Sunday, September 30, 2007

राम सेतु


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

कुछ कह्ते है कि
ये कैल्सियम की जमावट है
और कुछ कहते है कि
ये राम सेतु है

राम जाने क्या सच है
और क्या है कोरी कहानी
पर एक बात है जो
कह्ते है ज्ञानी-ध्यानी
राम तुझ से नही
राम से तू है

वाद-विवाद का
आखिर क्या कारण है?
सच पूछो तो
अपना-अपना सब का रण है

कोई प्रगतिवादी है
तो कोई पर्यावरण का पक्ष लेता है
कोई राजनेता है
तो कोई धर्म की आड़ लेता है

हे हनुमान राम जानकी
रक्षा करो
हम सब की जान की

क्रिकेट विजय

२४ साल से जी रहे थे
मन अपना मार के
इसी आस में जीते थे
हर एक मैच हार के
फिर जीत के कप लाएंगे
दुश्मन को संहार के
आज समाप्त हुए है
सारे दिन इन्तज़ार के
युवराज गंभीर विजयी हुए
चौके छक्के मार के

२४ घन्टे में दिन बदलते है
२४ साल में भाग्य है बदला
पाकिस्तान इंग्लैन्ड आदि से
लिया खूब जम के बदला

बदली सब की कमेंट्री
बदली सब की टिप्पणियां
बदली छप्पर फाड़ के बरसी
मिली सब को गाड़ीया
मिला करोड़ युवराज को
तो मिसबाह को मिली कोड़ीयां

एक विडम्बना सामने आयी
प्रशंसको के व्यवहार से
जीत के आयी हुई टीम का
स्वागत हो रहा है हार से

हाथी के दाँत (Hypocrisy)

1
न मांग में सिन्दूर है
न गले में मंगल-सूत्र है
और शिकायत ये कि
भारतीय संस्कृति
स्वीकारता नहीं सुपुत्र है

2
मेरा ये विचार है कि
भारत का विकास हो
सम्पन्न हो खुशहाल हो
रोजी-रोटी सबके पास हो
सुनते ही कि DOLLAR गिर गया
सारा बुखार उतर गया
इन्तज़ार है उस दिन का
जब एक DOLLAR में
मिलते रुपये पचास हो

3
भई सच पूछो तो
AMERICA में भेद-भाव है
और उपर से
झेलने अनगिनत उतार-चढ़ाव है
जो नौकरी आज है वो कल नहीं
चिन्ता रहती है हर पल यही
अब तो भारत में भी नौकरिया ढेर हैं
और मां-बाप के भी कबर में पैर है
सोचता हूं हिन्दुस्तान में बस जाऊ
बस पहले AMERICAN CITIZEN बन जाऊ

4
दस SECOND के दर्शन से
भाग्य हमारे खुल जाएंगे
नदी के ठन्डे पानी से
पाप हमारे धुल जाएंगे
पंडित और पुजारी
जो हमें ये समझाते हैं
नदी-मन्दिर छोड़ के
खुद ही भाग जाते हैं
AMERICA के MAKESHIFT मन्दिर में
GREENCARD-धारी पुजारी बन जाते हैं

दूर के मुसाफ़िर

दूर के मुसाफ़िर

चलते-चलते थक के हम चूर हो गए
वक़्त के हाथों पाँव मजबूर हो गए

चले थे बड़ी धूम से बादशाह बनने
काम-काज में फ़से मज़दूर हो गए

किस क़दर निराली है शिक्षा प्रणाली
'पास' होते होते सब दूर हो गए

परदेस में बस जाने के बाद
चर्चे वतन के मशहूर हो गए

आस थी जिनसे कि उबारेंगे हमें
सियासत के ताज में कोहिनूर हो गए

किस किस से बचाए दिल-ए-नादान को
छोटे-मोटे कीटाणु तक शूर हो गए

कब और कहाँ मिलेंगी वो रामबाण दवा
कि इक खुराक़ ली और गम दूर हो गए

24 जून 2007