Saturday, February 7, 2009

मेरी परीक्षा ले कर तो देखो

मैं कोई भीष्म पितामह तो नहीं
लेकिन इतना कमजोर भी नहीं
कि तुम फोन करो
और मैं फोन उठा लूँ
तुम
एक बार
फोन कर के तो देखो

मैं कोई तपस्वी तो नहीं
लेकिन इतना गया-गुज़रा भी नहीं
कि तुम मुस्कराओ
और मैं पिघल जाऊँ
तुम
एक बार
मुस्करा कर तो देखो

मैं कोई देशभक्त तो नहीं
लेकिन एक एन-आर-आई भी नहीं
कि तुम चंद सिक्के दो
और मैं देश छोड़ दूँ
तुम
एक बार
चंद सिक्के दे कर तो देखो

सिएटल.
7 फरवरी 2009

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7 comments:

अनूप शुक्ल said...

लगे रहो राहुल भाई!

Arvind Mishra said...

तब सिएटल में क्या कर रहे हैं हैं राहुल भाई पधारो न आपणो देश !

Rahul Upadhyaya said...

अरविंद भाई

वापस न आने के कई बहाने हैं.
मिसाल के तौर पर यह एक -
वापसी

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

ऐसा ही होना चाहिए जी.

अनिल कान्त : said...

भाई जानदार रचना .....बहुत ही अच्छी

....
अनिल कान्त
मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

सचमुच इन्सान को होना भी ऎसा ही चाहिए.

COMMON MAN said...

वाह राहुल भैया.