Sunday, March 30, 2014

सपने!

आज सुबह
जब मैं देर से उठा
तो
घड़ी के काँटे
अपनी मूँछों पर ताव दे रहे थे

और
दुनिया बदली-बदली सी लगी

मन हुआ कि
कलफ़ लगे कड़क सफ़ेद कुर्ते-पजामे में मैं
सोफ़े पर पसर कर
अखबार पढ़ूँ

और बीच-बीच में
लम्बे पतले काँच के ग्लास से
ऑरेंज जूस की चुस्कियाँ लेता जाऊँ

ऐसा नहीं
कि इंसान हमेशा अपना बचपन ही याद करता है

कभी-कभी
देर से जगने पर
वो
रिटायरमेंट के सपने भी देख लेता है

सपने!
कितनी अजीब बात है!
जिन्हें
हम जगते हुए देखते हैं
वे
अंततोगत्वा
हमारी नींद छीन ही लेते हैं

सपने!
जिन्हें देखना
नितांत नि:शुल्क क्रिया है
उनके पीछे
भागते-भागते
जागते-जागते
इंसान
पूरा का पूरा
खर्च हो जाता है

30 मार्च 2014
सिएटल । 513-341-6798
 

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4 comments:

Anonymous said...

Retirement का सपना बहुत अच्छा लगा! जब कलफ लगे सफ़ेद कुर्ते कि बात पढ़ी तो सोचा सपने में पोहे , परांठे और दूध होगा - पर यह orange juice कहाँ से आया? साथ में croissant या oatmeal भी होगा? :-)

कविता बहुत ही profound है! सपने निशुल्क होते हैं लेकिन उनको पूरा करने में हम खर्च हो जाते हैं - so true! "निशुल्क" और "खर्च" का comparison बहुत ही बढ़िया है। यह बात भी सच है कि जिन सपनों को हम जागते हुए देखते हैं वही हमारा चैन लेते हैं। उनको पूरा करने में ही हमारी नींद जाती है, पता भी नहीं चलता और सारा जीवन निकल जाता है।

एक नया शब्द सीखा - अंततोगत्वा - eventually. Thank you! :)

Anonymous said...

यह expression भी अच्छा लगा कि late उठने पर "घड़ी के काँटे अपनी मूँछों पर ताव दे रहे थे" :)

konic doshi said...

sundar kavita hai... yaha bimbo ka prayog sarahaniy hai evam rojmarra ke jivan se judi ye kavita sapno se hi nahi vastavikta se bhi sakshatkar karati hai...

Rahul said...

Sapne.....is good

nice ....