Wednesday, July 29, 2009

एक तरफ़ है नीरज, एक तरफ़ हूँ मैं

एक तरफ़ है नीरज
एक तरफ़ हूँ मैं
वे हैं सम्पूर्ण
उनका पूरक हूँ मैं

पास-पड़ोस में दुश्मन
दूर-दराज हैं दोस्त
किस्मत का मारा
मुशर्रफ़ हूँ मैं

तारीफ़ कभी
कोई रिंद न करे
हलक से न उतरे
वो बर्फ़ हूँ मैं

लिखता वही
जो लिखना मुझे
इस्लाह कर के नहीं
लिखता हर्फ़ हूँ मैं


दीवान छपवाऊँ
इतना दीवाना नहीं
ब्लाग पे ही लिख के
रहता संतुष्ट हूँ मैं

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रिंद = पीनेवाला;हलक = गला;
इस्लाह = किसी काम में होनेवाली त्रुटियाँ,भूलों आदि को दूर करना। सुधारना। जैसे-उर्दू के नौसिखुए कवि पहले अपनी रचनाएँ उस्ताद को दिखाकर उनसे इस्लाह लेते हैं। (http://pustak.org/bs/home.php?mean=11834)
हर्फ़ = अक्षर

[यह रचना दो बातों से प्रेरित हो कर लिखी गई है।

पहली बात। हमारे शहर, सिएटल, की
मासिक गोष्ठी को ढाई साल हो चुके हैं। गोष्ठी को एक नई दिशा, एक नया आयाम देने के प्रयास के तहत, यह निर्धारित किया गया है कि हम किसी प्रतिष्ठित कवि की रचनाओं में से अपनी पसंद की चुनें और उसे गोष्ठी में सुनाए। उद्देश्य है कि निराला, पंत, दिनकर आदि के अलावा अन्य कवियों की रचनाओं से भी हमारा परिचय हो, और वो भी उनके जीवनकाल में। और अगर कवि से सम्पर्क सम्भव हो सके तो हम उपस्थित व्यक्तियों द्वारा एक हस्ताक्षिरत पत्र भी उन्हें भेज सकते हैं।

अगस्त माह के कवि चुने गए हैं - श्री गोपालदास नीरज - जिनसे सब नीरज के नाम से परिचित हैं। उन्होंने कई फ़िल्मों के गीत लिखे हैं। गीतों की सूची बहुत लम्बी है। कुछ गीत इस लिंक पर पढ़े जा सकते हैं:
http://tinyurl.com/nirajsongs

उनकी कुछ कविताएँ इस लिंक पर जा कर पढ़ी जा सकती हैं:
http://tinyurl.com/nirajpoems

यदि आपको पुस्तकों में दिलचस्पी है तो इस लिंक पर देखें:
http://tinyurl.com/nirajbooks

दूसरी बात। हर गोष्ठी में एक स्थानीय कवि चुना जाएगा और उसकी कविताओं की आलोचना भी की जाएगी ताकि कवि को कुछ सीखने-समझने-सुधरने का अवसर मिलें। और अगस्त महीने में मेरी कविताओं की आलोचना करना तय हुआ है। ]

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2 comments:

ओम आर्य said...

BADHIYA....BADHAEE

‘नज़र’ said...

बहुत ख़ूब,