न अपना लगता है, न पराया लगता है
हर कोई बस सताया लगता है
न जाने किस-किस से क्या कह बैठे
कुछ खिचड़ी था पकाया लगता है
कुछ छोड़ गए, कुछ छूट गए
किसी ने मुझे बचाया लगता है
वैसे तो उसमें विश्वास नहीं है
पर आपको किसीने बनाया लगता है
कहने को कह देतीं दीवारें लेकिन
यह घर फिर आज सजाया लगता है
बँट रही हैं किताबें राहुल की आजकल
नया-नया कुछ छपाया लगता है
राहुल उपाध्याय । 6 मार्च 2026 । सिएटल

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