पढ़-लिख के डिग्री भले साध ली
जवानी मगर मैंने बर्बाद की
न आँखों से बोला, न मुँह से कहा
कोई होता तो होती कोई बात भी
तन्हा सा रहता था सहरा में मैं
क्या जाने कैसी घड़ी साथ थी
न जी भर के रोया, न टूटा ये दिल
किस्मत ने कैसी ये सौग़ात दी
मैं जैसा था वैसे का वैसा रहा
आज भी हैं नियम मेरे सारथी
राहुल उपाध्याय । 18 मार्च 2026 । सिएटल

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