Monday, December 14, 2009

किस्सा टाईगर का

जो आसमां से गिरती है उसे कहते हैं बर्फ़
जो उठता है सीने से उसे कहते हैं दर्द
स्मृतियों में जो अक्सर हो जाते हैं दर्ज़
किस्से जनाब होते हैं सौ फ़ीसदी सर्द

टाईगर के जीवन में आए होगे कई सुनहरे क्षण
लेकिन याद रहेगा उसे वो थेंक्सगिविंग का पर्व
जब बीवी ने घुमाया था थरथराता लोहे का क्लब
और फ़ायर-हायड्रेंट से हुई थी उसकी भिड़ंत

प्यार जो करते हैं नहीं करते हैं तर्क
जो करते हैं तर्क, साथी देते हैं तर्क़
प्यार प्यार है कोई शादी नहीं
कि कर लो तो सात जनम का बेड़ा हो गर्क

प्यार और शादी में बतलाऊँ मैं फ़र्क़
प्यार बेशर्त है, और शादी है फ़र्ज़
जिसको निभाते हैं दोनों कुछ इस तरह
जैसे चुका रहे हो क्रेडिट-कार्ड का कर्ज़

प्यार तो होता है जैसे होता है मर्ज़
कब और कहाँ हो कोई जाने न मर्म
लेकिन होता ज़रूर है, और कल भी ये होगा
मानव के जीवन का यही एकमात्र है धर्म

प्यार किया तो किसी को क्यों हो जलन
प्यार तो बरसे जैसे बरसे गगन
भरे जलाशय, करे तन को मगन
प्यास बुझाए जहाँ लगी हो अगन

प्यार है जीवन के वे अद्वितिय क्षण
जिनके लिए इंसां करे सब अर्पण
टाईगर, सेंफ़र्ड या हो क्लिंटन
सब ने लगाया दाँव तन-मन-धन

सिएटल । 425-445-0827
14 दिसम्बर 2009
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थेंक्सगिविंग = Thanksgiving
क्लब = club
तर्क = argue
तर्क़ = leave
क्रेडिट-कार्ड = credit card

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5 comments:

अजय कुमार झा said...

वाह क्या अंदाज हैं आपके ...दिलचस्प ..

अजय कुमार झा

मनोज कुमार said...

रचना अच्छी लगी ।

Suman said...

nice

परमजीत बाली said...

वाह!! बहुत बढिया रचना लिखी है बधाई स्वीकारें। पढ़ कर आनंद आ गया।

प्यार और शादी में बतलाऊँ मैं फ़र्क़
प्यार बेशर्त है, और शादी है फ़र्ज़
जिसको निभाते हैं दोनों कुछ इस तरह
जैसे चुका रहे हो क्रेडिट-कार्ड का कर्ज़

Anonymous said...

You have no clue about the difference between love and lust. Please stay away from religion. By adding the last line about Krsna, you have made the poem from satire to something cheap and hurtful to many. Poets need to be mindful and responsible.