Wednesday, December 26, 2012

मरे मिले करोड़

जितनी लम्बी चादर हो
उतने ही पांव पसार
यहीं पाठ पढ़ाया गया
जीवन में हर एक बार
पाई पाई गिन के
जब जब पाई पगार

दुनिया के हैं ढंग निराले
रीत इसकी बेजोड़
जब तक आदमी ज़िंदा रहे
रहे पांव सिकोड़
एक दिन जब जाने लगे
नाते सारे तोड़
बाजे-गाजे से विदा होए
लम्बी चादर ओड़

आत्मा जब तक साथ थी
लेते थे मुख मोड़
पार्थिव शरीर के सामने
खड़े हैं हाथ जोड़
यहीं दुनिया का दस्तूर है
यहीं इसका निचोड़
जीवन का कुछ मोल नहीं
मरे मिले करोड़

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4 comments:

Madan Mohan Saxena said...

वाह . बहुत उम्दा,सुन्दर व् सार्थक प्रस्तुति . हार्दिक आभार आपका ब्लॉग देखा मैने और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.

http://madan-saxena.blogspot.in/
http://mmsaxena.blogspot.in/
http://madanmohansaxena.blogspot.in/
http://mmsaxena69.blogspot.in/

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
--
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शुक्रवार (28-12-2012) के चर्चा मंच-११०७ (आओ नूतन वर्ष मनायें) पर भी होगी!
सूचनार्थ...!

Anonymous said...

आपकी कलम की लिखी साफ़-साफ़ बातें पाठकों को अच्छी लगती हैं! लिखते रहिये...

ई. प्रदीप कुमार साहनी said...

बहुत ही बढ़िया रचना ।
मेरी नई पोस्ट में आपका स्वागत है ।
ख्वाब क्या अपनाओगे ?