Monday, December 15, 2014

सब एक-दूसरे को आईना दिखाते हैं


सब एक-दूसरे को आईना दिखाते हैं
पर ख़ुद को कहाँ समझ पाते हैं

जो समझे नहीं समझाते हैं
गुरू-साधु-स्वामी कहलाते हैं

रात की रोशनी में सब हसीन है
दिन में दाग़ कहाँ छुप पाते हैं

हम भी आपसे शरीफ़ होते
पर हम न थोड़ा शरमाते हैं

चलो चलें कहीं और चलें
कहें राहुल जो रूक जाते हैं

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4 comments:

yashoda agrawal said...

आपकी लिखी रचना बुधवार 17 दिसम्बर 2014 को लिंक की जाएगी........... http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

Anonymous said...

छोटी सी , बढ़िया सी कविता! यह सच है कि हमें अपनी shortcomings नहीं दिखतीं पर दूसरों की faults एक दम दिख जाती हैं।

इन lines में - "हम भी आपसे शरीफ़ होते, पर हम न थोड़ा शरमाते हैं" - "न" का प्रयोग बहुत अच्छा लगा।

"चलो चलें कहीं और चलें, कहें राहुल जो रूक जाते हैं" - haha - पहले जप-तप कीजिये, hotel में discourses दीजिये, फिर रुकने को कहेंगे तो शायद कोई रुक भी जाये!

Mukesh Kumar Sinha said...

बढ़िया रचना

मन के - मनके said...


सत्य कथन