हमने देखी थी देश में पनपती अराजकता
आगे बढ़ कर उसे मिटाने का प्रयास न किया
सिर्फ़ संडास है कह के चले आए हम
हाथ तो धोए पर संडास साफ़ न किया
हम देशभक्त नहीं, करते देश से प्यार नहीं
थोड़ी दौलत, थोड़ी सहूलियत पे फ़िदा होते हैं
चाहे हिंदू हो, मुसलमां हो, या हो धर्म कोई
बन के एन-आर-आई, देश से विदा होते हैं
कभी बच्चे, कभी बीवी, कभी कैरियर की फ़िक्र
कभी किसी और ही स्वार्थ में डूबे रहते हैं
खास कुछ करते नहीं, हाँकते जोरो की मगर
एक एक बात में दस दस झूठ छुपे रहते हैं
सिएटल 425-445-0827
23 अप्रैल 2009
(गुलज़ार से क्षमायाचना सहित)
Thursday, April 23, 2009
हमने देखी थी
Posted by Rahul Upadhyaya at 5:39 PM
आपका क्या कहना है??
1 पाठक ने टिप्पणी देने के लिए यहां क्लिक किया है। आप भी टिप्पणी दें।
Labels: Anatomy of an NRI, new, nri, parodies
Subscribe to:
Post Comments (Atom)

1 comments:
bhai,
NRI ban ke kam se kam, vo log paisa to kamaa lete hain.
mere jaise desh me reh kar ke kya kar rahe hain....kuchh bhi to nahi...aur paisa bhi nahin kamaa rahe........:P
Post a Comment