हर तरह से ज़िंदगी है बस मेरी ज़िंदगी
इसको पाने को कभी न कोई फ़ीस भरी
न मिली कहीं से, न दी किसी ने
नैसर्गिक है जैसे बहती नदी
ये होती कहाँ है, ये उगती कहाँ है
बनाती नहीं इसे मशीन कोई
ये ख़्वाब, ये हसरतें, ये जज़्बात मेरे
इनके ही ईंधन से सदा ये फली
आती है, जाती है, स्वयं ज़िंदगी
इसके आगे कभी न मेरी चली
दे दूँ किसी को मन बहुत हुआ
पर हाथ में न आए ये उलझन बड़ी
राहुल उपाध्याय । 22 जनवरी 2026 । दिल्ली
