पाँव कहीं के कहीं पड़ते हैं उसके
टेक्स्ट भी करती है तो करती है डरके
कहीं और कोई कुछ समझ तो न लेगा? जो समझ रही हूँ मैं वो समझ तो न लेगा?
ये भावनाएँ मेरी ऐसी हैं क्यों?
क्यों नहीं कहती हूँ सब दिल खोल के मैं?
वो दूर है तो क्या सुरक्षित हूँ मैं?
ये दूरी ही क्या है क़रीबी का सबब?
ये धड़कन कम्बख़्त क्यूँ घटती नहीं?
ये पसीने की बूंदें क्यूँ छुपती नहीं?
ये दुपट्टा सँभालूँ कि दूध गैस से उतारूँ?
क्या-क्या करूँ, क्या-क्या सँभालूँ?
ये प्यार ऐसे तो होता नहीं है
किताबों में तो ऐसा कभी पढ़ा नहीं है
सामने हो इंसान तो समझ में भी आए आवाज़ की बेसिस पे तो ये होता नहीं है
लच्छेदार बातों की एक होती हूँ उम्र
साल-दर-साल ये चलता नहीं
क्यों होता है प्यार, क्यों होता है प्यार मिलता है सुकून, मिलता करार
और यही प्यार छीन लेता है सब्र-ओ-करार
राहुल उपाध्याय । 20 मार्च 2026 । सिएटल

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