मुझे फ़ोन वो करती है
मेरा ध्यान वो रखती है
हर त्यौहार बिन भूले
मुझे याद वो करती है
कहीं-कहीं से वो
मेरा प्यार भी लगती है
हर पल वो हँसती है
चिड़िया सी चहकती है
कुछ भी पहन ले वो
हर हाल चमकती है
कहीं-कहीं से वो
गुलज़ार भी लगती है
ज़मीं न छूती है
हवा पे चलती है
है पास नहीं कुछ भी
पर मौज में रहती है
कहीं-कहीं से वो
दमदार भी लगती है
कोई पिकनिक हो जैसे
कोई पिक्चर हो जैसे
किसी झील किनारे की
कोई छाँव हो जैसे
कहीं-कहीं से वो
इतवार भी लगती है
राहुल उपाध्याय । 18 मार्च 2026 । सिएटल

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सुंदर
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