बसंत पे कविता मैं लिखता नहीं
बसंत मेरे गमले में खिलता नहीं
मेरी अपनी राह है मंज़िल मेरी
जहाँ भीड़ हो वहाँ मैं जुड़ता नहीं
लिखने दो घिसा-पिटा जो लिखा करे
ऐसी रचनाओं को क़तई मैं पढ़ता नहीं
चरागों को रोशनी देना ही है
चरागों की प्रशंसा मैं करता नहीं
राहुल का अर्थ कुछ भी होता रहे
सच है कि मैं सब जैसा करता नहीं
राहुल उपाध्याय । 19 मार्च 2026 । सिएटल

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