दो शून्य
या एक शून्य?
जो भी हो
बस रहे पुण्य
पाप न आपके साथ रहे
खुशियों की बरसात रहे
और हाँ
इस वर्ष आप कुछ खास करें
हिंदी लिखने का प्रयास करें
जब आप हिंदी पढ़ और बोल सकते हैं
तो हिंदी लिख भी सकते हैं
और नहीं लिख सकते,
तो लिखना सीख भी सकते हैं
http://www.giitaayan.com/x.htm पर जाए
और एक बार लिख कर देखें
कैसे लिखें कुछ समझ न आए बात, मुझसे कहें
कोई पल हो दिन हो या रात, मुझसे कहें
कोई मुश्किल कोई परेशानी आए
या लगे कुछ ठीक नहीं है फ़ाँट
मुझसे कहें
ऋषि लिखना हो या लिखना हो श्रृंगार
और लिखें ये रिषि, श्रिन्गार या ष्रंगार
मानें कभी ना हार
मुझसे कहें
मैं हूँ ना
सिएटल 425-898-9325 upadhyaya@yahoo.com
(जावेद अख़्तर से क्षमायाचना सहित)
Thursday, December 31, 2009
2010
Posted by Rahul Upadhyaya at 10:11 AM
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Monday, December 28, 2009
पहेली 32
उतारे जाते हैं ये
हर रात
सोने के वक़्त
और
वहाँ भी जहाँ
एकत्रित होते हैं
ईश्वर के भक्त
उतरवाए जाते हैं ये
रोज़
ताकि हो सके
सुरक्षा का प्रबंध
और
कभी-कभी
अपने आप ही
उतर जाते हैं ये
जब दिखाई दे जाता है
राजनेता सशक्त
न नशा
न घमंड
न जादू है ये
फिर क्या हैं ये
कि चाहे उड़ें या तैरें
उतारते हैं सब इन्हें आजू-बाजू तेरे
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इस पहेली का उत्तर इसकी अंतिम पंक्ति में छुपा हुआ है।
उदाहरण के लिए देखें पहेली 30 और उसका उत्तर।
Posted by Rahul Upadhyaya at 4:27 PM
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14 सितम्बर की पहेलियों का हल:
14 सितम्बर की पहेलियों का हल:
1.
जब भी कहीं लगा न मन
साधु संतों को किया नमन
2.
यह बात सच सौ फ़ीसदी है
कि आरक्षण वालों ने कम फ़ीस दी है
3.
जिन्हें सताते हरिकेन हैं
क्या वे भक्त हरि के न हैं?
4.
इठलाती हसीनाओं को कभी अपना ना गिन
क्या पता कब डस लें बन के नागिन
बोनस:
तुम्हारी बाहों ने दी थी मुझे कल पनाह
वो सच था या थी कोरी कल्पना?
Posted by Rahul Upadhyaya at 12:47 PM
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Wednesday, December 23, 2009
मैं ईश्वर के बंदों से डरता हूँ
हर 'हेलोवीन' पे मैं दर पे कद्दू रखता हूँ
लेकिन क्रिसमस पे नहीं घर रोशन करता हूँ
क्यों?
क्योंकि मेरे देवता तुम्हारे देवता से अलग है
लेकिन हमारे भूत-प्रेत में न कोई अंतर है
सब क्रिसमस के पहले खरीददारी करते हैं
मैं क्रिसमस के बाद खरीददारी करता हूँ
क्यों?
क्योंकि सब औरों के लिए उपहार लेते हैं
मैं अपने लिए 'बारगेन' ढूँढता हूँ
सब 'मेरी क्रिसमस' लिखते हैं
मैं 'हेप्पी होलिडेज़' लिखता हूँ
क्यों?
क्योंकि सब ईश्वर पे भरोसा करते हैं
मैं ईश्वर के बंदों से डरता हूँ
सिएटल । 425-445-0827
23 दिसम्बर 2009
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हेलोवीन = Halloween
बारगेन = Bargain
मेरी क्रिसमस = Merry Christmas
हेप्पी होलिडेज़ = Happy Holidays
Posted by Rahul Upadhyaya at 1:35 PM
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क्रिसमस
छुट्टीयों का मौसम है
त्योहार की तैयारी है
रोशन हैं इमारतें
जैसे जन्नत पधारी है
कड़ाके की ठंड है
और बादल भी भारी है
बावजूद इसके लोगो में जोश है
और बच्चे मार रहे किलकारी हैं
यहाँ तक कि पतझड़ की पत्तियां भी
लग रही सबको प्यारी हैं
दे रहे हैं वो भी दान
जो धन के पुजारी हैं
खुश हैं खरीदार
और व्यस्त व्यापारी हैं
खुशहाल हैं दोनों
जबकि दोनों ही उधारी हैं
भूल गई यीशु का जन्म
ये दुनिया संसारी है
भाग रही उसके पीछे
जिसे हो-हो-हो की बीमारी है
लाल सूट और सफ़ेद दाढ़ी
क्या शान से संवारी है
मिलता है वो माँल में
पक्का बाज़ारी है
बच्चे हैं उसके दीवाने
जैसे जादू की पिटारी है
झूम रहे हैं जम्हूरें वैसे
जैसे झूमता मदारी है
Posted by Rahul Upadhyaya at 9:43 AM
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Monday, December 14, 2009
किस्सा टाईगर का
जो आसमां से गिरती है उसे कहते हैं बर्फ़
जो उठता है सीने से उसे कहते हैं दर्द
स्मृतियों में जो अक्सर हो जाते हैं दर्ज़
किस्से जनाब होते हैं सौ फ़ीसदी सर्द
टाईगर के जीवन में आए होगे कई सुनहरे क्षण
लेकिन याद रहेगा उसे वो थेंक्सगिविंग का पर्व
जब बीवी ने घुमाया था थरथराता लोहे का क्लब
और फ़ायर-हायड्रेंट से हुई थी उसकी भिड़ंत
प्यार जो करते हैं नहीं करते हैं तर्क
जो करते हैं तर्क, साथी देते हैं तर्क़
प्यार प्यार है कोई शादी नहीं
कि कर लो तो सात जनम का बेड़ा हो गर्क
प्यार और शादी में बतलाऊँ मैं फ़र्क़
प्यार बेशर्त है, और शादी है फ़र्ज़
जिसको निभाते हैं दोनों कुछ इस तरह
जैसे चुका रहे हो क्रेडिट-कार्ड का कर्ज़
प्यार तो होता है जैसे होता है मर्ज़
कब और कहाँ हो कोई जाने न मर्म
लेकिन होता ज़रूर है, और कल भी ये होगा
मानव के जीवन का यही एकमात्र है धर्म
प्यार किया तो किसी को क्यों हो जलन
प्यार तो बरसे जैसे बरसे गगन
भरे जलाशय, करे तन को मगन
प्यास बुझाए जहाँ लगी हो अगन
प्यार है जीवन के वे अद्वितिय क्षण
जिनके लिए इंसां करे सब अर्पण
टाईगर, सेंफ़र्ड या हो क्लिंटन
सब ने लगाया दाँव तन-मन-धन
सिएटल । 425-445-0827
14 दिसम्बर 2009
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थेंक्सगिविंग = Thanksgiving
क्लब = club
तर्क = argue
तर्क़ = leave
क्रेडिट-कार्ड = credit card
Posted by Rahul Upadhyaya at 12:52 PM
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Wednesday, December 9, 2009
मेरी भूख
हाथ में मेरे पचासों लकीरें
एक भी उनमें नहीं है लकी रे
करता न खिदमत
न सहता हुकूमत
एक जो किस्मत होती भली रे
खा के भी हलवा
खा के भी पूड़ी
भूख ये मेरी मिटती नहीं रे
दिखता है जोगी
होती जलन है
खा के भी सूखी रहता सुखी रे
कहता है जोगी
सुन बात मेरी
ना तू अनलकी है ना मैं लकी रे
दूजे की प्लेट पे
आँख जो गाड़े
इंसां वही सदा रहता दुखी रे
सोने की, चांदी की
थाल को छोड़ो
पेट तो मांगे जो उगाती ज़मीं रे
सिएटल । 425-445-0827
9 दिसम्बर 2009
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लकी = lucky
अनलकी = unlucky
Posted by Rahul Upadhyaya at 11:28 AM
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