Saturday, April 27, 2024

समंदर के अंदर

समंदर के अंदर

बूँदें हैं जितनी

मेरी प्रीत तुमसे

उनसे हैं दुगनी


तुम 

उफनती हो

गरजती हो

बरसती हो

मुझ पर

और मैं निछावर 

घायल सा

मादक सा

रहता हूँ तुम पर


मैं पाषाण हूँ तट का

खूँटे से बंधा

छीन लो मुझको

बाँहों में ले लो


नहीं चाहिए मुझे 

किनारे का आश्रय 

मुझे तो प्यारा

है साथ तुम्हारा


साथ उछलूँ 

साथ डूबूँ

पल-पल संवरूँ

पल-पल बिखरूँ 


न टूटना

न बिखरना

जीवन नहीं है

पाषाण का जीवन

जीवन नहीं है


राहुल उपाध्याय । 27 अप्रैल 2024 । सिएटल 



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