Thursday, June 4, 2009

जबसे वो कमाने लगे हैं

जबसे वो कमाने लगे हैं
आँखें हमें दिखाने लगे हैं

गुरूर तो कुछ पहले भी था
अब धौंस भी जमाने लगे हैं

डर है कहीं बिगड़ जाए न वो
बनाने में जिसे ज़माने लगे हैं

अहसान जो किए थे हमने उनपे
धीरे-धीरे सब याद आने लगे हैं

वो फोन भी नहीं उठाते हमारा
हम नखरें उनके उठाने लगे हैं

घोलते थे सांसें सांसों में दो दिल
अब तकियों में मुँह छुपाने लगे हैं

कब तक करेगी फ़्रेम हिफ़ाज़त बिचारी
तस्वीरों से सब रंग अब जाने लगे हैं

सिएटल 425-445-0827
4 जून 2009

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4 comments:

श्यामल सुमन said...

क्या बात है राहुल जी। सुन्दर प्रस्तुति।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

Ratan Singh Shekhawat said...

वाह ! बहुत बढ़िया प्रस्तुति !

sapana said...

Rahulji,
Very nice.
sapana

Yogesh said...

Bahut hi badhia prastuti rahul.

shayad aapki pehli gazal rahi hogi ye...

aap kavita likhaa karte the..

aap gazal hi likhaa karen, gazal bahut achhi likhte hain aap..maza aa gaya padh ke

http://tanhaaiyan.blogspot.com

yogesh249@gmail.com