एन-आर-आई हो या विशुद्ध  देसी. बिना हिंदी फ़िल्म के किसी को खाना नहीं पचता. ये अलग बात है कि हिंदी फ़िल्मों के कर्णधारों का देवनागरी से दूर-दूर का वास्ता नहीं है. आजकल के स्टार-पुत्र-पुत्रियाँ तो रोमन से काम चलाते हैं ही, यहाँ तक कि हिंदी-प्रेमियों के चहेते गुलज़ार और जावेद अख़्तर साहब तक देवनागरी का क-ख-ग नहीं लिख पाते हैं. उर्दू के अलिफ़-बे-पे से काम चलाते आ रहे हैं और चलाते रहेंगे. और विडम्बना देखिए कि गुलज़ार साहब को हमने विश्व-हिंदी सम्मेलन का अध्यक्ष बना दिया था. वाह री हिंदी. बढ़ी उदार-दिल है, क्या करें!
 
लेकिन ये लम्बोदर के साथ मसखरी कुछ समझ नहीं आई. गणेश जी चतुर थे, यह कहना चाहिए. न कि गणेश चतुर थी. मुझे तो कोई एसा प्रसंग याद नहीं आता जब कि गणेश जी ने नारी रूप धारण किया हो या अपने पिताजी जैसा अर्धनारीश्वर जैसा कोई रूप भी रचा हो. तो फिर ये गणेश हैं कौन? कोई अभिनेत्री? कोई नेत्री? कोई सेलेब्रेटी? किसी महिला का नाम आज तक गणेश न सुना है न पढ़ा है. कोई गणेश कुमारी, कोई गणेश देवी, कोई गणेश कौर कहीं नहीं देखी. गुगल-बिंग सब छान मारा. फ़ेसबुक-ट्वीटर भी देख लिया.
 
गणेश जी हमेशा से शिव-पार्वती के सुपुत्र माने जाते रहे हैं और इस बात में भी कतई संदेह नहीं है कि वे चतुर थे. एक बार भगवान शिव ने अपने पुत्रों - गणेश जी एवं कार्तिक - से कहा कि जो सबसे पहले ब्रह्माण्ड की परिक्रमा लगा कर आएगा उसे पुरुस्कार दिया जाएगा. गणेश जी ने सोचा मेरे पिता ही मेरा ब्रह्माण्ड है सो उन्होंने झटपट भगवान शिव की परिक्रमा लगाई और बाजी जीत गए.
 
तब एक महानुभाव मिले. कहने लगे - "मसखरी तो मियां तुम कर रहे हो. थोड़ी देर बैठकर जो कह रहा है उससे लिखवा कर देखो, जब आप पढ़ोगे तो खुद ही समझ जाओगे कि माजरा क्या है."
 
हमने कहा तो भाई साहब आप ही लिख दीजिए. पढ़कर तो मेरे हाथों के तोते उड़ गए. अरे हिंदी में भी ऐसा होता है. कि पढ़ो कुछ और बोलो कुछ. या लिखो कुछ और पढ़ो कुछ? या बोलो कुछ और पढ़ो कुछ? मैं तो सोचता था कि ये समस्या अंग्रेज़ी वालो की है. देवनागरी में तो ऐसा कोई लफ़ड़ा नहीं है. रोमन में आप हर्श लिखे तो कोई उसे हर्ष भी पढ़ सकता है तो कोई अंग्रेज़ी का शब्द harsh भी. minute को भी दो तरीके से पढ़ा जा सकता है मिनट और माईन्यूट. लेकिन ये दुविधा हिंदी में पहली बार सामने आई है.
 
फिर मेरे छोटे बेटे ने मुझे बताया कि जी नहीं, एक बार नहीं कई बार ये समस्या आई है उसके सामने. वो हर रविवार को गुरुकुल जाता है हिंदी सीखने-लिखने-पढ़ने के लिए. जब भी मैडम डिक्टेशन करवाती है बड़ी समस्या होती है. कहती है रीतु लिखो - अब वो क्या लिखे? रीतू या ऋतु? क्योंकि बोलने/सुनने में तो दोनों में कोई फ़र्क नहीं है. सोमवार या सोम्वार? मंगलवार या मंगल्वार? जनवरी या जन्वरी? चलचित्र या चल्चित्र? कोलकाता या कोल्काता? चमचा या चम्चा? रसगुल्ला या रस्गुल्ला? धरमेन्द्र या धर्मेन्द्र? मूलचंद या मूलचंद या मुल्चंद या मुलचंद? सल्मान या सलमान? धर्ती या धरती?
 
उपर से लिंग की बड़ी समस्या है. मैंने कहा, "बेटा, एक ही विषय पर टिक. अभी बात गणेश जी की चल रही है और तू शिवलिंग को बीच में ला रहा है." उसने कहा - "शिवलिंग नहीं पापा, मैं बात कर रहा  हूँ जेंडर की. लिंग भेद की. पुलिंग-स्त्रीलिंग की.  अब आप बताईए कि केक कटती है कि कटता है? फ़्रिज खुला है कि फ़्रिज खुली है? जब अलमारी खुल सकती है तो फ़्रिज क्यों नहीं खुल सकता? और दही बन गया या दही बन गई? जब आईस-क्रीम गिर सकती है तो बिस्किट क्यों नहीं गिर सकती? रचना पढ़ी या रचना पढ़ा? मेहनत बच गई या मेहनत बच गया?"
 
मैंने कहा, "बेटा, बात तो पते की कर रहे हो. मैं पता लगाने की कोशिश करता हूँ कि लिंग तय करने का कोई नियम भी है या नहीं."
 
जाते-जाते बेटे ने एक और सवाल कर डाला. "पापा, ये कैसा त्योहार है - जिसमें सब लोग कहते है - नाग पंच मी - यानी आ नाग मुझे मार?"

हमने देखी है कविताओं की परिभाषाएँ कई

हमने देखी है कविताओं की परिभाषाएँ कई
काट के पीट के इसके हिस्सों को नए आयाम न दो
सिर्फ़ एहसास है ये रूह से महसूस करो
कविता को कविता ही रहने दो कोई नाम न दो
कविता कोई गीत नहीं, कविता की रीत नहीं
एक ख़ामोशी है सुनती है कहा करती है
न ये बुझती है न रुकती है न ठहरी है कहीं
नूर की बूँद है सदियों से बहा करती है
सिर्फ़ एहसास है ये रूह से महसूस करो
कविता को कविता ही रहने दो कोई नाम न दो
मुस्कुराहट सी खिली रहती है कविताओं में कहीं
तो कहीं ग़म के प्याले से भरे रहते हैं
शब्द कुछ कहते नहीं, शब्दों के जुड़ने पे मगर
अनेकानेक अर्थ निकलते रहते हैं
सिर्फ़ एहसास है ये रूह से महसूस करो
कविता को कविता ही रहने दो कोई नाम न दो
(गुलज़ार से क्षमायाचना सहित)
23 सितम्बर 2013
सिएटल ।
513-341-6798

Saturday, September 21, 2013

कितना क्यूट है

कितना क्यूट है
किसी लता का
किसी पेड़ पर चढ़ जाना
उससे लिपट जाना


उसके खुरदुरे तन को
अपने सुकोमल पत्तों से
ढक देना
सजा देना
हरा-भरा कर देना


लेकिन
यह तो बस
पेड़ ही जानता है कि
वो
अंदर ही अंदर
घुट रहा है
टूट रहा है
सूख रहा है
मिट रहा है


लता मरती नहीं
सदा हरी-भरी रहती है
एक के मिटने के बाद
दूजे पे
एक नागिन की तरह रेंगती हुई
चढ़ जाती है


कितना क्रूर है
किसी लता का
किसी पेड़ पर चढ़ जाना


------------
आजकल इंसान पेड़ बचाने में
और लताएँ मिटाने में लगा हुआ है


एक दिन पेड़ ही पेड़ रह जाएंगे
एक दूसरे के आड़े आएंगे
लड़-झगड़ कर मिट जाएंगे
दावनल में खप जाएंगे
प्रकाश के अभाव में उजड़ जाएंगे


-------
ईश्वर की सत्ता में
सबका अपना-अपना स्थान है
फिर भी इंसान है कि
करता काम उटपटांग है


पेड़-पौधों तक में
करता भेदभाव है


यह देसी है ये विदेशी है
विदेशी को उखाड़ फ़ेंको
वरना देसी को खा जाएगा


और
आरक्षण
संरक्षण
जातीय सफ़ाई
की सफ़ाई देने लग जाता है


21 सितम्बर 2013
सिएटल ।
513-341-6798
 

Tuesday, September 17, 2013

हम मिस वर्ल्ड हुए

हम मिस वर्ल्ड हुए
हमें चैन न मिला

हम मिस यूनिवर्स हुए
हमें चैन न मिला

आज मिस अमेरिका हुए हैं
तो क्या सचमुच करार मिल गया?

मिस इंग्लैण्ड कब बनेंगे?
अमेरिका में तो हमारा आना-जाना कुछ ही वर्षों का है
इंग्लैण्ड में तो हम सदियों से बसे हैं

जिनके हम गुलाम रहे हैं
जब वो खिताब देंगे
तो क्या हम फूले न समाएंगे?

ये बात-बात पर
इण्डो-इण्डो करना
कभी खुद को
इनसे बेहतर
तो कभी इनके बराबर
कहना
इस मानसिकता से
हमें कब मुक्ति मिलेगी?

हम इंसान है
तो क्यों नहीं
इंसान की तरह
रह सकते हैं

क्या ज़रूरी है
बार-बार अपनी जड़ें टटोलना
और औरों से कहना
कि देखो मैं तुमसे कितना अलग हूँ
और फिर भी तुमसे बेहतर हूँ
या तुम जैसा ही हूँ
मुझे स्वीकार करो
मुझे अपना लो
कोई भेद न करो

(पहले हम
इंजीनियर-डॉक्टर बनकर
खुश हो लेते थे
तो कभी सितार बजाकर
तो कभी अंतरिक्ष जाकर
तो कभी नोबल पुरुस्कार पाकर

अब
बत्तीसी चमकाना
और
कमर मटकाना भी
इनमें शामिल हो गया है)

17 सितम्बर 2013
सिएटल । 513-341-6798

Sunday, September 15, 2013

9862 दिन कैसे बीते

9862 दिन कैसे बीते
यह मैं ही जानता हूँ
क्योंकि
वो मैं ही तो था
जो उस दिन तड़के
घर से निकला था
प्लेन में बैठा था
और
जिसका एकमात्र साथी सूरज
दिल्ली से एम्स्टर्डम
और
एम्स्टर्डम से न्यू-यार्क तक
पूरे 18 घंटे साथ जगा था
और
सिनसिनाटी वाले प्लेन में बिठाकर
अस्त हो गया था


उस शहर की
उस रात की
खुशबू
आज भी मेरी साँसों में है


दूसरे दिन
जिस निर्जन राह पर चलकर
मैंने घर तार भेजा था
उस राह का चप्पा-चप्पा
अभी तक मेरे दिल-ओ-दिमाग पे
अंकित है


पासपोर्ट कैंसल हो चुका है
नागरिकता बदली जा चुकी है
सूटकेस फ़ेंका जा चुका है
न जाने कितने शहर-घर-पते बदले जा चुके हैं
और फिर भी
उस रात
उस दिन
उस शहर
उस सफ़र की
हर घड़ी
मुझे अच्छी तरह याद है
शायद इसलिए
कि जो घड़ी मैं पहन कर आया था
वो आज भी मेरे पास है
(पट्टा टूट चुका है
पर घड़ी अब भी बरकरार है
बिना मरम्मत के अब भी चलायमान है)


या शायद इसलिए कि
इंसान चाहे सब कुछ भूल सकता है
लेकिन अपने सुख-दु:ख के दिन नहीं


और मेरे लिए तो वो दिन सुख का भी था
और दु:ख का भी


सुख का इसलिए कि
एक अंजान देश में
अपरिचितों ने मुझे सहारा दिया


दु:ख का इसलिए कि
मैंने चिरपरिचितों से किनारा कर लिया
कर्मभूमि को ससुराल
और मातृभूमि को मायका कर दिया


15 सितम्बर 2013
सिएटल ।
513-341-6798
(अमरीका में पदार्पण की 27वीं वर्षगाँठ)

Saturday, September 14, 2013

शुद्ध हिंदी - एक आईने में

यह लेख मैंने 2007 में लिखा था. आज हिंदी दिवस को सुर्खियों में पढ़कर मुझे यह याद आ गया तो सोचा आपसे साझा कर लूँ.
 
सद्भाव सहित,
राहुल

जब तक देखा नहीं आईना
अपनी खामियां नज़र आई ना
 
काश ये दो पंक्तियां किसी महानुभाव ने कहीं होती। आपका दुर्भाग्य है कि ये मैंने लिखी हैं। ये मेरे उस प्रयास का परिणाम है जिसमें दूसरी पंक्ति के आखरी के शब्द पहली पंक्ति के आखरी शब्द ही होते हैं। एक हल्का सा अंतर होता है। वो यह कि या तो वो संधि द्वारा बनाए जाते है या फिर संधि विच्छेद द्वारा।
 
चूंकि ये मेरी पंक्तियां हैं। तो ज़ाहिर है हर कोई इस पर अपनी टिप्पणी करता है। आप इतने निराशावादी क्यूं हैं? ये क्यूं नहीं कहते कि
 
 जब तक देखा नहीं आईना
 अपनी खूबियां नज़र आई ना
 
कहना उनका सही है। ग्लास को आधा खाली कहने के बजाय आधा भरा भी कहा जा सकता है।
 
आईना बहुत उपयोगी वस्तु है। इसका उपयोग रोज हर जाति, सम्प्रदाय, और देश में समान रुप से किया जाता है। ये बहुत ही सस्ते दामों पर सबको उपलब्ध है। चाहे कोई सुबह उठ कर अपने ईष्ट देव को स्मरण करे न करे, आईने के दर्शन जरूर करता है। स्त्री, पुरुष, बच्चे, और बूढ़े सब देखते हैं कि वे कितने सुंदर हैं और क्या सुधार किया जा सकता है ताकि वे और सुंदर दिखें। लोग उन्हें देखें तो प्रसन्न हो।
 
एक और आयाम नज़र आता है आईने का। वो यह कि आईने से मनोरंजन भी होता है। गाँव के मेले में अक्सर एक खेमा ऐसा जरूर होता है जिसमें कई तरह के आईने होते हैं जिनमे इंसान बारी बारी से कभी मोटा तो कभी पतला, कभी लम्बा तो कभी छोटा नज़र आता है।
 
और आईना प्रयोगशाला में एक उपकरण के रूप में भी काम आता है। इस को ले कर प्रकाश के नियम और गुण आदि के बारे में प्रयोग किये जाते हैं।
 
आईना बच्चों का खिलोना भी है। वे इससे आलोकित दायरे को दीवार और छत पर घुमाते रहते हैं और उनका कौतूहल कम होने का नाम नहीं लेता।
 
आईना सपाट होता है और स्वभाव से अत्यंत शीतल। जो छवि दिखाता है वह सच्चाई के बिल्कुल विपरीत होती है और फिर भी कोई इसे दोषी नहीं ठहराता। सब स्वयं ही इसका आशय जान लेते हैं और इसे धन्यवाद देते हैं।
 
इन सब को ध्यान में रखते हुए, मैंने इस स्तम्भ का नाम आईना रखा है। कभी मनोरंजन करेगा तो कभी खूबीयां दिखाएगा तो कभी खामियां।
 
मुझे कविता लिखने की प्रेरणा कबीर के दोहों से मिली। मेरा मानना है कि उन के जैसा गागर में सागर भरने वाला और कोई नहीं। हास्य, व्यंग्य और दर्शन में वे पारंगत थे। उनका ये दोहा मुझे खास तौर से पसंद है -
 
रंगी को नारंगी कहे, बने दूध को खोया
 चलती को गाड़ी कहे, देख कबीरा रोया।
 
सुना तो इसे आपने कई बार होगा। ये एक हिंदी फ़िल्म के गीत के शुरूआत में भी गाया गया है। इसे समझने के लिए इसे कई बार पढ़ना होगा। तीनों तथ्य एक से बड़ कर एक विडम्बना को उजागर करते हैं। नारंगी एक बेहद रंगीन फ़ल है और उसे दुनिया ने नारंगी का नाम दे दिया। जब दूध का खोया बना लिया जाता है तो वो आपके सामने है और दुनिया उसे कहती है खोया। जो वाहन है, चलायमान है उसे दुनिया कहती है गाड़ी! गाड़ी तो लकड़ी जाती है, गाड़े तो मुर्दे जाते हैं। गाड़ी का मतलब जो एक जगह पर अटक जाए। जो वहां से हिल न सके।
 
मुझे भी शब्दों से खेलना बहुत अच्छा लगता है। हर कविता में कुछ न कुछ शब्द आ ही जाते हैं जिनके दो अर्थ हो। ऐसी कविताएं फिर मैं blog पर प्रकाशित कर देता हूं और मित्रों को भेज देता हूं। पिछले एक साल से सिएटल शहर में हर महीने के चौथे शनिवार मैं अपने घर एक काव्यगोष्ठी का आयोजन करता हूं। इसमें इस शहर में रहने वाले और कविता लिखने वाले या इसमें रचि रखने वाले सम्मिलित होते हैं। पिछले हफ़्ते मैं एक पुस्तक विमोचन के कार्यक्रम में गया था। वहाँ मेरा परिचय देते हुए कहा गया कि ये हर महीने नियमित रुप से गोष्ठी का आयोजन कर के हिंदी की सेवा कर रहे हैं। तो मेरे मन में तुरंत एक वाक्य कौंध गया - 'मैं मासिक धर्म निभा रहा हूं।' मैं सोचता रहा कि अगर मासिक धर्म लगातार चलता रहे और कभी ये क्रम टूटे नहीं तो सृजन कैसे होगा? और फिर मेरा शब्दो से खेल शुरु हो गया जो दूसरे दिन जा के रुका जब 'जन्म' कविता पूरी हो गई। ये एक संयोग ही था कि वो मेरा जन्म दिन भी था।
 
जन्म के पीछे कामुक कृत्य है
 यह एक सर्वविदित सत्य है
 
 कभी झुठलाया गया
 तो कभी नकारा गया
 हज़ार बार हमसे ये सच छुपाया गया
 
 कभी शिष्टता के नाते
 तो कभी उम्र के लिहाज से
'अभी तो खेलने खाने की उम्र है
 क्या करेंगे इसे जान के?'
 
सोच के मंद मुस्करा देते थे वो
 रंगीन गुब्बारे से बहला देते थे वो
 
 बड़े हुए तो सत्य से पर्दे उठ गए
 और बच्चों की तरह हम रुठ गए
 जैसे एक सुहाना सपना टूट गया
 और दुनिया से विश्वास उठ गया
 
 ये मिट्टी है, मेरा घर नहीं
 ये पत्थर है, कोई ईश्वर नहीं
 ये देश है, मातृ-भूमि नहीं
 ये ब्रह्मांड है, ब्रह्मा कहीं पर नहीं
 
 एक बात समझ में आ गई
 तो समझ बैठे खुद को ख़ुदा
 घुस गए 'लैब' में
 शांत करने अपनी क्षुदा
 
 हर वस्तु की नाप तौल करे
 न कर सके तो मखौल करे
 
 वेदों को झुठलाते है हम
 ईश्वर को नकारते है हम
 तर्क से हर आस्था को मारते हैं हम
 
 ईश्वर सामने आता नहीं
 हमें कुछ समझाता नहीं
 कभी शिष्टता के नाते
 तो कभी उम्र के लिहाज से
'अभी तो खेलने खाने की उम्र है
 क्या करेंगे इसे जान के?'
 
बादल गरज-बरस के छट जाते हैं
 इंद्रधनुष के रंग बिखर जाते है
 
इस कविता को बहुतों ने पसंद किया। और नहीं भी किया तो कम से कम जन्मदिन की बधाईयां तो जरुर भेजी गईं।
 
पर दो नई बातें भी सुनने में आईं। एक तो ये कि ज्यादातर लोग खुश थे कि इस कविता में वेदो और ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकारा गया है। दूसरा ये कि इसमें ज्यादातर शब्द हिंदी के थे। उर्दू के इक्का-दुक्का शब्द थे। मुझे सलाह दी गई कि आप हिंदी को भ्रष्ट होने से बचा ले। अगर ख़ुदा को कविता से जुदा कर दिया जाए तो अच्छा होगा।
 
सामान्यत: मैं अपने आप को कविता तक ही सीमित रखता हूं। कविता के अलावा कुछ नहीं कहता। और न ही कविता की सफ़ाई देता हूं। पर चूंकि अब मंच सामने हैं तो कुछ कहना चाहूंगा। मैं रतलाम में और रतलाम जिले के गाँव और तहसील - शिवगढ़ और सैलाना - में पला हूं। वहां पर हम मालवी या साधारण हिंदी बोलते थे। नई दुनिया एक मात्र अखबार था। उसे देने अखबार वाला आता था। अखबार का बिल आता था हर महीने। मेरे नाना गाँधीवादी थे और प्राथमिक विद्यालय चलाते थे जिसे लोग त्रिवेदी प्राईवेट स्कूल के नाम से जानते थे। देखिये, बिना अंग्रेज़ी और उर्दू के इतनी छोटी सी बात भी पूरी नहीं की जा सकी।
 
एक और उदाहरण। आप जाइये एक दूर-दराज के गाँव में जहाँ एक अधेड़ उम्र की माँ है जो कड़ी मेहनत कर के अपना घर चलाती है। उस के पास वक्त नहीं है कि वो या उसकी भाषा राजनीति से या फ़िल्मी दुनिया से या टीवी से प्रभावित हो। उससे आप कहिये कि - 'माई, तेरे बेटे के नम्बर अच्छे नहीं आए है इसलिए वो फ़ैल हो गया है। तू उसकी कोई अच्छी सी ट्यूशन लगा दे। हो सकता है वो अगली बार पास हो जाए।'
 
अब आप यहीं बात कह कर देखे बिना नम्बर, फ़ैल, ट्यूशन और पास के। बहुत मुश्किल है। और आप अगर शव्दकोश की सहायता से कह भी दे तो मैं नहीं समझता कि वो माँ उस बात को समझ पाएगी।
 
क्या फ़ायदा हैं इस तरह से हिंदी को संकीर्ण बनाए रखने की? आग भी उतना ही ठीक शब्द है जितना कि अग्नि। मुझे समझ नहीं आता है कि क्यूं कुछ लोग बात बात पर हिंदी का झंडा फ़हराने से बाज नहीं आते? खुद तो अंग्रेज़ी पढ़ लिख कर आगे निकल लिए। अब चाहते हैं कि बाकी लोग पीछे ही रहे तो बेहतर है। एक सज्जन तो यहाँ तक लिख बैठे कि 'हिंदी केवल गांव और गरीबों तक सीमित रह गई है। जैसे जैसे गरीबी हटती जाएगी, वैसे वैसे हिंदी मरती जाएगी।'
 
मेरे लिए ये एक सुखद घटना होगी। गरीबी हटाने का प्रयत्न कई वर्षो से किया जा रहा है। अगर हम इसमें सफ़ल हो गए तो ये एक हर्ष का विषय है। मातम मनाने का नहीं। रही बात हिंदी के मरने की। वो ऐसे तो मरने वाली है नही। और अगर मर भी गई तो कोई गम नहीं। मैं हमेशा से इस पक्ष में हूं कि इंसान बेकार में ही बटा हुआ है जाति में, प्रांत में, राज्य में, देश में, भाषा में, धर्म में। क्या ही अच्छा हो जब सारी सीमाएं हट जाए और हम सब आज़ादी से जहाँ जाना चाहे, जा सके। न पासपोर्ट की आवश्यकता हो और न हीं किसी दूसरी भाषा को जानने की ज़रुरत।
 
दूसरी बात भाषा भ्रष्ट होने की। नए शब्द जोड़ने से भाषा बलवान होती है, भ्रष्ट नहीं। शुद्धता सिर्फ़ शुद्धता की वजह से नही होनी चाहिए। प्राय: सारी शुद्ध वस्तुएं इतनी उपयोगी नहीं होती है जितनी कि मिलावट के बाद। 100% शुद्ध लोहा किसी काम का नहीं होता है। उसमें मिलावट कर के स्टील बनाया जाता है। 100% खरे सोने से भी आभूषण नहीं बनाए जा सकते हैं जब तक कि मिलावट न हो।
 


आता है तो लाल

आता है तो लाल
जाता है तो लाल
वैसे ही
जैसे
मानव
शिशु-अवस्था में
आता है तो लाल
हो के लहूलुहान
और
प्रौढ़ावस्था में
जाता है तो लाल
चिता की लौ में हो के अंतर्ध्यान


हम सब जानते हैं कि
सूरज
न उगता है
न डूबता है
सदा
प्रकाशमान रहता है


वैसे ही
शिशु भी
न जन्मता है
न मरता है
सिर्फ़
चोला बदलता रहता है


इस
मायावी मंच पे
पर्दा कभी उठता है
तो पर्दा कभी गिरता है


14 सितम्बर 2013
सिएटल ।
513-341-6798

Thursday, September 12, 2013

मैं तूझे बेच पाता कैसे

हो धूप या बारिश या बर्फ़

सबसे बचाया तूने

मेरे बच्चों को स्कूल

पहुँचाया तूने

मेरे बेटे को लाइसेंस

दिलाया तूने

अच्छे-बुरे हर बोझ को

उठाया तूने

ऊँचे-नीचे, टेढ़े-मेढ़े, कच्चे-पक्के रास्तों को

सुगम बनाया तूने

मैं तूझे बेच पाता कैसे



दुनिया भर की अच्छी-बुरी खबरेँ

सुनाई तूने

पीटर सेगल के फ़ट्टे

सुनाए तूने

कार-टॉक के ठहाके

गूँजे तूझमें

कभी किशोर तो कभी लता के नगमे

सुनाए तूने

मैं तूझे बेच पाता कैसे





मेरे हाथों से

मेरी आंख़ों से

मेरी यादों से

जुड़ी मलिका

मैं तुझे बेच पाता कैसे

सो तूझे एन-पी-आर को दान दे आया हूँ

ऐसा लगता है कि

किसी अपने को

हमेशा-हमेशा के लिए

छोड़ आया हूँ



तेरी एक चाबी

मेरे बेटे के की-चैन में

गलती से रह गई है

उसे छू कर मैं तेरा भरम कर लूँगा

और तेरे न होने के ग़म को भूला दूँगा



शायद ये गलती नहीं थी

तेरी ही सोच थी

कि तू मेरे हाथ कोई निशानी छोड़ जाए



11 सितम्बर 2013

सिएटल । 513-341-6798

Monday, September 9, 2013

हाई-डेफ़िनिशन में बाढ़-पीड़ितों के चेहरे

हाई-डेफ़िनिशन में
बाढ़-पीड़ितों के चेहरे
साफ़ नज़र आते हैं
और बटुए अपने-आप
खुलने लग जाते हैं

लेकिन
अपनी नाक के नीचे
अपने ही चेहरे
दिखाई नहीं देते हैं

भतीजे के स्कूल की फ़ीस
चाचा की टूटी साईकिल
पिता की दवाई का बिल
सब नज़रअंदाज़ कर दिए जाते हैं

बाढ़-पीड़ितों की सहायता करना सत्कर्म है
रेड-क्रॉस को चंदा देना निष्काम सेवा है
और अपना परिवार?
एक कभी ना पटने वाली
सुरसा सी खाई है
जिसे आज दे दिया तो
ज़िंदगी भर देने पर भी
इसकी भूख कभी खत्म नहीं होगी

हाई-डेफ़िनिशन में
बाढ़-पीड़ितों के चेहरे
साफ़ नज़र आते हैं
और बटुए अपने-आप
खुलने लग जाते हैं

9 सितम्बर 2013
सिएटल । 513-341-6798

Sunday, September 8, 2013

सुबह और शाम काम ही काम

सुबह और शाम
काम ही काम
क्यों नहीं लेते पिया
काम का नाम?

काम के लिए तो
मैं सदा हूँ तत्पर
पर गीता ने
कुछ कहा है प्रियवर
काम ही करेगा मेरा
काम तमाम
इसलिए नहीं लेता
काम का नाम

अरे!
वेक्यूम मारो, कपड़े धोओ
घास छीलो, बर्तन मांजो
काम के अलावा भी
कुछ होते हैं काम
क्यों नहीं लेते पिया
उनका नाम?

काम करके कोई
कहाँ बना है अफ़सर
काम करने वाले
रहें कर्मचारी अक्सर
काम जो न करे उसका मनमोहन है नाम
इसलिए नहीं करता मैं काम तमाम

(एम. जी. हशमत से क्षमायाचना सहित)
8 सितम्बर 2013
सिएटल । 513-341-6798

Thursday, September 5, 2013

आए दिन हादसे होते ही रहते हैं

आए दिन हादसे होते ही रहते हैं
कब तक कोई आंसू बहाए?

कभी बाढ़
तो कभी अकाल
कहीं आग
तो कहीं अत्याचार

उम्र के साथ-साथ ज्ञान भी बढ़ता जाता है
और सारी विषमताओं से मुख मोड़ लिया जाता है
कि
सबको अपने-अपने कर्मों का फल मिलता ही है
और अपना भी तो एक जीवन है

किसी का जन्मदिन है
किसी की सालगिरह है
किसी का प्रमोशन हुआ है
तो किसी की किताब छपी है

हलवा तो बनेगा
केक तो कटेगी

हादसों का क्या है?
हादसे तो होते ही रहते हैं
कब तक कोई आंसू बहाए?

5 सितम्बर 2013
बिहार में आई बाढ़ से अद्रवित हो कर
सिएटल । 513-341-6798