Saturday, February 18, 2017

टूट न जाएँ सपने मैं डरता हूँ

टूट जाएँ सपने 

मैं डरता हूँ

जग के भी देखो कहाँ

मैं जगता हूँ


रूठ जाएँ अपने

मैं डरता हूँ

खोल के भी आँखें अपनी

बंद रखता हूँ


भूल जाऊँ उसे

मैं डरता हूँ

ग़म और ख़ुशी से मैं 

दूर रहता हूँ


छूट जाए बचपन

मैं डरता हूँ

बरखा की बूँदें 

लब पे चखता हूँ


डूब जाए सूरज

मैं डरता हूँ

मेघों को नैनों में 

रोके रखता हूँ


बीत जाए जीवन

मैं डरता हूँ

दीया इक नया जला

दिया करता हूँ


18 फ़रवरी 2017

सिएटल | 425-445-0827

tinyurl.com/rahulpoems 






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