कोई चीज़ अब हैरान नहीं करती है
तन-बदन में भी आग नहीं लगती है
टूट चुके हैं जादू कई
आ गई है समझदारी अब
क्या हुआ जो बात न हुई
क्या साँस भी कभी रुकती है
पागल था, जो पागल हुआ
दिल दिया और दर्द लिया
लौटाने का कोई रिवाज़ नहीं
भलमनसाहत पे दुनिया चलती है
(आँख में किसी की जादू था
बात में किसी की अल्हड़पन)
मर चुका था, मिट चुका था
हर किसी की अदा पे मैं
अब जा के मैं जागा हूँ
ज़िंदगी कभी तो सुधरती है
राहुल उपाध्याय । 7 मार्च 2026 । सिएटल

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