वह प्यार भी करती है, नफ़रत भी
पाया जिसे, है पाने की हसरत भी
जीवन था ख़त्म, अब जीवन शुरू
इस उम्र में करनी है ये जुर्रत भी
झुकी थी कमर, गिरा था वज़न
कर रहा हूँ दोबारा कसरत भी
न स्वर्ग की चिंता, न कर्मों का बंधन
न गोदान के होरी सी फ़ितरत भी
वैसे तो कुछ भी यहाँ स्थायी नहीं
पर आम पर न नीम लाती कुदरत भी
राहुल उपाध्याय । 15 मार्च 2026 । सिएटल

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